#pradepsinghडॉ. मयंक चतुर्वेदी । 
आ श्रम, जीवन में कब घट जाए, किसे पता! जिसके साथ ये घट रहा होता है, अक्‍सर उसे मालूम ही नहीं चलता, कब, क्‍या घट गया, वह तो जीवन में आ जाता है, आपके चाहने न चाहने से उसका कोई संबंध नहीं, उसे आना है, क्‍योंकि आप जीवन को धारण कर रहे हैं, वैसे भी आप वो नहीं जो भासते हैं, जिसके कारण से ये भासना है, वह आप हैं, इसलिए आश्रम, मां की कोख में आने के साथ ही आपके साथ जुड़ जाता है। 
फिर एक स्‍वप्‍न टूटता है, या कहें आप एक दूसरी दुनिया में प्रवेश करते हैं। देह अब अपनी संपूर्णता के साथ अपनी परम सत्‍ता से जिसके कारण से होना घटता है, दूर हो चुकती है, अब उसका अपना एक स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व है, कोई नाम मिलता है, जोकि जीवन भर पहचान के रूप में जाना जाता है।
अरे, जीवन भर ही क्‍यों देह छोड़ने के बाद भी वह नाम सदा चलता है, किसी की यादों में, किसी पोथी में, किसी देवालय में, किसी घर में । सनातन हिन्‍दू धर्म में तो 16 दिन विशेष है, उन सभी नामों को स्‍मरण करने के लिए जिनके कारण से भौतिक अस्‍तित्‍व पाया। स्‍वप्‍न टूटा तो सुबह मैंने पाया, जीवन में आश्रम घट रहा है, अंदर गहराइयों में आश्रम का अर्थ उतर रहा है।
अब भाषा का संस्‍कार आश्रम को क्‍या कहता है और क्‍या मानता है और व्‍यवहार में क्‍या है, वह अपनी जगह है। पर जो अंदर से भाव उपजा, वह लोक का अर्थ है आ+श्रम, यानी कि देह अब एक नए श्रम का आह्वाहन कर रही है। हमारे पूर्वज इसे पहले से जानते रहे, तभी वेद ने प्रथम घोषणा की, यजुर्वेद ने कहा- तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥(यजुर्वेद का ‘महा शरद शतम’ मंत्र ,अध्याय 36, मंत्र 24)।
हम मांग भी रहे हैं तो क्‍या ? 100 वर्षों तक (संसार को अच्छी तरह) देखते रहें! वैसे भी ऋषि परंपरा में सविता का हर संध्‍याकाल में हाथों की अलग-अलग मुद्राओं से नमन का विधान है। जैसे प्रात: सूर्योदय के साथ कमल खिल उठता है, उसी तरह की है जीवन में पहली मुद्रा कमल के समान। दोपहर में यही मुद्रा दोनों हाथों के विस्‍तार के साथ अपने विराट को प्रकट कर रही होती है और फिर शाम के सांध्‍याकाल में सूर्य के दूसरे स्‍थान पर प्रकट होने की स्‍थ‍िति में मुद्रा बहुत विनम्रता और श्रद्धा भाव से सविता को नमन करते हुए अपने को गहरे अंदर ठीक कमल के समान ही स्‍वयं को सभी ओर से वापिस सिकुड़कर अपने को जान रही होती है और उसके बाद एक लम्‍बी विश्रान्‍ति है। यह विश्रान्‍त‍ि, स्‍व के चिंतन के लिए सबसे लम्‍बी है।
वैसे भी हर मनुष्‍य को अपना बुढ़ापा लम्‍बा ही लगता है, किंतु वह कब गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता! यही चार अवस्‍थाएं हमारी अपनी इस देह की है। हर बार उसमें आश्रम अपने नए रूप में अवतरित हो रहा है। ब्रह्मचर्य, जिसमें स्‍वयं को जानना है और सांसार के काम आने योग्‍य बनाना है। गृहस्‍थ, जिसमें अपने साथ अन्‍यों का भी भार (दायित्‍व) ग्रहण करना है। वानप्रस्‍थ, जहां वन कहीं अपने अंदर ही जाग्रत करना है, वन, यानी वह स्‍थान जिसमें न कोई मेरा है न कोई तेरा है, सब अपनी प्रकृति से बंधे हैं।
यहां एक संपूर्ण चक्र है, जिसमें कर कोई अपनी सीमाओं में हैं, अ‍ितिक्रमण किया तो परिणाम भुगतना ही है। सब कुछ है इस वन में, स्‍वच्‍छ हवा है, भोजन है, नदियां हैं, पहाड़ हैं, समतल है, न जाने कितने प्रकार के जीव-जन्‍तु और उनका कोलाहल है, फिर रात्रि का परम विश्राम भी है। इस वन को कहीं अपने अंदर प्रकट करना ही तो वानप्रस्‍थ हो जाना है। इसके बाद अंतिम अवस्‍था के लिए स्‍वयं को तैयार कर लेना हैं, उसके लिए भी तो वेद ने 25 वर्ष निर्धारित किए ही हैं।
हां, वेद से याद आया, वेदों से होते हुए आगे स्‍मृतियों से होता हुआ ये आश्रम हमारे साहित्‍य में गहरा स्‍थान पाता है। हिंदी कविता में श्रम की सबसे मार्मिक छवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘वह तोड़ती पत्थर’ का स्थान कुछ अलग ही है। इलाहाबाद की सड़क पर पत्थर तोड़ती एक स्त्री- निराला की दृष्टि में वह सिर्फ श्रमिक स्त्री नहीं रह जाती। उसके हाथ का हथौड़ा कविता का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाता है। वह जिस पत्थर पर चोट करती है, वह सड़क बनाने के लिए पड़ा हुआ पत्थर जीवन की कठोरता का भी रूपक बन जाता है।
धूप है। अभाव है। श्रम है। सामाजिक विषमता है। फिर भी वह स्त्री काम कर रही है। उसके पास शायद दर्शन की कोई पुस्तक नहीं, किंतु उसके हाथ का उठता-गिरता हथौड़ा हमें एक गहरी बात सिखा रहा है। आ श्रम ! कभी वह सड़क के किनारे भी होती है। कभी वह हथेली की दरारों में होती है। कभी वह पसीने की बूंद में होती है और कभी वह उस स्त्री की चुप्पी में होती है जो जीवन की कठोरता पर लगातार चोट करती रहती है। यहीं ‘वह तोड़ती पत्थर’ ‘आ श्रम’ की कविता भी होती है।
निराला की कविता को एक और स्तर पर पढ़ें तो पत्थर सदैव सड़क का पत्थर नहीं रह जाता। हमारे भीतर भी पत्थर पड़े हैं- अहंकार के, भय के, आलस्य के, पूर्वाग्रह के, असफलताओं के और उन स्मृतियों के जिन्हें हम वर्षों से ढोते चले आते हैं। जीवन कई बार हमारे हाथों में हथौड़ा देता है। एक असफलता चोट करती है। एक अपने का जाना (मृत्यु) चोट करती है। एक बिछोह चोट करता है। एक अपमान चोट करता है। कभी आर्थिक संकट, कभी बीमारी, कभी अकेलापन, जीवन हमारे भीतर के पत्थरों पर लगातार प्रहार करता है।
फिर इन्‍हीं चोटों को खाए हम कभी टूटते हैं, तभी आकार लेते हैं और इस तरह से सतत तराशे जाते हैं! यहीं श्रम साधना बनता है। पत्थर पर चोट करने वाली स्त्री बाहर सड़क बनाती है; मनुष्य अपने भीतर चोट सहकर रास्ता बनाता है। इसीलिए निराला कह रहे हैं-
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार 
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।…
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा- 
‘मैं तोड़ती पत्थर।
आगे निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ में श्रम का यह अर्थ और गहरा हो जाता है। राम के सामने युद्ध है, परन्‍तु उससे पहले एक बड़ा युद्ध उनके भीतर चल रहा है। शक्ति की आवश्यकता शस्त्रों से पार, आत्मबल की है। संकट के क्षण में नायक भी ठहरता है, संदेह से गुजरता है, अपनी सामर्थ्य को परखता है। यहाँ पूजा स्वयं को तैयार करने का श्रम बन जाती है।
मनुष्य के जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं जब बाहर का कोई साधन पर्याप्त नहीं होता। तब उसे स्वयं को बदलना पड़ता है। कमजोर मन को मजबूत करना पड़ता है। बिखरे मन को एकाग्र करना पड़ता है। इसलिए अटल जी कह गए, “टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।” अहंकार को पीछे करना पड़ता है। असफलता के बाद फिर खड़ा होना पड़ता है। यही आ श्रम है। राम की शक्ति पूजा कह रही है, शक्ति बाहर से माँगी जा सकती है, पर उसे धारण करने योग्य पात्र बनने का श्रम स्वयं करना है।
रामचरितमानस में राम का वनगम कोई राजमहल से वन की ओर प्रस्‍थान भर नहीं है। वह तो सुविधा से संघर्ष की ओर, अधिकार से दायित्व की ओर और परिचित संसार से अनिश्चित जीवन की ओर गमन है। तभी तो वन में कोई राजसिंहासन नहीं। कोई राजसी सुरक्षा नहीं। वहाँ प्रकृति है, ऋषियों के आश्रम हैं, वनवासी हैं, संकट हैं और निरंतर यात्रा है। संत तुलसी इसलिए राम की यात्रा को सबसे महत्वपूर्ण बताते हैं। क्‍योंकि वे परिस्थितियों से बचते नहीं, उन्हें स्वीकार कर उनके भीतर अपना धर्म खोजते हैं।
संत तुलसी दास, हनुमान के प्रसंग में आ श्रम की चरम अभिव्यक्ति गढ़ते हैं। शक्ति उनके भीतर पहले से है, पर उसे जागृत करने के लिए स्मरण चाहिए। स्मरण के बाद विश्वास आता है और विश्वास के बाद कर्म। तभी समुद्र के सामने खड़े हनुमान के लिए दूरी असंभव लग सकती थी, किंतु जब भीतर की शक्ति जागी तो वही दूरी पुरुषार्थ में बदल गई, जो असंभव दिख रहा था, वो अब संभव हो गया!
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
यह प्रसंग बता रहा है, मनुष्य के भीतर बहुत कुछ पहले से मौजूद होता है। आवश्यकता उसे जगाने की होती है और स्वयं को जगाना भी एक श्रम है, इसलिए कबीर के यहाँ करघा धागे की तरह जीवन भी उलझता है, टूटता है, जुड़ता है और फिर एक बुनावट में बदलता है।कबीर का करघा कोई दूसरी दुनिया नहीं है। जो हाथ करघा चला सकते हैं, वही हाथ प्रार्थना भी कर सकते हैं। जो मन धागे की बारीकी समझ सकता है, वही मन जीवन की बारीकी भी समझ सकता है।यही कारण है कि भारतीय संत परंपरा में श्रम और साधना के बीच दीवार नहीं मिलती।
हां, साधना से याद आया; किसी के लिए खेती साधना है। किसी के लिए गाय की सेवा। किसी के लिए भोजन पकाना। किसी के लिए अध्यापन। किसी के लिए लेखन। किसी के लिए रोगी की सेवा और किसी के लिए अपने भीतर के क्रोध को रोज थोड़ा कम करना। साधना का अर्थ काम छोड़ देना नहीं; काम के भीतर, काम के लिए अपने को बदल लेना है।
हम दूसरों को बदलना चाहते हैं। समाज को बदलना चाहते हैं। परिवार को बदलना चाहते हैं। परिस्थितियों को बदलना चाहते हैं, परन्‍तु जो सबसे नजदीक है, उसे ही नहीं बदलना चाहते, स्वयं पर श्रम करना नहीं चाहते! अपने क्रोध पर काम करना।अपनी भाषा पर काम करना।अपनी आदतों पर काम करना।अपने लोभ को पहचानना।अपने भय के साथ बैठना।अपनी असफलता को स्वीकार करना।दूसरे की सफलता से ईर्ष्या न करना।क्षमा करना और सबसे कठिन अपनी गलती स्वीकार करना। सच में, भले ही यह श्रम दिखाई नहीं देता होगा। फिर भी स्‍वीकारना यही होगा, मनुष्य के चरित्र की सबसे बड़ी इमारत इसी अदृश्य श्रम से बनती है। यही आ श्रम का सबसे अंतरंग अर्थ है। ऐसे में आ श्रम आपके जीवन में घट रहा है।
आ श्रम, जहाँ थकान भी प्रसाद बन जाती है, इसलिए भारतीय संस्कृति ने श्रम के बाद विश्राम को भी देखा, उसे विशेष गरिमा मिली। विश्राम श्रम का पूर्णत्व है, इसलिए निराला ने पत्थर तोड़ती स्त्री को देखा और राम की शक्‍ति पूजा के बाद मिलनेवाले प्रसाद को भी। ऐसे ही इस आ श्रम को कबीर ने करघे में, तुलसी ने वनयात्रा और पुरुषार्थ में। प्रसाद, पंत, महादेवी और अनेक कवियों ने प्रकृति, मनुष्य और जीवन के संघर्षों में श्रम और साधना के अलग-अलग अर्थ में इसे खोजा और देखा है।
हम अक्सर पूछते हैं- जीवन में क्या हासिल किया? कितना धन मिला? कितनी प्रतिष्ठा मिली? कितनी उपलब्धियाँ मिलीं? मगर आ श्रम की दृष्टि से प्रश्न बदल जाता है। क्या हमने अपने श्रम से स्वयं को बेहतर बनाया? क्या हमारी मेहनत ने किसी और के जीवन को थोड़ा आसान किया? क्या हमारी जिम्मेदारियों ने हमें अधिक मनुष्य बनाया? क्या हमारी कठिनाइयों ने हमें अधिक करुणामय किया? यदि इन प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ की ओर जाते हैं, तो समझें- हम आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं, चाहे हमें इसका पता हो या न हो। क्योंकि आश्रम किसी दिन अचानक नहीं मिलता। वह हर रोज थोड़ा-थोड़ा हमारे पास आता है।
एक अनुशासन से। एक त्याग से। एक जिम्मेदारी से। एक ईमानदार श्रम से। एक क्षमा से। एक सेवा से। एक मौन से और अंततः उस परम् क्षण से जब मनुष्य यह समझने लगता है कि जीवन उसे भोगने के लिए नहीं मिला, उसे साधने के लिए भी मिला है।
अत: पत्थर तोड़ती निराला की स्त्री हो, करघे पर धागा बुनते कबीर हों, खेत में मिट्टी से संवाद करता किसान हो, समुद्र के सामने अपनी सामर्थ्य पहचानने का प्रयास करते हनुमान हों या शक्ति की तलाश में खड़े स्‍वयं भगवान श्री राम ही क्‍यों न हों, इन सबके बीच एक अदृश्य सूत्र है। वह सूत्र है- श्रम। ऐसा श्रम जो अकेले बाहर कुछ पैदा नहीं करता, भीतर भी कुछ जन्म देता है, यही ‘आ श्रम’ है । आ श्रम, ऐसा श्रम, जिसमें मनुष्य संसार को गढ़ते-गढ़ते स्वयं को गढ़ लेता है!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)