देश में जिन्ना का एजेंडा चलाने वालों को मिलेगा कड़ा जवाब।
पिछले 12 सालों में देश में समय-समय पर हिंदुत्व की लहर उठती और फिर शांत होती रही है। 2014 में हिंदुत्व की लहर उठी और भाजपा को अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल गया। उसके बाद 2017 में उत्तर प्रदेश में लहर उठी और भाजपा को 403 में से अकेले 312 सीटें और साथियों के साथ 325 सीटें मिलीं। उसके बाद हिदुत्व की सबसे बड़ी लहर पश्चिम बंगाल में उठी,जिसने ममता बनर्जी के शासन तंत्र को उखाड़ फेंका। मेरा मानना है कि आगामी गणेश उत्सव और दुर्गा पूजा से हिंदुत्व की एक और प्रचंड लहर उठने को तैयार है, जो कई सनातन विरोधियों को बहा ले जाएगी।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी 15 साल से सत्ता में थीं। उनको हटाना कोई आसान बात नहीं थी, लेकिन उन्होंने आतंक का राज और हिंदू विरोध का ऐसा कॉकटेल बना लिया था जो उनकी सत्ता को बहा कर ले गया। देखिए चुनाव के समय अगर हिंदुत्व की लहर उठती है तो जाहिर है कि उसी पार्टी को फायदा मिलता है जो हिंदुत्व के रास्ते पर चल रही है और इस मामले में भाजपा के समकक्ष कोई और पार्टी नहीं है। उसका शीर्ष नेतृत्व बाय कन्विक्शन हिंदू है। सनातन धर्म में उनकी निष्ठा और विश्वास है। लेकिन अब मैं एक ऐसी हिंदुत्व की लहर की बात करने जा रहा हूं, जिसका चुनाव से कोई संबंध नहीं है। सामान्य परिस्थिति में हिंदुत्व की लहर उठना मेरा मानना है कि 1947 के बाद शायद पहली बार होगा। इसकी शुरुआत गणेश उत्सव और नवरात्र से होगी। फिर दशहरा, दीपावली और गोवर्धन पूजा है यानी त्योहारों का यह सिलसिला लंबा चलने वाला है। यह गैर राजनीतिक लहर भी पश्चिम बंगाल से उठेगी। पश्चिम बंगाल के साथ ही महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा ऐसे प्रमुख राज्य हैं जहां दुर्गा पूजा और नवरात्र का विशेष महत्व होता है। इस दौरान जो समारोह होता है, वह जिसने नहीं देखा है उसके लिए अकल्पनीय है। इस बार इन राज्यों की सीमा से बाहर खास तौर से दक्षिण में भी आपको हिंदुत्व की यह लहर नजर आएगी। अब मैं इसका आकलन कोई चुनावी दृष्टि से नहीं कर रहा हूं कि किसको फायदा हो जाएगा और किसको नुकसान होगा? केवल वातावरण की दृष्टि से कह रहा हूं। इस बार की दुर्गा पूजा में आपको ऐसा दृश्य देखने को मिलेगा, जो आपने पिछले 80 साल में नहीं देखा होगा और शुरुआत जाहिर है कि पश्चिम बंगाल से ही होगी। सनातन का जो परचम पश्चिम बंगाल में लहराया है वह पूरे देश पर छा जाएगा। नवरात्र, दुर्गा पूजा और दीपावली का समारोह इस बार जैसा होगा शायद ही पहले कभी हुआ हो।
नवरात्र के दिनों में जो गुजरात नहीं गया है समझिए कि उसने कुछ नहीं देखा है। वहां आपको सनातन संस्कृति का चरित्र दिखाई देता है। नवरात्र के दिनों में वहां आपको कोई महिला-युवती ऐसी नहीं दिखेगी जो कम से कम 100 ग्राम सोना न पहने हो और रात में 12:00 बजे, 1:00 बजे या 2:00 बजे जाए तो भी उसे कोई खतरा नहीं। यह दृश्य शायद कभी राम राज्य में दिखा होगा, लेकिन आज ये दृश्य देश के कई राज्यों में देखने को मिल रहा है। दक्षिण के मैसूर में दशहरा विश्व विख्यात है। तो इसलिए हिंदुत्व की ये लहर उत्तर भारत, पूर्वी भारत या पश्चिमी भारत तक सीमित रहने वाली नहीं है, नॉर्थ ईस्ट विशेषकर उस असम में सबसे ज्यादा आपको देखने को मिलेगी, जहां 40 फीसदी आबादी मुसलमानों की है। वहां तीसरी बार भाजपा जीत कर आई है। उसी असम में कामाख्या देवी शक्तिपीठ है। 11 अक्टूबर से नवरात्र शुरू हो रहे हैं। आठ या नौ नवंबर को दीपावली पड़ेगी। उसके बाद गोवर्धन पूजा होगी। तो यह लगभग एक महीना भारत में सनातन की पुनर्प्रतिष्ठा का काल होगा। यह किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक महीना भारत में जो जिन्ना और मुस्लिम लीग का एजेंडा चलाने की कोशिश हो रही है,उसका जवाब होगा। इस एक महीने में भारत के लोग बताएंगे कि सनातन की ताकत क्या है और वह भी बिना किसी हिंसा और बिना किसी को गाली दिए। आपने अभी तक पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिवर्तन देखा। अब आप पश्चिम बंगाल में सांस्कृतिक परिवर्तन देखेंगे। दुर्गा पूजा की वहां पुन: स्थापना होने जा रही है। हालांकि इसमें भी विघ्न डालने की कोशिश हो रही है, लेकिन ऐसे लोग सफल नहीं होंगे। यह एक महीना बताएगा कि ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य क्या होगा। इस दौरान जिस तरह का समारोह होगा,वह पश्चिम बंगाल से निकलकर पूरे देश को बताएगा कि कोई जिन्ना, कोई मुस्लिम लीग या उनका कोई चेला चपाटा सनातन धर्म पर हावी नहीं हो सकता। आप मनुस्मृति की प्रतियां जला सकते हैं, लेकिन लोगों के दिल से सनातन नहीं निकाल सकते। 800 साल मुसलमानों और 200 साल अंग्रेजों ने कोशिश की, लेकिन वे सनातन को खत्म नहीं कर पाए। हमारी जो संस्कृति है, वह श्रुति से स्मृति की है। तो जो लोगों के दिल में बसा हुआ है, जो संस्कार में है, उसको कैसे निकालेंगे? वह सिर्फ किसी किताब के कारण नहीं आया है, वह समाज से आया है। सनातन धर्म ने जो नैतिक मूल्यों की स्थापना की है उसके कारण है। और ये संस्कार जल्दी जाते नहीं है। 1000 साल की गुलामी भी उसको खत्म नहीं कर पाई तो यह चुनाव के लिए सनातन धर्म का विरोध करने वाले,इस्लाम का झंडा उठाने वाले क्या खत्म कर पाएंगे?
गणेश उत्सव और नवरात्र से यह जो ज्वार उठेगा, वह बहुत जल्दी शांत होने वाला नहीं है। इससे कोई विप्लव नहीं आने वाला है, लेकिन ये बड़े परिवर्तन का कारण बनने वाला है। सामाजिक परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे होता है, लेकिन वह अनवरत चलता रहता है। सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा वाले जिस एक महीने की मैं बात कर रहा हूं वह इस प्रक्रिया में एक उत्प्रेरक का काम करेगा। सोशल मीडिया या किसी बौद्धिक विमर्श में आप देखिए हिंदुत्व और सनातन का ऐसा प्रभाव नहीं दिखा होगा, जैसा अब देखने को मिल रहा है। ऐसे ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जिससे पता चल रहा है कि इस देश में सनातन धर्म और संस्कृति कितने गहरे बैठे हुए हैं। इसको जितना उखाड़ने या नष्ट करने की कोशिश करेंगे,वह और मजबूत होकर सामने आएगा और उन लोगों पर बहुत भारी पड़ेगा जो इसका समूल नाश चाहते हैं या ऐसा चाहने वालों के साथ खड़े हैं। सनातन संस्कृति सबका समावेश करके चलती है। यह किसी का निषेध नहीं करती, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप इसे निगल जाएंगे। जिन लोगों को यह गलतफहमी है कि वे ऐसा कर सकते हैं, उनकी गलतफहमी दूर होने का समय शुरू होता है अब।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












