भाजपा के हाथ में थमा दिए सनातन से जुडे़ दो मुद्दे।
कौन से खेल हैं जिनमें गोल होता है? आप कहेंगे हॉकी और फुटबॉल। जिस खेल में गोल होता है उसमें सेल्फ गोल भी होता है। लेकिन एक और जगह है जहां सेल्फ गोल होता है और वह है राजनीति। राजनीति में सेल्फ गोल करने वालों की एक विशेष योग्यता होती है। इस मामले में सबसे आगे कोई है तो वह हैं राहुल गांधी। हाल ही में उन्होंने दो सेल्फ गोल किए हैं।
कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी ने पहला सेल्फ गोल बीती 15 अगस्त को किया। कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन के अवसर पर जैसे ही तीसरा पद शुरू हुआ सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे को ऐसा लग रहा था कि जैसे एटम बम गिर गया हो। ऐसी अफरातफरी हुई कि सोनिया गांधी किसी को बुला कर डांटने लगीं। राहुल गांधी कुछ इशारा करने लगे। मल्लिकार्जुन खरगे कुछ बोलने लगे। वंदे मातरम् एक ऐसा मुद्दा है जिस पर कांग्रेस ने अपने को बुरी तरह से एक्सपोज कर लिया। कांग्रेस वहां पर खड़ी हो गई जहां आजादी के पहले मुस्लिम लीग थी। वंदे मातरम् पर मुस्लिम लीग का जो स्टैंड था आज की कांग्रेस का वही स्टैंड है। राहुल गांधी ने दूसरा सेल्फ गोल पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम में मनुस्मृति का मुद्दा उठाकर किया। ये दोनों मुद्दे पूरी तरह से सनातन धर्म से जुड़े हैं। कांग्रेस का यह कोर मुद्दा नहीं है। यह कोर मुद्दा आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा का है। अब इन दोनों मुद्दों को उठाकर राहुल और कांग्रेस ने भाजपा का काम बहुत आसान कर दिया है। आप मान कर चलिए कि 2027 में होने वाले सात राज्यों के चुनाव, 2028 में पांच राज्यों के चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव तक ये दोनों मुद्दे चलेंगे।
कांग्रेस पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा के लिए बनाई गई एके एंटनी समिति की रिपोर्ट को फिर से याद करना चाहिए। रिपोर्ट में एंटनी ने कहा था कि कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त पार्टी की बन गई है। उस छवि को राहुल गांधी और मजबूत कर रहे हैं। वह मुस्लिम लीग से आगे जा रहे हैं। मुस्लिम लीग कह रही थी कि हम इस्लाम के मुताबिक चलना चाहते हैं और अलग देश चाहते हैं। हम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। क्या राहुल गांधी यह कह सकते हैं कि उनकी पार्टी और वह हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। सनातन धर्म के विरोध में यहां तक जाने का और क्या मतलब हो सकता है? क्या यह देश मनुस्मृति से चलता है? क्या इस देश के हिंदुओं का एक छोटा सा वर्ग भी मनुस्मृति की बात करता हो। लेकिन राहुल गांधी ने अब मनुस्मृति का एक तरह से प्रचार प्रसार करा दिया है। मनुस्मृति में क्या-क्या अच्छाइयां हैं अब सब बताई जा रही हैं। दुनिया का कोई ऐसा मजहब नहीं है जो नारी को इतना सम्मान देता हो जितना मनुस्मृति देती है। महिलाओं की बराबरी का अधिकार, सम्मान, परिवार में उनकी श्रेष्ठता, हर बात मनुस्मृति में है। मनुस्मृति कहती है कि जिस देश में नारी का सम्मान होता है उस देश में देवता वास करते हैं। इससे बड़े सम्मान की बात और क्या हो सकती है? राहुल गांधी को कुछ अंदाजा भी है कि उन्होंने पहले वंदे मातरम् और फिर मनुस्मृति पर क्या किया? उन्होंने दरअसल भाजपा के लिए पूरा मैदान खोल दिया। जिस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी सबसे कमजोर है,राहुल चाह रहे हैं कि उसी पर बात करो।
किसी भी धर्म ग्रंथ में कुछ बातें ऐसी हो सकती हैं जो आज के समय में प्रासंगिक न हों। आप उनको छोड़ सकते हैं बल्कि छोड़ ही देना चाहिए। हिंदू धर्म किसी एक किताब से नहीं चलता। कोई यह कह सकता है कि जो मनुस्मृति में विश्वास नहीं करता वह हिंदू नहीं है। लेकिन क्या यही बात इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के बारे में कही जा सकती है कि जो कुरान पर विश्वास नहीं करता वह मुसलमान है या जो बाइबल पर विश्वास नहीं करता वह क्रिश्चियन है। राहुल गांधी की भी यह बोलने की हिम्मत नहीं है। मनुस्मृति एक धर्म ग्रंथ है। सनातन संस्कृति वन बुक रिलिजन नहीं है। यह ऐसी संस्कृति है जो न तो एक देवता में विश्वास करती है और न एक धार्मिक ग्रंथ में विश्वास करती है। समावेशिता अगर कहीं है तो सिर्फ और सिर्फ सनातन धर्म में है। बाकी बाहर रखने की बात करते हैं। इस्लाम कहता है कि जो मूर्ति पूजा करते हैं उनको जीने का अधिकार नहीं है। क्रिश्चियनिटी कहती है कि सिर्फ गॉड है। हिंदू धर्म में कोई गॉड का कांसेप्ट ही नहीं है। क्योंकि कोई आसमान से नहीं उतरा है। हम मानते हैं कि हमारे ईश्वर हमारे अंदर वास करते हैं। अभिवादन के लिए हम नमस्ते शब्द का प्रयोग करते हैं। यह संस्कृत का शब्द है। इसका संधि विच्छेद है नम: ते यानी आपके अंदर जो ईश्वर है मैं उसको नमन करता हूं। हम मानते हैं कि हर प्राणी में ईश्वर का वास है। आप बताइये ऐसा दुनिया में कौन सा मजहब है। तो राहुल गांधी को न तो मनुस्मृति और न ही वंदे मातरम् के बारे में कुछ मालूम है।
वंदे मातरम् किसी देवी की पूजा नहीं, भारत माता की वंदना है। तो जो लोग भारत माता में विश्वास करते हैं उनको कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। मुस्लिम लीग की स्वीकारोक्ति पाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने 1937 के अपने अधिवेशन में तय किया कि वंदे मातरम के सिर्फ दो पद गाए जाएंगे लेकिन तब भी मुस्लिम लीग समर्थन में नहीं आई। उसने कहा कि हमको यह मंजूर ही नहीं है। अभी कांग्रेस पार्टी दो पद पर है और आप इंतजार कीजिए वह जल्द ही ये दो पद भी स्वीकार नहीं करेगी। आने वाले समय में यही होने वाला है।
कांग्रेस पार्टी का चरित्र हमेंशा से हिंदू विरोधी रहा है। जब हिंदू कोड बिल बन रहा था तब ये सवाल उठा था कि यूनिफार्म सिविल कोड क्यों नहीं? उस समय नेहरू ने कहा कि जब तक मुसलमान तैयार नहीं होगा तब तक उनके लिए कानून नहीं आएगा। यह बात उन्होंने हिंदुओं के लिए नहीं कही। हिंदुओं की मर्जी क्या है, इसका कोई महत्व कांग्रेस और उसके नेताओं के मन में नहीं था। लेकिन मुसलमान क्या सोचता है यह उनके लिए सर्वोपरि था और इसी सोच के कारण देश का विभाजन हुआ। यह सोच अभी तक गई नहीं है। इस्लाम केवल उस देश को मानता है जहां शरिया का राज है। राष्ट्रवाद और इस्लाम, ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। किसी मुसलमान से आप पूछ लीजिए कि राष्ट्र पहले है या इस्लाम, आपको जवाब मिल जाएगा। तो इससे आप समझिए कि कांग्रेस पार्टी कहां जा रही है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी मिलकर इस देश का ईसाईकरण और इस्लामीकरण करना चाहते हैं। हिंदू इस देश से कैसे खत्म हों या कम से कम माइनॉरिटी में जाएं, इसके लिए जरूरी है कि पहले हिंदू धर्म को बुरा बताइए। पुणे के कार्यक्रम में राहुल गांधी यही कर रहे थे। वह सनातन को दकियानूसी बताने के लिए मनुस्मृति को कोट कर रहे थे। उन्हें इस्लाम और क्रिश्चियनिटी में कोई बुराई नहीं नजर आती। आप राहुल गांधी का एक बयान दिखाइए जो उन्होंने क्रिश्चियनिटी या इस्लाम के खिलाफ दिया हो। तो राहुल गांधी और कांग्रेस ने वंदे मातरम् पर जो स्टैंड लिया है और उसके बाद मनुस्मृति के बारे में जो बोला है, मुझे नहीं लगता कि किसी ने इतना बड़ा सेल्फ गोल किया हो। उन्होंने अपनी समस्याओं को जूझती भाजपा को बाहर निकलने का बहुत बड़ा अवसर दे दिया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









