पार्टी न टूटने का कारण परिवारवाद को बताकर नया राजनीतिक सिद्धांत गढ़ा ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
अखिलेश यादव का एक गुण तो मानना पड़ेगा कि वह बहुत साहसी व्यक्ति हैं और धारा के विपरीत चलने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में उन्होंने एक नए राजनीतिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। उनका कहना है कि वंशवादी पार्टियां ही सर्वाइव करेंगी। तमाम पार्टियां टूट गईं, लेकिन मेरी पार्टी इसलिए नहीं टूटी क्योंकि पांच लोकसभा सदस्य तो मेरे घर के हैं। यानी अखिलेश यादव कह रहे हैं कि परिवारवाद ही राजनीति में सफलता का मूल मंत्र है।
अखिलेश यादव के अलावा यह बात कहने का साहस कोई और नहीं कर सकता। अगर आपके आसपास सब कुछ ध्वस्त हो रहा हो और आपको लगे कि कुछ नहीं हो रहा है तो वह केवल भ्रम है। वह देख ही नहीं रहे हैं कि देश में वंशवादी पार्टियों का क्या हश्र हुआ है। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी परिवारवादी पार्टी है। 42 साल से उसको लोकसभा में बहुमत नहीं मिला। लगातार तीन लोकसभा चुनाव वह हार चुकी है। एक-एक करके वह राज्यों से सत्ता से बाहर होती जा रही है। अब केवल हिमाचल प्रदेश,तेलंगाना,कर्नाटक और केरल में उसकी सरकार है। हिमाचल प्रदेश में अगले साल दिसंबर और तेलंगाना व कर्नाटक में 2028 में चुनाव होना है। उसके बाद इन राज्यों में कांग्रेस लौट कर आएगी कि नहीं, इसकी गारंटी तो कांग्रेसी भी नहीं दे सकते। कांग्रेस के अलावा कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार की राजनीति खत्म हो गई है। पंजाब में बादल परिवार की पार्टी शिरोमणि अकाली दल हाशिये पर चली गई है। हरियाणा में एक समय तीन लालों की तूती बोलती थी। देवीलाल, बंसीलाल और भजन लाल। आज तीनों के परिवार के लोग कहां हैं, यह बताना बड़ा कठिन काम है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बगल के राज्य बिहार में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल लगातार 15 साल तक सत्ता में रही। बीच में दो बार जब नीतीश कुमार पाला बदल कर गए तो फिर सत्ता में आई। लेकिन आज उनके राजनीतिक वारिस और बेटे तेजस्वी यादव की हालत यह है कि अगर एक सीट और कम होती तो नेता प्रतिपक्ष का भी दर्जा भी न मिलता। 2025 में राजद केवल 25 सीटों पर सिमट गया।
अब समाजवादी पार्टी का हाल देख लीजिए। मुलायम सिंह यादव ने पार्टी बनाई और पार्टी को परिवार बनाने के बजाय परिवार को पार्टी बना दिया। अब अखिलेश यादव उसी रास्ते पर और आगे बढ़ना चाहते हैं। उन्होंने दो दिन पूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस की। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके बगल में उनकी पत्नी लोकसभा सदस्य डिंपल यादव बैठी थीं। लेकिन सवाल है कि समाजवादी पार्टी के दूसरे नेता वहां मौजूद क्यों नहीं थे? प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश यादव ने कहा कि मेरी पार्टी इसलिए नहीं टूटी कि पांच लोकसभा सदस्य परिवार के ही हैं। इसके जरिए उन्होंने समाजवादी पार्टी के सारे नेताओं को साफ-साफ संदेश दिया कि अगर इस पार्टी में रहना है तो इस परिवार की ही बात माननी पड़ेगी। हमारे परिवार से जो बचा खुचा होगा वही आपको मिल सकता है और वह भी हम तय करेंगे कि किसको मिलेगा। दूसरा संदेश उन्होंने दिया कि यादव परिवार की नई पीढ़ी आने वाली है। परिवार के अगर पांच सदस्य हैं और पार्टी नहीं टूटी तो आप कल्पना कीजिए कि अगर सात हो जाएंगे तो पार्टी कैसे टूटेगी? यानी परिवार के सदस्य और बढ़ेगे। सपा के लोग यह बात समझ लें और नहीं समझेंगे वो हाशिए पर जाएंगे या फिर अपना नया घर तलाश लें। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि वह अपने इस सिद्धांत से नहीं हटेंगे।
अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने अब तक दो विधानसभा चुनाव लड़े हैं और दोनों में बुरी तरह से हार मिली। 2017 का चुनाव उनके मुख्यमंत्री रहते हुए लड़ा तो सपा मात्र 47 सीट पर सिमट गई जबकि 2022 का चुनाव उनके नेता विपक्ष रहते लड़ा तो 111 सीटें मिलीं। यानी अभी तक की उनकी अधिकतम उपलब्धि विधानसभा चुनाव में 111 सीट की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में जरूर उनकी पार्टी को 37 सीटें मिली हैं। लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा केवल 5-5 सीटों पर सिमट गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को जो 37 सीटें मिली हैं उसी के आधार पर अखिलेश यादव को लगता है कि अब उनका कारवां रुकने वाला नहीं है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश ने कहा कि हम सत्ता में आए तो महिलाओं की सुरक्षा का प्रबंध किया जाएगा। अब मुझे नहीं मालूम कि उत्तर प्रदेश की महिलाएं इसे सुनकर हंसेंगी या फिर रोएंगी। समाजवादी पार्टी के शासन में सबसे ज्यादा अगर किसी ने झेला है तो महिला वर्ग ने झेला है। परिवार की सुरक्षा की चिंता सबसे ज्यादा उनको ही होती है। उनको मालूम है कि समाजवादी पार्टी के शासन में किस तरह से डर के माहौल में जीना पड़ता था। मुझे नहीं लगता कि उत्तर प्रदेश की महिला मतदाता समाजवादी पार्टी के शासन को भूलने या उसे माफ करने के लिए तैयार होंगी खासकर तब जब योगी आदित्यनाथ के शासन में वे खुद को और अपने परिवार को सर्वाधिक सुरक्षित महसूस कर रही हैं। यूपी में किसी युवती, उसकी मां, दादी और नानी से पूछ लीजिए,आपको जवाब मिल जाएगा। अखिलेश यादव को अगर लगता है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके बगल में डिंपल यादव बैठी होंगी तो महिलाएं आश्वस्त हो जाएंगी,ऐसा कुछ नहीं होने वाला। इससे समाज की सोच नहीं बदलती। जब आपने कहा कि पांच सदस्य हमारे परिवार के थे इसलिए पार्टी नहीं टूटी तो इसका मतलब है कि जो परिवार के सदस्य नहीं हैं उन पर आपको भरोसा नहीं है।
अखिलेश यादव ने पारिवारिक और वंशवादी राजनीति के फायदे तो गिना दिए लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि नुकसान क्या होते हैं। उनको उनके चारों तरफ होता नुकसान नहीं दिख रहा है। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि देश और समाज में किस तरह का परिवर्तन हो रहा है। वंशवादी राजनीति से लोग धीरे-धीरे कटते जा रहे हैं। वह लगातार चार चुनाव हारे हैं लेकिन 2024 में थोड़ी सफलता मिल गई तो उनको लगता है कि जो चार हार थीं वह अपवाद था। 2024 की जो जीत है वही नियम है। अगर आप अपवाद को नियम मान लेंगे और नियम को अपवाद तो फिर आप कहां पहुंचेंगे, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
तो चुनाव सिर पर होने के बावजूद अखिलेश यादव अपनी दुनिया में जी रहे हैं। आजकल वह मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री पर भी हमला करने लगे हैं। उनको लग रहा है कि प्रधानमंत्री पर हमला करने से उनका वोट बढ़ जाएगा। उन्हें समझना चाहिए कि जगह खाली होती है तो उस जगह को भरने का मौका उसे ही मिलता है जिसके पास योग्यता हो। अयोग्य व्यक्ति से वह जगह नहीं भरी जाती। 37 लोकसभा सांसद होने के बावजूद वह लोकसभा में कोई प्रभाव नहीं छोड़ सके जबकि यह उनके लिए सुनहरा अवसर था। अब उनकी पार्टी को कभी लोकसभा में 37 सीटें नहीं मिलने वाली हैं। उनको लगता है कि जनता के बीच में जाने से कुछ नहीं होता। पार्टी के दफ्तर में बैठकर चुटकुले सुनाओ और कुछ चुटकुले सोशल मीडिया पर डाल दो। किसी पर भी छीटाकशी कर दो, बस इसी से चुनाव जीता जा सकता है। पिछले नौ साल में वह बताएं कि यूपी में मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद उनकी उपलब्धि क्या है? लखनऊ शहर में ही वह घर से कितनी बार निकले हैं। वह केवल अपने पिता मुलायम सिंह यादव को देख लेते कि जनता के बीच में कितनी बार और कैसे जाते थे? क्या अखिलेश यादव उसका 10% भी जाते हैं? अखिलेश को लगता है कि उनका ट्वीट पढ़कर गांव में बैठा आदमी सपा को वोट दे देगा। तो परिवारवाद का यह नया सिद्धांत देकर उन्होंने सबसे पहले अपनी पार्टी के नेताओं,कार्यकर्ताओं को बताया है कि तुम्हारी कोई जगह नहीं है। ऊपर के सारे पद यादव परिवार के लिए आरक्षित हैं। अब तो अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम बदलने पर भी विचार करना चाहिए। क्या नाम होगा,इसके लिए सपा समर्थकों को अखिलेश यादव को सुझाव देना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)