विरोध करें तो हिंदू नाराज, समर्थन करें तो मुसलमान
मुद्दा बड़ा था,खबर छोटी सी बनी लेकिन उसने सारे राजनीतिक समीकरणों को उलझा दिया। वंदे मातरम् को राष्ट्रगान की ही तरह सम्मान दिया जाएगा, इसके लिए विधेयक संसद से पास हो गया। अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के लोग बौखलाए घूम रहे हैं। अरशद मदनी जैसे लोग और मुसलमानों की जो संस्थाएं हैं, वे किसी भी हालत में हिंदुओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इनको हर उस बात से समस्या है,जहां हिंदू धर्म का कुछ भी जुड़ाव है।
जो भी इस देश को पुण्य भूमि और मातृभूमि मानता है उसे वंदे मातरम् से क्या परेशानी हो सकती है, लेकिन मुसलमान दोनों ही नहीं मानता। डॉक्टर अंबेडकर तक बहुत पहले लिख गए कि मुसलमान कभी राष्ट्रवादी नहीं हो सकता क्योंकि उसके लिए उसका मजहब पहले है। उसका विश्वास सिर्फ कैलफेट में है। मुसलमान उसी देश को अपना देश मानेगा,जहां शरिया या इस्लाम का राज चलता हो। भारत में ऐसा नहीं है तो वह उसको अपना देश कभी नहीं मानेगा। मुसलमान वंदे मातरम् का विरोध कर रहा है,यह बात तो समझ में आती है लेकिन जो दो नए सनातनी बनने की कोशिश कर रहे हैं राहुल गांधी और अखिलेश यादव इनको पहले तय कर लेना चाहिए कि हिंदू विरोध की राजनीति के साथ हैं या हिंदू समर्थन की राजनीति के साथ। एक साथ दोनों नहीं हो सकते। वंदे मातरम का विरोध अगर कोई भारतीय या कोई हिंदू करता है तो आप समझिए उसको इस देश,देश की संस्कृति और सनातन संस्कृति से कोई लगाव नहीं है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों की मुश्किल यह है कि इनको मुसलमान वोट चाहिए। इनको लगता है कि मुसलमानों का वोट एकमुश्त मिल जाए और हिंदुओं के एक बड़े वर्ग में इतिहास बोध,शत्रु बोध या स्वयं बोध तो है नहीं, ऐसे में वह भी हमारा साथ दे देगा और हम आसानी से चुनाव जीत जाएंगे। लेकिन परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं। 2014 के बाद से तो बड़े परिवर्तन हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में ही पिछले पांच में से चार चुनाव में यही बदली परिस्थितियां देखने को मिलीं। 2024 को जो पांचवां चुनाव था केवल उसमें देखने को नहीं मिलीं। उसमें भी ऐसा नहीं है कि मुसलमानों का वीटो चल गया। उसमें जाति का वीटो चल गया था। राजनीति जब जाति पर जाएगी तो फिर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कमजोर पड़ेगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में यही हुआ और सपा एवं कांग्रेस को कुछ सफलता मिल गई। लेकिन पूरे देश के स्तर पर ऐसा नहीं हुआ।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों नावों की सवारी करना चाहते हैं। वे सनातनी भी दिखना चाहते हैं और मुसलमानों का पक्षधर भी। लेकिन शुक्रवार को जैसा व्यवाहार उन्होंने संसद परिसर में किया। पप्पू यादव जैसे आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को गेरुआ वस्त्र पहनाकर बिठा दिया। उसके बाद सारे संतों की ओर से बयान आया है कि यह सनातन धर्म का अपमान है। आप सनातन धर्म का अपमान करके भगवान राम के प्रति श्रद्धा दिखाने का नाटक करना चाहते हैं। तो वह नाटक सबको दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर मुस्लिम संगठन अब खुलकर बोलने लगे हैं कि हम वंदे मातरम् कानून का विरोध करेंगे और इन पार्टियों से सवाल पूछ रहे हैं। उधर असदुद्दीन ओवैसी लगातार प्रचार कर रहे हैं कि मुसलमान केवल दरी बिछाने के लिए नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी तो केवल यादव ही मुख्यमंत्री क्यों होगा। हमारी जनसंख्या तो उत्तर प्रदेश में यादवों से ज्यादा है तो हमारा हिस्सा ज्यादा होना चाहिए। तो दो नावों की सवारी करने की कोशिश करने वाले गिरने वाले हैं, बल्कि कहें तो गिर चुके हैं। केवल उसका परिणाम आना बाकी है।

समाजवादी पार्टी जब से बनी है तभी से उसे मुसलमानों का वोट मिलता रहा है। लेकिन इस बार उसको डर दिख रहा है। दो-दो तरफ से मार होने जा रही है। हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से हिंदुओं की एकजुटता दिखी उसके बारे में सपा और कांग्रेस ने सपने में नहीं सोचा था। इन दलों की दूसरी समस्या यह है कि अब मुस्लिम वोट के बंटवारे का खतरा पैदा हो गया है। तो जो इनकी मूल पूंजी थी उसकी छीजन शुरू हो रही है। उत्तर प्रदेश में असदुद्दीन ओवैसी हो सकता है कि ज्यादा सीटें न जीत पाएं, लेकिन वे मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा ले जाएंगे। जाहिर है कि ये हिस्सा कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ तो आने वाला था नहीं तो नुकसान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का ही होगा। इन दोनों पार्टियों की दूसरी समस्या यह है कि इनमें एक दूसरे को नीचा दिखाने और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है। राहुल गांधी जब प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठे तो अखिलेश यादव ने कहा कि हमको तो बताया ही नहीं। लेकिन फिर भी अखिलेश बस लेकर अपने कार्यकर्ताओं के साथ पहुंच गए कि हम भी हैं। इन दोनों दलों को कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से भी धक्का लगा। इनको कोई श्रेय नहीं मिल पाया और अब तो वह मुद्दा ही ठंडा पड़ने लगा है। अखिलेश यादव की पार्टी उत्तर प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी है। सपा के 100 से ज्यादा विधानसभा सदस्य और 37 लोकसभा सदस्य हैं। कांग्रेस के पास भी यूपी से छह लोकसभा सदस्य हैं। लेकिन अगर किसी मुद्दे पर भीड़ जुटाने की बात हो तो ये नहीं जुटा सकते। इनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर लोग इनके साथ जुड़ सकें। इसीलिए लगातार नए-नए मुद्दे खोजते रहते हैं। राहुल गांधी को लगा कि छात्रों का मुद्दा हमारा मुद्दा बन जाएगा, लेकिन कोई श्रेय नहीं मिला। अब वह 8 अगस्त को प्रयागराज जाने वाले हैं। वहां उनके साथ कितने छात्र जुटेंगे यह इस पर निर्भर करेगा कि समाजवादी पार्टी का योगदान कितना रहता है। फिर सवाल है कि समाजवादी पार्टी कांग्रेस को बड़ा दिखाने की कोशिश क्यों करेगी। उनमें तो एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ है ताकि गठबंधन में ज्यादा सीटें हासिल कर सकें। वैसे भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश में किसी गिनती में नहीं है, लेकिन उसे लग रहा है कि मुस्लिम वोट हमारे कारण समाजवादी पार्टी को मिल रहा है। इसी पर वह ब्लैकमेल कर रही है। लेकिन वंदे मातरम् पर बने कानून से मामला फंस गया है। सपा और कांग्रेस अगर इस कानून का विरोध करते हैं तो जो हिंदू वोट पाने की कोशिश है,वह हवा हो जाएगी। अगर मुसलमानों का साथ देते हैं तो भी मुसलमान खुश नहीं होने वाला। वह कह रहा है कि आपने इसको रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? तो स्थिति वही है कि इधर के रहे, न उधर के रहे।
उत्तर प्रदेश में चुनाव चंद महीने बाद फरवरी-मार्च में होने हैं। उसमें सपा-कांग्रेस का गठबंधन तय है। हालांकि गठबंधन से समाजवादी पार्टी को कभी फायदा नहीं हुआ है। देखा जाए तो सबसे सफल गठबंधन उसने 1993 में बसपा के साथ किया था। दोनों ने मिलकर यूपी में गठबंधन सरकार बना ली थी। 2017 में अखिलेश यादव ने कांग्रेस से समझौता किया तो उनकी पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। 2022 में जब उन्होंने छोटे-छोटे दलों ओम प्रकाश राजभर और जयंत चौधरी की पार्टियों से समझौता किया तो जरूर उनको पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में फायदा हुआ पर चुनाव खत्म होते ही उन्होंने दोनों को अपमानित करके गठबंधन से बाहर कर दिया। अब ये दोनों दल भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। तो जो जातीय समीकरण अखिलेश बना सकते थे उसे भी बिगाड़ लिया। कांग्रेस के पास न तो जाति है और न धर्म। जहां समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार नहीं होगा, वहां मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिलेगा इस बात में भारी शंका है क्योंकि वहां पर बहुजन समाज पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी मौजूद होंगे। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की दृष्टि से देखें तो कांग्रेस और सपा तय नहीं कर पाए हैं कि वे किस मुद्दे पर लड़ेंगे और अगर साथ हैं तो कैसे साथ हैं। किसके पास देने के लिए क्या है? यादव वोट कांग्रेस को नहीं जाएगा। यह वोट 2019 में सपा के साथ गठबंधन होने पर मायावती को भी नहीं गया था। तो अभी उत्तर प्रदेश का चुनाव विपक्ष के लिहाज से खुला हुआ है। सत्ता पक्ष या भाजपा की बात करें तो उसकी तरफ से चुनाव क्लोज हो चुका है। भाजपा की सरकार तीसरी बार बनना तय है। सवाल सिर्फ यह है कि विपक्ष की संख्या क्या होगी? वह संख्या 2022 में समाजवादी पार्टी और उसके गठबंधन को जो सीटें मिली थीं, वहां तक पहुंचती हुई दिखाई नहीं दे रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












