इस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर काफी चर्चा है। इस राज्य का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि सबसे ज्यादा लोकसभा की 80 सीटें यहीं से आती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन यहां खराब रहा था। 2027 में भाजपा लगातार तीसरी बार यहां की सत्ता में आने का प्रयास करेगी इसलिए उसके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी भी होने की संभावना है, लेकिन पिछले 30-35 सालों का चुनावी इतिहास देखें तो एंटी इनकंबेंसी से ज्यादा प्रो इनकंबेंसी दिखाई देती है। यानी यह जरूरी नहीं कि आप सत्ता में हैं तो लोग आपके खिलाफ ही होंगे। आपको सत्ता में वापस लाने के लिए भी लोग वोट देते हैं।
उत्तर प्रदेश में एंटी इनकंबेंसी और किसी दूसरे किसी राज्य में एंटी इनकंबेंसी के बीच एक मौलिक अंतर है। किसी भी राज्य में वोटर अगर सत्तारूढ़ दल से नाराज है तो ज्यादातर वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को चुनता है। लेकिन आपने कभी सुना है कि विकल्प जिसको चुन रहे हैं उसके सत्ता में आने से लोगों को डर लगता हो। ऐसा ही उत्तर प्रदेश में है। यहां भाजपा हार जाए, इससे उसके समर्थक मतदाता भले चिंतित न हों, लेकिन उनकी चिंता तुरंत बढ़ जाती है जब उन्हें लगता है कि भाजपा हार जाएगी तो समाजवादी पार्टी सत्ता में आ जाएगी। समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने की आशंका मात्र से राज्य सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की एंटी इनकंबेंसी खत्म हो जाती है। इस तरह का पॉलिटिकल फिनोमिना मैं पहली बार देख रहा हूं। यूपी में आपको भाजपा की आलोचना करने और सुनने वाले बहुत मिल जाएंगे। अभी से सुनाई दे रहा है कि यहां लड़ाई बड़ी मुश्किल है। लेकिन भाजपा को केवल इतना बताना है कि हम हार गए तो समाजवादी पार्टी सत्ता में आएगी। भाजपा का पूरा इलेक्शन कैंपेन है सिर्फ इस एक मुद्दे पर टिक सकता है।
समाजवादी पार्टी 1992 में बनी थी। उस दौर में कांग्रेस यूपी में सत्ता की दौड़ से बाहर हो चुकी थी और भाजपा 91 में पूर्ण बहुमत की पहली बार सरकार बना चुकी थी। 1991, 93 और 96 तीन विधानसभा चुनाव ऐसे हुए जब भाजपा राज्य में सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनी। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन करके चुनाव लड़े इसके बावजूद भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं। लेकिन 96 के बाद जो भाजपा की जो गिरावट शुरू हुई वह जाकर 2014 में लोकसभा चुनाव में रुकी। यूपी में 2002 के चुनाव में तो भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी हो गई। उसके बाद सपा बसपा का दौर शुरू हुआ। यूं तो मुलायम सिंह यादव तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने लेकिन एक बार भी अपनी विधायी ताकत के आधार पर नहीं बने। बहुत से लोगों को सुनने में यह बात आश्चर्यजनक लगेगी। पहली बार वह
1989 में सीएम बने। उस समय वह जनता दल के सदस्य थे। जनता दल को यूपी में अकेले दम पर बहुमत नहीं मिल पाया था। भाजपा ने बाहर से समर्थन किया और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए, लेकिन बने भी कैसे यह भी जान लीजिए। उस समय वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। यूपी में चुनाव के बाद जनता दल के विधायक दल की बैठक होनी थी। वीपी सिंह ने अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा। उन्हें स्पष्ट निर्देश था कि मुख्यमंत्री अजीत सिंह को बनवाना है। मुलायम सिंह यादव को नहीं बनने देना है। मुलायम और वीपी सिंह की पुरानी दुश्मनी थी। जनता दल विधायकों की बैठक से पहले मुलायम बसपा मुखिया कांशीराम के घर पहुंच गए और उनसे कहा कि एक ओबीसी को मुख्यमंत्री बनने से रोका जा रहा है। उसके बाद कांशीराम के घर से जनता दल के जितने दलित विधायक थे उन सबको फोन जाता रहा कि विधायक दल की बैठक में मुलायम सिंह यादव का समर्थन करना है। इसके बाद बाजी पलट गई। विधायक दल की बैठक में दलित विधायकों ने मुलायम को वोट कर दिया और वह मुख्यमंत्री बन गए। मुलायम 1993 में दूसरी बार सीएम बने तो उसमें फिर कांशीराम की भूमिका थी। सपा-बसपा गठबंधन को। 176 सीटें मिली थीं। कांग्रेस और जनता दल ने बाहर से समर्थन देकर उनकी सरकार बनवा दी। 2002 के यूपी विधानसभा चुनाव में फिर हंग असेंबली आई। भाजपा और बसपा ने चुनाव बाद गठबंधन कर लिया और मायावती मुख्यमंत्री बन गईं। 2003 में भाजपा ने ताज कॉरिडोर मामले को लेकर सरकार से समर्थन वापस ले लिया। हालांकि उसे पीछे वास्तविक कारण यह था कि प्रमोद महाजन ने अटल और आडवाणी को यह समझाया कि 2004 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव हमारी मदद करेंगे। उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दिया जाए। लेकिन मुलायम और भाजपा को मिलाकर भी नंबर नहीं बनते थे। वैसे भी दोनों साथ मिलकर सरकार बनाना नहीं चाहते थे इसलिए बसपा के विधायकों को तोड़ा गया। विधानसभा अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी ने इस काम में बहुत मदद की। तो इस तरह मुलायम तीसरी बार यूपी के सीएम बने। वह अपनी पार्टी के बहुमत के दम पर मुख्यमंत्री कभी नहीं बन पाए।
समाजवादी पार्टी जब से बनी है तब से केवल एक बार 2012 में उसे अकेले दम पर पूर्ण बहुमत मिल पाया। उसका कारण था कि वह चुनाव लगभग बायपोलर हो गया था। कांग्रेस पहले बाहर हो चुकी थी। भाजपा पुअर थर्ड बन गई। उसे 403 में से सिर्फ 47 सीटें मिलीं। तो सीधी लड़ाई सपा और बसपा की हो गई। सपा को 224 और बसपा को 80 सीटें मिलीं। हालांकि दोनों के वोट शेयर में कोई ज्यादा अंतर नहीं था। सपा को 29.15% और बसपा को 25.91% वोट मिले थे जबकि सीटों में ढाई गुना का अंतर था। इसके बाद अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनाए गए। वोट शेयर की दृष्टि से देखें तो सपा की सबसे अच्छी परफॉर्मेंस 2022 के विधानसभा चुनाव में रही जब उसे 32.06% वोट मिले। यह उसका मैक्सिमम है। दूसरी ओर भाजपा का वोट प्रतिशत 2017 में, जब उसे अकेले 312 सीटें मिली थी, करीब 39% था। जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत और बढ़कर 41.29% पर पहुंच गया। हालांकि उसे सीटें 255 ही मिली थीं।
मेरा मानना है कि 2027 के चुनाव में यूपी में सपा और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई होती हुई दिख रही है, लेकिन जमीन पर अंतर बहुत बड़ा है। सपा अपने पीक को पार कर चुकी है। यही बसपा के साथ हुआ था। 2007 में वह अपने पीक को पार कर चुकी थी। उसके बाद से उसका लगातार डाउनफॉल हुआ। 2022 में दो पार्टियों ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और जयंत चौधरी की रालोद ने सपा का वोट शेयर बढ़ाने में काफी मदद की थी। ये दोनों पार्टियां इस बार उसके साथ न होकर भाजपा के साथ हैं।
यूपी में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति बहुत खराब है लेकिन फिर भी उसके पास 12% का ठोस वोट शेयर है। इस बार आरएलडी के सपा से अलग होने के कारण इस बात की संभावना ज्यादा है कि पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोट बसपा को जाए क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पश्चिमी यूपी में यादव आबादी लगभग नहीं के बराबर है तो सपा का कोर वोट का कॉम्बिनेशन यादव और मुस्लिम वहां काम नहीं करता। रालोद के साथ होने से जाट मुस्लिम कॉम्बिनेशन बनता और उसमें कुछ पिछड़ा वर्ग मिल जाता है तो एक तरह से विनिंग कॉम्बिनेशन बन जाता है। वह कॉम्बिनेशन पश्चिमी यूपी में टूट चुका है। और सबसे बड़ी बात जो मैंने शुरू में कही कि उत्तर प्रदेश के लोगों को भाजपा के सत्ता से बाहर होने का कोई दुख नहीं होगा। उनके मन में भयानक डर तब समा जाता है जैसे ही उन्हें यह संभावना नजर आती है कि समाजवादी पार्टी की सरकार फिर से बन सकती है। फिर वे सब भूल जाते हैं। समाजवादी पार्टी के आने की संभावना आम वोटर की सुरक्षा खत्म होने की आशंका को जन्म देती है। इसलिए मैं बार-बार कह रहा हूं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा तय हो चुका है। बात केवल सीटों की है और मेरा मानना है कि भाजपा 2017 के करीब पहुंचेगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











