प्रदीप सिंह।जनादेश में कई संदेश छिपे होते हैं। केरलम का जनादेश भी कुछ ऐसा ही है। आप कहेंगे कि वहां का जनादेश तो बड़ा स्पष्ट है। 140 विधानसभा सीटों में से 102 यूडीएफ को मिली हैं। कांग्रेस पार्टी का मुख्यमंत्री भी बन गया। लेकिन आंकड़ों के अंदर के आंकड़े दरअसल कई बार असली कहानी बयां करते हैं।
केरलम विधानसभा चुनावों में इसबार यूडीएफ को जो 102 सीटें मिली हैं उसमें 63 सीटें कांग्रेस पार्टी को मिली हैं, लेकिन 22 सीटें आईयूएमएल (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) के खाते में गई हैं। यह आईयूएमएल को अब तक मिलीं सबसे ज्यादा सीटें हैं और उनका स्ट्राइक रेट भी जबर्दस्त है। आईयूएमएल कुल 24 सीटों पर लड़कर 22 सीटें जीती है। यह जनादेश बताता है कि केरलम की राजनीति में आईयूएमएल का प्रभुत्व बढ़ रहा है। राज्य का मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी का बना जरूर लेकिन मुख्यमंत्री वीडी सतीशन का नाम कांग्रेस आलाकमान या गांधी परिवार ने नहीं, आईयूएमएल ने तय किया। केरलम में मुस्लिम और ईसाई समुदाय के बीच संस्थाओं पर कब्जे की लड़ाई लंबे समय से चल रही है। इन्हें माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशंस चलाने का अधिकार मिला है और उसमें सरकार से मदद मिलती है। तो सरकार जिसके पक्ष में होती है, उसको ज्यादा मदद मिलती है। लंबे समय से एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस पर ईसाइयों का कब्जा था, लेकिन जब गल्फ से पैसा आने लगा तो शिक्षण संस्थाओं में मुस्लिम समाज का दखल बढ़ने लगा। वहीं शुरू हुआ यह क्लैश आज भी चल रहा है। वीडी सतीशन की सरकार में आईयूएमएल यानी मुसलमानों का प्रभाव बढ़ गया है तो संस्थाओं पर कब्जे का उनका अभियान तेज होगा। सरकार के एक फैसले से यह स्पष्ट भी हो गया है। एक गांव की जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। वहां करीब साढ़े चार हजार हिंदू और ईसाई बसे हुए हैं। उस गांव की जमीन को वक्फ बोर्ड अपना बता रहा था। वीडी सतीशन की सरकार बनते ही वह जमीन वक्फ बोर्ड को दे दी गई। अब वहां से हिंदू और ईसाई विस्थापित होंगे।
केरलम में हिंदू और ईसाइयों की एक अलग कहानी भी चलती है। दोनों को ही मुस्लिम समाज से कई शिकायतें रहती हैं। डेमोग्राफिक चेंज, लैंड जिहाद और लव जिहाद ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर ईसाई समाज और हिंदू समाज में एकता है। लेकिन वोट देने के समय यह बदल जाता है। पिछले दिनों भाजपा ने ईसाई समाज में अपना जनाधार बढ़ाने की कई कोशिशें कीं। इनमें सीरियन क्रिश्चियंस के बीच तो वह अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल रही लेकिन कैथोलिक क्रिश्चियंस में उसका बहुत कम प्रभाव बढ़ा। यह चुनाव नतीजे में भी दिखाई देता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में 19% वोट मिला था। हालांकि सीट एक ही मिली थी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 12% ही वोट मिला। सीटें उसे जरूर तीन मिल गईं। यानी 7% मतदाता ऐसा था जो भाजपा के खिलाफ नहीं था,वह भाजपा को वोट दे सकता था और लोकसभा चुनाव में दिया भी लेकिन विधानसभा में नहीं दिया। इस 7% को वापस लाना भाजपा के लिए चुनौती है। जहां भी मुस्लिम समाज का प्रभुत्व हो और मुस्लिम तुष्टीरण की राजनीति बहुत तेजी से बढ़ रही हो, वहां भाजपा के लिए गुंजाइश नजर आती है। इसका सबसे ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल का है। मुस्लिम तुष्टीरण की राजनीति को ममता बनर्जी इतनी ऊंचाई पर ले गईं कि वहां हिंदू त्राहिमाम करने लगा। तो उसको विकल्प के रूप में केवल भाजपा नजर आई। केरलम में अब जो सरकार बनी है,चूंकि उसमें मुस्लिम लीग का प्रभुत्व है, इस कारण उसने बकरीद पर दो दिन की छुट्टी कर दी। तो यह जो केरलम में नई सरकार बनी है,यह दरअसल भाजपा के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ रहा है और वह सरकार में सीनियर पार्टनर की तरह व्यवहार कर रही है। इस सरकार की ड्राइविंग सीट पर वह है। मुख्यमंत्री भले ही कांग्रेस का है, लेकिन वह मुस्लिम लीग के दबाव में काम कर रहा है। राज्य में यह स्थिति पूरे 5 साल रहेगी। वीडी सतीशन को मालूम है कि अगर आईयूएमएल का उनको समर्थन न होता तो वह मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। राहुल गांधी की पसंद केसी वेणुगोपाल थे लेकिन आईयूएमएल उन्हें नहीं चाहती थी इसीलिए सतीशन का नंबर लग गया। तो वेणुगोपाल मुख्यमंत्री सतीशन के लिए समस्या खड़ी करते रह सकते हैं। वेणुगोपाल की ओर से सतीशन पर जितना दबाव बढ़ेगा उतनी ही उनकी निर्भरता मुस्लिम लीग पर बढ़ती जाएगी। मुस्लिम लीग पर निर्भरता बढ़ने का मतलब है मुस्लिम लीग के एजेंडे को ज्यादा से ज्यादा लागू करना। और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का जितना प्रभाव बढ़ता जाएगा तो भाजपा के लिए रास्ता खुलेगा। तब राज्य के क्रिश्चियन और हिंदू समाज दोनों को यह बात समझ में आएगी कि सीपीएम ने उनका भला नहीं किया और कांग्रेस भी उनका भला नहीं कर सकती। एकमात्र बीजेपी है जो उनके हित में काम कर सकती है। ऐसा नहीं है कि तुरंत कोई बहुत बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है, लेकिन ऐसी ही राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना रास्ता बनाते हैं। जहां भी छोटी सी ओपनिंग दिखाई दी, वहां से घुस जाओ और धीरे-धीरे फैलते जाओ।
बहुत से लोग तो मजाक में कहने भी लगे हैं कि 2016 में पश्चिम बंगाल में भाजपा की तीन सीटें आई थीं और 2026 में 208 सीटें आ गईं। तो केरलम में भी इस बार चुनाव में भाजपा की तीन सीटें आई हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि बीजेपी को वहां सत्ता तक पहुंचने में 10 साल लगेगा। यह 10 साल से कम समय में भी हो सकता है क्योंकि केरलम की राजनीति पहली बार बदल रही है। अभी तक केरलम की राजनीति बाईपोलर थी। यानी यूडीएफ बनाम एलडीएफ। अब एक तीसरे ध्रुव के रूप में भाजपा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। इस बार उसको सीटें तीन ही मिली हैं, लेकिन 19 विधानसभा सीटों पर वह नंबर दो है। इसबार एलडीएफ सरकार की 10 साल की एंटी इनकंबेंसी का फायदा उठाने की स्थिति में यूडीएफ ही था। भाजपा का न तो संगठनिक आधार था,न जनाधार और न ही नैरेटिव के टर्म में वह इतनी बड़ी हो पाई थी कि उसको केरलम के लोग विकल्प के रूप में लोग देखें। लेकिन अगले पांच सालों में यह परिस्थिति बदलेगी। केरलम में अब भाजपा का एक लोकसभा सदस्य और तीन विधानसभा सदस्य हैं। केंद्र में भाजपा की मजबूत सरकार है। साथ ही केरलम में हमेशा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उपस्थिति बहुत मजबूत रही है और अगले 5 सालों में उस तरह का काम होगा जिस तरह से पश्चिम बंगाल में 2021 से 2026 के बीच में हुआ। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जब ट्रायंगुलर फाइट हो और तीसरी पार्टी पूरे प्रदेश के बजाय चुने हुए क्षेत्रों पर अपनी ज्यादा ताकत लगाए तो उसकी जीत की संभावना भी बन सकती है। केरलम में भाजपा के लिए यही एक उम्मीद की किरण है। यह 2031 में भी संभव हो सकता है। पश्चिम बंगाल जीतने के बाद भाजपा के लिए किसी भी राज्य में आप यह नहीं कह सकते कि उसका सत्ता में आना असंभव है। केरलम में जो सामाजिक समीकरण है उसमें अब भी सबसे बड़ा वर्ग हिंदुओं का है। लगभग 54% हिंदू हैं। 18% के करीब ईसाई और 26% के करीब मुसलमान है। ऐसे में हिंदुओं की एकजुटता और क्रिश्चियन समाज के एक हिस्से का भाजपा के साथ जुड़ना चुनाव नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में होगा। आईयूएमएल के दबाव में जैसे-जैसे वीडी सतीशन सरकार का कामकाज आगे बढ़ेगा तो उसमें सबसे ज्यादा नुकसान में ईसाई समुदाय ही होगा। ऐसे में भाजपा के कैडर को हिंदू और ईसाई समाज को यह समझाना पड़ेगा कि अगर आप अपना हित चाहते हैं और अपना भविष्य अगर सुधारना चाहते हैं तो भाजपा के अलावा आपके पास कोई विकल्प नहीं है। यह काम कोई आसान नहीं है। बहुत जल्दी होने वाला भी नहीं है, लेकिन यह काम असंभव भी नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
केरलम में हिंदू और ईसाइयों की एक अलग कहानी भी चलती है। दोनों को ही मुस्लिम समाज से कई शिकायतें रहती हैं। डेमोग्राफिक चेंज, लैंड जिहाद और लव जिहाद ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर ईसाई समाज और हिंदू समाज में एकता है। लेकिन वोट देने के समय यह बदल जाता है। पिछले दिनों भाजपा ने ईसाई समाज में अपना जनाधार बढ़ाने की कई कोशिशें कीं। इनमें सीरियन क्रिश्चियंस के बीच तो वह अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल रही लेकिन कैथोलिक क्रिश्चियंस में उसका बहुत कम प्रभाव बढ़ा। यह चुनाव नतीजे में भी दिखाई देता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में 19% वोट मिला था। हालांकि सीट एक ही मिली थी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 12% ही वोट मिला। सीटें उसे जरूर तीन मिल गईं। यानी 7% मतदाता ऐसा था जो भाजपा के खिलाफ नहीं था,वह भाजपा को वोट दे सकता था और लोकसभा चुनाव में दिया भी लेकिन विधानसभा में नहीं दिया। इस 7% को वापस लाना भाजपा के लिए चुनौती है। जहां भी मुस्लिम समाज का प्रभुत्व हो और मुस्लिम तुष्टीरण की राजनीति बहुत तेजी से बढ़ रही हो, वहां भाजपा के लिए गुंजाइश नजर आती है। इसका सबसे ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल का है। मुस्लिम तुष्टीरण की राजनीति को ममता बनर्जी इतनी ऊंचाई पर ले गईं कि वहां हिंदू त्राहिमाम करने लगा। तो उसको विकल्प के रूप में केवल भाजपा नजर आई। केरलम में अब जो सरकार बनी है,चूंकि उसमें मुस्लिम लीग का प्रभुत्व है, इस कारण उसने बकरीद पर दो दिन की छुट्टी कर दी। तो यह जो केरलम में नई सरकार बनी है,यह दरअसल भाजपा के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ रहा है और वह सरकार में सीनियर पार्टनर की तरह व्यवहार कर रही है। इस सरकार की ड्राइविंग सीट पर वह है। मुख्यमंत्री भले ही कांग्रेस का है, लेकिन वह मुस्लिम लीग के दबाव में काम कर रहा है। राज्य में यह स्थिति पूरे 5 साल रहेगी। वीडी सतीशन को मालूम है कि अगर आईयूएमएल का उनको समर्थन न होता तो वह मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। राहुल गांधी की पसंद केसी वेणुगोपाल थे लेकिन आईयूएमएल उन्हें नहीं चाहती थी इसीलिए सतीशन का नंबर लग गया। तो वेणुगोपाल मुख्यमंत्री सतीशन के लिए समस्या खड़ी करते रह सकते हैं। वेणुगोपाल की ओर से सतीशन पर जितना दबाव बढ़ेगा उतनी ही उनकी निर्भरता मुस्लिम लीग पर बढ़ती जाएगी। मुस्लिम लीग पर निर्भरता बढ़ने का मतलब है मुस्लिम लीग के एजेंडे को ज्यादा से ज्यादा लागू करना। और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का जितना प्रभाव बढ़ता जाएगा तो भाजपा के लिए रास्ता खुलेगा। तब राज्य के क्रिश्चियन और हिंदू समाज दोनों को यह बात समझ में आएगी कि सीपीएम ने उनका भला नहीं किया और कांग्रेस भी उनका भला नहीं कर सकती। एकमात्र बीजेपी है जो उनके हित में काम कर सकती है। ऐसा नहीं है कि तुरंत कोई बहुत बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है, लेकिन ऐसी ही राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना रास्ता बनाते हैं। जहां भी छोटी सी ओपनिंग दिखाई दी, वहां से घुस जाओ और धीरे-धीरे फैलते जाओ।
बहुत से लोग तो मजाक में कहने भी लगे हैं कि 2016 में पश्चिम बंगाल में भाजपा की तीन सीटें आई थीं और 2026 में 208 सीटें आ गईं। तो केरलम में भी इस बार चुनाव में भाजपा की तीन सीटें आई हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि बीजेपी को वहां सत्ता तक पहुंचने में 10 साल लगेगा। यह 10 साल से कम समय में भी हो सकता है क्योंकि केरलम की राजनीति पहली बार बदल रही है। अभी तक केरलम की राजनीति बाईपोलर थी। यानी यूडीएफ बनाम एलडीएफ। अब एक तीसरे ध्रुव के रूप में भाजपा ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। इस बार उसको सीटें तीन ही मिली हैं, लेकिन 19 विधानसभा सीटों पर वह नंबर दो है। इसबार एलडीएफ सरकार की 10 साल की एंटी इनकंबेंसी का फायदा उठाने की स्थिति में यूडीएफ ही था। भाजपा का न तो संगठनिक आधार था,न जनाधार और न ही नैरेटिव के टर्म में वह इतनी बड़ी हो पाई थी कि उसको केरलम के लोग विकल्प के रूप में लोग देखें। लेकिन अगले पांच सालों में यह परिस्थिति बदलेगी। केरलम में अब भाजपा का एक लोकसभा सदस्य और तीन विधानसभा सदस्य हैं। केंद्र में भाजपा की मजबूत सरकार है। साथ ही केरलम में हमेशा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उपस्थिति बहुत मजबूत रही है और अगले 5 सालों में उस तरह का काम होगा जिस तरह से पश्चिम बंगाल में 2021 से 2026 के बीच में हुआ। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जब ट्रायंगुलर फाइट हो और तीसरी पार्टी पूरे प्रदेश के बजाय चुने हुए क्षेत्रों पर अपनी ज्यादा ताकत लगाए तो उसकी जीत की संभावना भी बन सकती है। केरलम में भाजपा के लिए यही एक उम्मीद की किरण है। यह 2031 में भी संभव हो सकता है। पश्चिम बंगाल जीतने के बाद भाजपा के लिए किसी भी राज्य में आप यह नहीं कह सकते कि उसका सत्ता में आना असंभव है। केरलम में जो सामाजिक समीकरण है उसमें अब भी सबसे बड़ा वर्ग हिंदुओं का है। लगभग 54% हिंदू हैं। 18% के करीब ईसाई और 26% के करीब मुसलमान है। ऐसे में हिंदुओं की एकजुटता और क्रिश्चियन समाज के एक हिस्से का भाजपा के साथ जुड़ना चुनाव नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में होगा। आईयूएमएल के दबाव में जैसे-जैसे वीडी सतीशन सरकार का कामकाज आगे बढ़ेगा तो उसमें सबसे ज्यादा नुकसान में ईसाई समुदाय ही होगा। ऐसे में भाजपा के कैडर को हिंदू और ईसाई समाज को यह समझाना पड़ेगा कि अगर आप अपना हित चाहते हैं और अपना भविष्य अगर सुधारना चाहते हैं तो भाजपा के अलावा आपके पास कोई विकल्प नहीं है। यह काम कोई आसान नहीं है। बहुत जल्दी होने वाला भी नहीं है, लेकिन यह काम असंभव भी नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











