#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) ने भारतीय संविधान में नई जान फूंक दी है। यह मेरा बयान नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। इलेक्शन कमीशन को एसआईआर का अधिकार नहीं है,इसे लेकर कई पिटीशंस फाइल हुई थीं। कांग्रेस और कई अन्य पार्टियां एसआईआर को वोट चोरी का नाम दे रही थीं। बिहार और पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे को खूब जोर-शोर से उठाया गया। इस मामले में बुधवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने विपक्ष के सारे नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बात यह कही कि इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन करने का संवैधानिक अधिकार है। साथ ही यह भी कहा कि इस एक्सरसाइज से डेमोक्रेसी मजबूत होती है और चुनाव ज्यादा पारदर्शी एवं निष्पक्ष होते हैं। दूसरा मुद्दा प्रोसीजर को लेकर था कि जिस तरह से एसआईआर हो रही है, वह गलत है। इस सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रोसीजर में कोई गलती नहीं है। अगर किसी को कोई शिकायत है,किसी का नाम गलत कट गया है तो उसके पास इसे ठीक कराने के बहुत से फोरम हैं। तीसरी बात जो बहुत महत्वपूर्ण थी और जिस पर बहुत हंगामा हुआ कि इलेक्शन कमीशन को किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिल्कुल सही बात है, लेकिन किसी वोटर का नाम जोड़ने या काटने के लिए जरूरी है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि वह व्यक्ति वोटर है या नहीं। तो वह व्यक्ति वोटर है या नहीं, अपने पक्ष में प्रमाण या दस्तावेज दे और दस्तावेज मांगने का अधिकार इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को है। चुनाव आयोग को अगर किसी की नागरिकता पर संदेह है तो उसके आधार पर वह एसआईआर से यानी वोटर लिस्ट से नाम काट सकता है और अगर संदेह नहीं है तो जोड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कमीशन ने जितने लोगों की नागरिकता को संदेह में पाया है,उनके नाम 4 महीने के अंदर गृह मंत्रालय को भेजें और गृह मंत्रालय से कहा है कि वह अगला स्थानीय निकाय या विधानसभा का चुनाव होने से पहले जांच करके इलेक्शन कमीशन को रिपोर्ट दे कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं। एसआईआर से नाम कटने का मतलब यह नहीं है कि आपकी नागरिकता चली गई। अगर आप साबित कर देते हैं या सरकार जांच के बाद पाती है कि आप भारत के नागरिक हैं तो आपका नाम फिर से जुड़ जाएगा। तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लगा।
विपक्ष को लग रहा था कि एसआईआर के जरिए उसे बहुत बड़ा हथियार मिल गया। इससे एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश हो रही थी। इलेक्शन कमीशन को बदनाम किया गया। चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार पर व्यक्तिगत हमले हुए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चिल्ला-चिल्लाकर सार्वजनिक सभा में कहा था कि तुम्हारा नाम याद रखेंगे, भागना नहीं। यह सीधे-सीधे एक संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति को धमकी देने वाला मामला था। कायदे से इसके खिलाफ राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए थी लेकिन नहीं हुई। चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार को भाजपा का एजेंट बताया गया। कहा गया कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर कॉम्प्रोमाइज्ड हैं, लेकिन इनमें से किसी आरोप की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट ने नहीं की है बल्कि इनको टिप्पणी के लायक भी नहीं समझा। बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर और चुनाव आयोग ने जो काम किया है,उसके लिए उनकी सराहना की। सुप्रीम कोर्ट ने न तो एसआईआर पर कोई प्रश्न उठाया और न ही एसआईआर के प्रोसीजर पर बल्कि कहा कि सारी प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप हुई है। तो सीसी ज्ञानेश कुमार का पूरे देश को अभिनंदन करना चाहिए। उन्होंने वह काम किया, जो उनसे पहले के चीफ इलेक्शन कमिश्नर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। हमलों से ज्ञानेश कुमार डिगे नहीं। संवैधानिक पद पर बैठकर उनको जो अधिकार मिला था उन्होंने कानूनी तरीके से उसका सदुपयोग किया। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को रोकने के सारे पिटीशंस खारिज कर दिए। चुनाव आयोग को इससे बड़ा प्रशंसा पत्र मिल नहीं सकता।
विपक्ष के साथ-साथ दुनिया भर की ताकतें भारत की चुनावी प्रणाली को संदेहास्पद बनाने की कोशिशों में जुटी थीं। उनको लगता था कि इससे जो लोग चुनकर आए हैं और जो सरकार बनी है, वह संदेह के घेरे में होगी कि यह दरअसल जनादेश से नहीं बनी है। यह जनादेश को लूट कर बनी है। तो चुनाव आयोग ने साबित किया और फिर उस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगाई कि जनादेश बिल्कुल सही है। कोई वोट चोरी नहीं हुई है। एसआईआर जो वोट चोर थे, उनको बाहर करने के लिए था और पूरा विपक्ष वोट चोरों के साथ खड़ा था। विपक्ष चाहता था कि जो इस देश के नागरिक नहीं हैं, उनको भी वोट देने का अधिकार मिले। जो बांग्लादेशी घुसपैठिये देश छोड़कर भाग रहे हैं, वह बता रहे हैं कि हमारे पास तो वोटर कार्ड भी था। हमको वोट नहीं देने दिया। हम अपने मुल्क वापस जा रहे हैं। वे खुद मान रहे हैं कि वे बांग्लादेशी हैं। और ममता से लेकर राहुल तक कोई विपक्षी नेता ऐसा नहीं है, जो उनके समर्थन में न खड़ा रहा हो। अब अखिलेश यादव का बड़ा विचित्र सा बयान आया है। वह कह रहे हैं कि हमको एसआईआर से समस्या नहीं है। लेकिन यह जो बीजेपी स्टाइल एसआईआर है,यह न हो। अरे भाई, बीजेपी एसआईआर नहीं करा रही थी। एसआईआर चुनाव आयोग करा रहा था और उसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट कर रहा था।

तो विपक्ष के हाथ से यह बहुत बड़ा मुद्दा निकल गया। आप देखिए 2014 के बाद से विपक्ष जिस मुद्दे को उठाता है और समझता है कि बस यह गेम चेंजर होने वाला है, वह सब मुद्दे औंधे मुंह गिरे हैं। विपक्ष ने राफेल और फिर तथाकथित किसान आंदोलन का मुद्दा खूब जोरशोर से उठाया था। नरेंद्र मोदी सरकार ने  तीन कृषि कानून वापस लेकर विपक्ष के पैर के नीचे से जमीन खींच ली। कोई फायदा नहीं हुआ। राफेल के मुद्दे पर राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी। उसके बाद पेगासस का मुद्दा उठाया कि हमारे फोन की जासूसी हो रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट गया। उसने जांच कमेटी बिठा दी। जांच कमेटी ने कहा कि जिनको शक है कि उनके फोन की जासूसी हो रही है, वह अपना फोन सबमिट करें। हम उसकी तकनीकी जांच कराएंगे। लेकिन राहुल गांधी समेत ज्यादातर नेताओं ने अपना फोन देने से मना कर दिया। जिन्होंने दिया भी उनके फोन में कुछ गड़बड़ नहीं मिली। फिर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट छपवाई गई। बहाना बनाया गया अडानी ग्रुप को। दरअसल वह हमला अडानी ग्रुप पर नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर था। वहां भी सफलता नहीं मिली।
जब सर्जिकल स्ट्राइक हुई तो विपक्ष ने कहा कि यह खून की दलाली है। जब बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई तो कहा गया कि यह सब फर्जी है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया में जितने रक्षा विशेषज्ञ हैं,सबने भारत की प्रशंसा की कि किस तरह से चार दिन में किसी देश ने युद्ध जीत लिया, लेकिन भारत में विपक्ष और खासतौर से कांग्रेस पार्टी उस पर सवाल उठाते रहे। विदेशी एनजीओ,विदेशी संस्थाओं,विदेशी नागरिकों की मदद लेकर भारत सरकार और प्रधानमंत्री पर हमला करते रहे। विपक्ष को उम्मीद थी कि जैसे श्रीलंका,बांग्लादेश, नेपाल में आंदोलन हुआ और सत्ता बदल गई वैसे ही भारत में हो जाएगा,लेकिन उनकी उम्मीद पर लगातार इस देश के लोग पानी फेरते रहे। विपक्ष के पास अब कोई मुद्दा नहीं बचा है। लेकिन बेशर्मी का आलम यह है कि इसके लिए वह माफी नहीं मांगेंगे कि वह गलत थे। एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ-साफ कहता है कि विपक्ष के सारे आरोप तथ्यहीन थे। इस मामले में पहले जनता की अदालत ने अपना फैसला सुनाया,अब कानून की अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। दोनों का फैसला एक ही है कि इस सरकार की लेजिटिमेसी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)