महिला अधिकारों के विरोध में खड़े होना उसी सोच का परिणाम।

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प्रदीप सिंह।
क्या जनतंत्र के जरिए कोई डिक्टेटर बन सकता है? आप कहेंगे कि इसका तो बड़ा सीधा सा उदाहरण हिटलर और मुसोलिनी हैं। ये लोग चुनाव के जरिए जीत कर आए और बाद में डिक्टेटर बन गए। लेकिन अपने देश में भी एक परिवार है,जो डिक्टेटर और डेमोक्रेट दोनों की भूमिका में रहता है। इसके कुछ मौलिक सिद्धांत हैं, जिनके आधार पर यह परिवार अपने तंत्र या विचारधारा को चलाता है। इसके सात सूत्र हैं।
पहला ये धारणा कि जनतंत्र एक बाधा है, जिसे दूर किया जाना चाहिए या कम से कम सीमित किया जाना चाहिए। दूसरा मौलिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भारत की संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। तीसरा सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहने के लिए अधिनायकवाद जरूरी है। चौथा अधिनायकवाद संसदीय व्यवस्था से निकलना चाहिए। तभी आप डेमोक्रेटिक बने रह सकते हैं। पांचवां एक व्यक्ति की चले। वह जो कहे उसी को सच माना जाए। छठा आम जनता को मौलिक अधिकारों से वंचित रखो और सातवां देश कभी आत्मनिर्भर न बनने पाए। वह इस परिवार और इस परिवार की सत्ता पर निर्भर बना रहे। वह परिवार है नेहरू-गांधी परिवार। यह जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुआ,जिन्हें कांग्रेसी इतिहासकार देश का सबसे बड़ा डेमोक्रेट बताते हैं जबकि उनका स्वभाव इसके ठीक विपरीत था। इसके प्रमाण उनके कार्यकलापों में बिखरे पड़े हैं। 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र बना और 12 मई 1951 को जवाहरलाल नेहरू की सरकार संसद में पहला संविधान संशोधन विधेयक लेकर आ गई। अब आप देखिए संविधान लागू होने के चंद माह बाद ही यह संविधान संशोधन आ गया जबकि नेहरू की संविधान सभा में बड़ी प्रभावी भूमिका रही थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह संविधान संशोधन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए लाया गया। दो पत्रिकाओं रोमेश थापर की क्रॉस रोड्स और संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर पर प्रतिबंध लगाया गया। कहा गया कि ये सरकार की नीतियों की आलोचना कर रही हैं। इसकी वजह से लोगों को अपराध की ओर उकसाया जा रहा है।
नेहरू के कई साथियों का कहना था कि नेहरू को संविधान बनने के बाद ही आम नागरिकों को संवैधानिक स्वतंत्रता देने पर अफसोस होने लगा था। संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को अलग-अलग अधिकार दिए। न्यायपालिका में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट, कार्यपालिका में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री और विधायिका में सांसद थे। नेहरू का विरोध यहीं से शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि ये तीनों बराबर नहीं हो सकते। न्यायपालिका और विधायिका पर कार्यपालिका का प्रभुत्व होना चाहिए। यानी वह कार्यपालिका के मुखिया प्रधानमंत्री का प्रभुत्व चाहते थे। अब इसके बाद उनकी डिक्टेटरशिप की प्रवृत्ति के बारे में और क्या शंका रह जाती है? सरकार ने विपक्ष को इस बिल को पेश करने की सूचना भी नहीं दी। नेहरू ने इस पर भाषण देते हुए कहा कि मौलिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ये दोनों अवधारणाएं फ्रेंच रिवोल्यूशन से ली गई हैं, इनका भारत की सभ्यता-संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। हैरत की बात तो यह रही कि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही यह संविधान संशोधन हो गया। तो नेहरू को आलोचना और निंदा करने वालों को दंडित करने का कानूनी अधिकार मिल गया और नागरिकों के अधिकारों के तिरस्कार का रास्ता खुल गया।
इस परिवार के दूसरे सदस्य नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में इमरजेंसी लगाकर लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए। यहां तक कि जीने का अधिकार भी छीन लिया। अगर पुलिस आपको किसी वजह से गोली मार दे तो आप मुकदमा भी नहीं कर सकते थे। सुप्रीम कोर्ट के जिन जजेस ने इस कानून को गलत माना उनको सजा मिली। उनको सुपरसीड और इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया। उनके समय में कांग्रेस का नारा था-इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा। इसी कारण 1977 में इंदिरा गांधी हार गईं। लेकिन उसके बाद भी इस परिवार और कांग्रेस ने अपना रास्ता बदलने की कोई कोशिश नहीं की। इंदिरा गाधी के बेटे राजीव गांधी सिर्फ 5 साल प्रधानमंत्री रहे। वह 414 सीटें जीत कर आए थे। इतना प्रचंड बहुमत न इससे पहले किसी को मिला और न इसके बाद। पूरे विपक्ष का सफाया हो गया। चुनाव जीतने के बाद राजीव ने पहला काम क्या किया? वह दलबदल विरोधी कानून लाए। संविधान संशोधन के जरिए दलबदल पर रोक लगाई गई। इस संशोधन से पहले भारत के संविधान में पार्टी शब्द नहीं था। इस संशोधन के बाद आया और इसका नतीजा क्या हुआ? पार्टी का अधिनायकवाद और कांग्रेस के संदर्भ में कहे तो परिवार का अधिनायकवाद। यानी सांसद की यह स्वतंत्रता छीन ली गई कि वह किसी विषय पर जिस तरह से चाहे अपनी प्रतिक्रिया या वोट दे। पार्टी जो कहेगी उसे उसके अनुसार करना होगा। जब यह कानून बना उस समय दलबदल जैसा खतरा सरकार को बिल्कुल नहीं था। कोई ऐसी पार्टी नहीं थी जो कांग्रेस के कुछ सांसदों को तोड़कर वैकल्पिक सरकार बना सके। लेकिन यह कानून इसीलिए आया क्योंकि राजीव गांधी के दिमाग में वही बात थी कि पार्टी और सरकार पर परिवार का कब्जा होना चाहिए। मतभेद या आलोचना की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। राजीव गांधी ने केवल इतना ही नहीं किया। वह बिहार प्रेस बिल लेकर आए। उसमें किसी भी मामले में डिफेमेशन हो सकता है और उस मीडिया हाउस या पत्रकार के खिलाफ एक्शन लिया जा सकता है। राजीव गांधी तो पोस्टल बिल भी लेकर आए थे। जिसमें सरकार को अधिकार दिया गया था कि वह आपके निजी पत्र पढ़ सकती है। लेकिन उसी बीच राजीव गांधी और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह में खटपट हो गई। संसद से पास होकर यह बिल राष्ट्रपति के पास पहुंचा तो उन्होंने मंजूरी नहीं दी। उसको रखे रहे। कल्पना कीजिए कि अगर 1989 में फिर से राजीव गांधी जीत जाते तो क्या करते?
राजीव गांधी के बाद इस परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बन पाया, लेकिन सोनिया गांधी इनमें सबसे शातिर राजनेता निकलीं। उन्होंने एक हाइब्रिड मॉडल डेवलप किया कि पद मत लो, पद के सारे अधिकार ले लो। इसी हाइब्रिड मॉडल से नेशनल एडवाइज़री कमेटी निकली, जो कानून का ड्राफ्ट तैयार करती थी और उसको मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल जस का तस पास करता था। मनमोहन सिंह सिर्फ कठपुतली प्रधानमंत्री थे। महारानी की तरह सोनिया ने 10 साल राज किया।
तो महिलाओं को अधिकार न मिलें, यह इस परिवार और कांग्रेस की उसी सोच का परिणाम है। इस परिवाार ने हमेशा से यही किया कि आम लोगों को अधिकारों से वंचित रखो और आत्मनिर्भर न बनने दो। जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तब महिला आरक्षण बिल राज्यसभा से पारित हुआ। बीजेपी ने समर्थन किया। लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत था। वह पास करा सकती थी,लेकिन नहीं कराया। 2023 में इसे पास कराने के लिए कांग्रेस सिर्फ इसलिए साथ आई क्योंकि उसे मालूम था कि भाजपा के पास दो तिहाई बहुमत है। वह चाहकर भी रोक नहीं सकती। 2026 में उसे मौका मिला तो उसने फिर यह बिल गिरा दिया। लेकिन इस बार यह परिवार और कांग्रेस पार्टी पूरी तरह एक्सपोज हो गई हैं। बिल के खिलाफ सोनिया गांधी लेख लिखने लगीं। राहुल गांधी संसद में कहानी सुनाने लगे। प्रियंका वाड्रा बहाने बनाने लगीं। अब नैरेटिव कांग्रेस के हाथ से बहुत तेजी से फिसल रहा है। इस मुद्दे पर अब उसके पास बचाव का कोई तर्क रह नहीं गया है। लेकिन अंतिम फैसला तो जनता जनार्दन को ही करना है। उसका एक ट्रेलर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव नतीजों में दिखेगा। यह लड़ाई आने वाले दिनों में और इंटरेस्टिंग होने वाली है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)