ब्रिटेन में ट्रेन सफर का एक अनुभव

#santoshtiwariडॉ. संतोषकुमार तिवारी।
जनवरी 1991 की बात है। मैं ब्रिटेन के कार्डिफ विश्वविद्यालय में पीएच.डी. कर रहा था। इसके लिए मुझे ब्रिटिश सरकार ने स्कालरशिप दी थी।

जनवरी महीने में वहां कड़ाके की ठंड थी। कुछ दिनों पहले बर्फबारी हुई थी। तेज हवाएँ चल रहीं थीं। इस कारण ठंड और भी बढ़ गई थी। मैं अपने पीएच.डी. शोधकार्य के सिलसिले में सबेरे कार्डिफ से लन्दन आया था। परंतु जल्दबाजी में अपना वूलेन कोट कार्डिफ में ही अपने कमरे में भूल गया था और एटीएम कार्ड भी भूल गया था। दिन तो जैसे-तैसे लन्दन में गुजर गया, परन्तु रात में ठंड बहुत हो गई। रात में जब लंदन से कार्डिफ वापस जाने लगा, तब मुझे पता चला कि कार्डिफ जानेवाली आखिरी ट्रेन लन्दन से जा चुकी है। तब मेरे सामने समस्या खड़ी हो गई कि जेब में पर्याप्त पैसे भी नहीं हैं और उस भयंकर जाड़े में रात स्टेशन पर कैसे काटी जाए?

लंदन में पैडिंगटन स्टेशन से मुझे कार्डिफ की ट्रेन पकड़नी थी। रात के कोई आठ बजे होंगे। स्टेशन पर घना कोहरा छाया हुआ था। सब तरफ सन्नाटा था। वहाँ रात में स्टेशनों पर सन्नाटा हो जाता है। बड़ी मुश्किलसे मुझे एक रेल कर्मचारी दिखाई पड़ा। मैंने उससे पूछा, ‘मुझे कार्डिफ जाना है। कौन-सी ट्रेन जाएगी?’

‘लास्ट ट्रेन टु कार्डिफ हैज गॉन’ (अर्थात कार्डिफ जानेवाली आखिरी ट्रेन जा चुकी है)। उसने बताया कि अगली ट्रेन तो सुबह ही जाएगी।

अब मेरे सामने संकट खड़ा हो गया कि रात कहाँ गुजारी जाए? कोट के बिना खूब जाड़ा लग रहा था। जेब में इतने ज्यादा पैसे भी नहीं थे कि किसी होटल (बेड एंड ब्रेकफास्ट) में जाकर रुक जाऊँ।

मैंने स्टेशन पर किसी आदमीको ढूँढ़ मेंकर पूछा, ‘यहाँ कोई वेटिंग-रूम (यात्री प्रतीक्षालय) है?’

‘वेटिंग-रूममें तो मरम्मत चल रही है।’

उसने सुझाव दिया कि मैं स्टेशन के खम्भे के किनारे बैठकर रात गुजार दूँ और सुबह ट्रेन पकड़कर कार्डिफ चला जाऊँ।

मैंने कहा, ‘इस तरहसे बैठने में तो मेरी कुल्फी बन जाएगी।’

वह मेरी समस्या सुलझा नहीं सका।

तब मैं पैडिंगटन स्टेशन की पुलिस चौकी पर गया कि शायद वे मेरी समस्या का कुछ हल निकाल सकें। परन्तु वहाँ पर एक आदमी नशे में धुत खड़ा था और उसका पुलिस वाले से झगड़ा हो रहा था। इस कारण मैं वहाँ से भी खिसक लिया; क्योंकि मुझे लगा कि  वातावरण बहुत तनावपूर्ण है और मेरी सुनवाई नहीं हो पाएगी।

इंग्लैंड की पुलिस से मदद की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन मुझे मदद नहीं मिली।

अचानक मुझे रॉयल मेल (ब्रिटेनके पोस्ट-आफिस) की एक लाल रंग की वैन स्टेशन पर खड़ी दिखी। उसके  ड्राइवर के पास मैं गया और उसको अपनी राम-कहानी  सुनायी।

ड्राइवर ने सुझाव दिया कि सामने जो ट्रेन खड़ी है, उसमें जाकर मैं बैठ जाऊँ। उस ट्रेन के डिब्बों में हीटिंग की व्यवस्था है। अर्थात् सभी डिब्बों में पर्याप्त गर्मी है और वह ट्रेन ब्रिस्टल पार्कवे तक जा रही है। कार्डिफ स्टेशन ब्रिस्टल पार्कवे के बाद पड़ता है। उसने सुझाव दिया कि मैं ब्रिस्टल पार्कवे तक उस ट्रेन से चला जाऊँ और वहाँ पर कोई-न-कोई वेटिंग-रूम जरूर होगा। उस वेटिंग-रूम में रात गुजारूँ और सवेरे वहाँ से ट्रेन पकड़ कर कार्डिफ चला जाऊँ।

मुझे उसका सुझाव बड़ा व्यावहारिक लगा और मैं उस ट्रेन में जाकर बैठ गया। बैठते ही जाड़े से मुक्ति मिलने लगी। ट्रेन लगभग खाली थी।

थोड़ी देर बाद टी.टी.ई. आया मेरे पास। उसको फिर मैंने अपनी रामकहानी सुनाई। मेरी समस्या को सुनकर उसने कहा कि वह सबका टिकट चेक कर ले, फिर बाद में मुझसे बात करेगा।

थोड़ी देर बाद सबका टिकट चेक कर के वह मेरे पास आया। उसके हाथ मे बड़ी मोटी-सी एक रेलवे की पुस्तक थी। मेरे बगल में  बैठकर उसने उस किताब में यह ढूँढ़ना चाहा कि ब्रिस्टल पार्कवे में कोई वेटिंग रूम है या नहीं।

उसने मुझे सुझाव दिया कि मैं ब्रिस्टल पार्कवे के बजाय ब्रिस्टल पार्क मीड पर उतर जाऊँ। ब्रिस्टल पार्क मीड पहले पड़ता है और उसके बाद ब्रिस्टल पार्कवे आता है।

उसने कहा कि ब्रिस्टल पार्क मीड में सवेरे मुझे जल्दी ट्रेन मिल जाएगी, लेकिन उसको उस मोटी पुस्तकसे ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि ब्रिस्टल पार्क मीड पर कोई वेटिंग-रूम है या नहीं।

उसके सुझावके अनुसार मैं उस जाड़े की रात में ब्रिस्टल पार्क मीड पर उतर गया। मैं अकेला यात्री था, जो कि उस स्टेशन पर उतरा था। पूरे प्लेटफार्म पर सन्नाटा था। बड़ी मुश्किल से घने कोहरे के बीच एक आदमी दिखायी पड़ा।

तो मैंने उससे पूछा, ‘यहाँ कोई वेटिंग रूम है?’

‘वेटिंग-रूम तो नहीं है, परंतु आप स्टेशन मास्टर से जाकर मिल लें।’

मैं स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। वहाँ एक लड़का बैठा था, जो कि रेलवे का कोई कर्मचारी ही था। शायद सहायक स्टेशन मास्टर रहा होगा। मैंने उसको बताया कि मैं भारतसे हूँ और और आज यहाँ इस-इस तरहसे मुसीबत में फँस गया हूँ।

उसने मुझसे पूछा, ‘आपने खाना खाया या नहीं?’

हालाँकि मैंने खाना नहीं खाया था, पर उससे कहा, ‘हाँ, खा चुका हूँ।’

फिर उसने बताया कि यहाँ पर कोई वेटिंग रूम तो नहीं है, पर मैं आपके रात काटने की व्यवस्था कर दूँगा।

उसके इस आश्वासन से मुझे बड़ी राहत हुई। उसने कहा, ‘फॉलो मी’ (मेरे साथ आइए)।

फिर उसने एक बहुत बड़ा कमरा, जिसमें कई बड़े-बड़े सोफे पड़े थे, मेरे लिए खोल दिया।

उसने मुझसे कहा, ‘इस कमरे में हीटिंग अर्थात् गर्मी की पर्याप्त व्यवस्था है और यहाँ मैं अपनी रात गुजार सकता हूँ।’

उसकी सिर्फ एक ही शर्त थी।

‘आप कमरे के अन्दर लाइट न जलाएं। ताकि – बाहर से किसीको ये पता न चले कि इस कमरे में कोई रह रहा है।’

परन्तु खिड़की-दरवाजोंके शीशों से बहुत अधिक रोशनी बाहरसे कमरेके अन्दर आ रही थी। इस कारण कमरेके अन्दर लाइट जलाने की कोई जरूरत ही न थी।

मैंने वह रात उस कमरेके एक लम्बे सोफे पर सोकर आराम से गुजारी।

सबेरे मुझे तब बहुत आश्चर्य हुआ जबकि उसी व्यक्तिने मेरे कमरेके दरवाजे के शीशे को खटखटाया और कहा, ‘योर ट्रेन टु कार्डिफ इज रेडी’ (कार्डिफ जानेवाली आपकी ट्रेन तैयार खड़ी है।)

मैंने शीघ्रतापूर्वक उठकर उस कमरे से लगे बाथरूममें हाथ-मुँह धोया और कार्डिफ की ट्रेन पकड़ ली।

मुझे नहीं मालूम कि उस व्यक्ति का क्या नाम था, परंतु ऐसा लगा कि शायद भगवान ने उसे उस रात मेरी मदद करने के लिए वहाँ भेजा था।

(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)