जब पेट पर लात पड़ेगी तो दर्द होगा ही।
प्रदीप सिंह।इस समय जो घटनाक्रम चल रहा है उससे एक नया मुहावरा दिमाग में आया है कि बेशर्मी जब हद से गुजर जाए तो वह कपिल सिब्बल बन जाती है। कपिल सिब्बल का दुख समझिए। अभिषेक बनर्जी पर अंडे फेंके गए तो वह इतना दुखी हुए कि बोलने लगे-अब यह देश रहने लायक नहीं रह गया है। तो पूरा देश पूछ रहा है- कपिल सिब्बल जी देश कब छोड़ रहे हैं? आप जल्दी से जल्दी देश छोड़ दें। इससे आतंकवादियों और भ्रष्टाचारियों की वकालत करने वाला,उनको जमानत दिलाने वाला और उनके लिए आधी रात में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवाने वाला एक व्यक्ति कम हो जाएगा। इससे देश का भला होगा। उनके देश छोड़कर जाने का स्वागत किया जाना चाहिए बल्कि चंदा जुटाकर उनको जहां जाना चाहें वहां का टिकट दे देना चाहिए।
कपिल सिब्बल की दूसरी तकलीफ है कि जनतंत्र खत्म हो गया। वह कह रहे हैं कि अभिषेक बनर्जी के साथ जो हुआ,उसके बाद भारत में रहने पर शर्म आती है। देश छोड़ने का मन हो रहा है क्योंकि उनको डर लग रहा होगा कि ऐसा दिन भी आ सकता है जब उनके साथ भी अभिषेक बनर्जी जैसा व्यवहार हो। कपिल सिब्बल नामी वकील कैसे बने,यह भी जान लेना चाहिए। लोकसभा में जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ इंपीचमेंट मोशन आया था। उन पर भ्रष्टाचार का आरोप था। उनके बचाव में कपिल सिब्बल खड़े हुए थे। तब पूरे देश ने जाना कि कपिल सिब्बल नाम का कोई वकील है। तब से सारे भ्रष्टाचारियों के बीच संदेश चला गया कि अगर कानून की सजा से बचना है तो कपिल सिब्बल की शरण में जाओ। उसके बाद जिस तरह से उन्होंने एक के बाद एक आतंकवादियों का केस लड़ा। उनके और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे कई वकील हैं, जो आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवाने की ताकत रखते हैं। ऐसे लोग देश छोड़ दें तो बहुत अच्छा हो। कपिल सिब्बल से पूछा जाना चाहिए कि जब आरजी कर में युवा डॉक्टर के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या हुई तब आपकी शर्म और नैतिकता कहां थी? मतलब आप ऐसे देश में रहना चाहते हैं, जहां युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार औैर उनकी हत्या हो। जब संदेश खाली कांड हुआ तब आपको नहीं लगा कि यह देश छोड़ने लायक है। जब आतंकवादियों के बचाव में आप सुप्रीम कोर्ट में खड़े होते हैं तब आपको नहीं लगता है कि यह देश रहने लायक नहीं है। तब आप उनके बचाव में खड़े होते हैं,उनको सजा से बचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे व्यक्ति की भारत को तो जरूरत नहीं है। अब बलात्कारी,भ्रष्टाचारी और आतंकवादियों के दुर्दिन आ रहे हैं और उनको सजा मिल रही है तो आपको तकलीफ हो रही है।

असल में कपिल सिब्बल की तकलीफ के दो कारण हैं। पहला, भारत के खिलाफ वह जो पॉलिटिकल नैरेटिव चला रहे थे,उसको चलाने का अवसर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। अब उनके लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा आधी रात को नहीं खुलता। उनके कहने पर तुरंत सुनवाई भी नहीं होती। अब वह स्थिति नहीं रही कि कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में पहुंचें और जज साहब लोग कहें- जी हुजूर। वह समय चला गया। उनको इसका दर्द है। उनके लिए अब आतंकवादियों और भ्रष्टाचारियों का केस लड़ना मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि जांच एजेंसियां ईमानदारी से काम करने लगी हैं। सरकार की मंशा उनको सजा दिलाने की है। कुछ अदालतें भी इन मामले में सजग हुई हैं कि आतंकवादियों और भ्रष्टाचारियों को बचना नहीं चाहिए। तो इसलिए उनको और मुश्किल हो रही है। और सबसे बड़ा अत्याचार तो क्रिश्चियन मिशनरीज का नैरेटिव चलाने वाले कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंह जैसे तमाम वकीलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। इन पर एफसीआरए का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। विदेशी फंडिंग पर शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। संसद में लंबित एफसीआरए अमेंडमेंट बिल के मानसून सत्र में पारित होने की पूरी उम्मीद है। इससे विदेश से पैसा लेना और मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर भी अत्याचार किया। अब वहां से कपिल सिब्बल जैसों को पैसा मिलना कम हो गया। वरना कांग्रेस पार्टी के पास तो भ्रष्टाचाार के केसों की कोई कमी थी नहीं। उसके बाद आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल से भी इनको बेधड़क पैसा मिलता था। तो आम आदमी पार्टी को भी उन्होंने सत्ता से बाहर कर दिया। केजरीवाल के बचाव में दिल्ली सरकार से इन्हें जो मोटी फीस मिलती थी,वह मिलना बंद हो गई। इसके अलावा आपको याद है कि आजम खान को सुप्रीम कोर्ट से बेल दिलाने वाले यही कपिल सिब्बल थे। आप गिनते जाइए,आपको रुकना नहीं पड़ेगा कि कितने भ्रष्टाचारियों और आतंकवादियों का केस कपिल सिब्बल ने लड़ा है। तो दरअसल उनके पेट पर लात पड़ी है। तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी की सरकार भी इनकी आय का बड़ा साधन थी। हर समय हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट उनका कोई न कोई केस लगा ही रहता था और ममता बनर्जी को अपनी जेब से तो पैसा देना नहीं था। सरकार का पैसा देना था तो इसलिए खूब दरियादिली दिखाती थीं। अब वहां से भी पैसा मिलने का रास्ता बंद हो गया। तो एक तो केस और पैसा मिलना कम हो रहा है और नए रास्ते खुलने के बजाय एक-एक करके बंद होते जा रहे हैं। तो कपिल सिब्बल की यह जो परेशानी है उसको समझिए। उसके अलावा उनकी प्रसिद्धि पर भी लात पड़ रही है। अब कोई केस जीत नहीं पा रहे हैं जबकि पहले यह बताना मुश्किल था कि कौन सा केस हारे?

कपिल सिब्बल यूपीए सरकार में टेलीकॉम मिनिस्टर थे। 2जी घोटाले में इन्होंने बड़ी लंबी चौड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उसमें इन्होंने नया सिद्धांत दिया कि 2जी घोटाले में एक पैसे का भी नुकसान नहीं हुआ। मतलब घोटाला हुआ लेकिन कोई लॉस नहीं हुआ। जबकि यह बिल्कुल खुला मामला था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसकी जांच हुई थी। हालांकि लोअर कोर्ट ने जो घोटाले के आरोपी थे उन सबको बरी कर दिया था। लेकिन उसका कारण भी जान लीजिए। जो जांच रिपोर्ट अदालत में पेश हुई वह यूपीए सरकार के समय की थी। जज ने अपने फैसले में कहा कि जो प्रमाण थे, वह पेश ही नहीं किए गए। इस मामले में सीबीआई हाईकोर्ट जाने वाली थी। अगर नहीं गई तो मुझे नहीं मालूम कि क्यों नहीं जा रही। वरना 2जी घोटाले में जितने आरोपी हैं, उन सबको सजा होना तय लगता है। इसके अलावा कपिल सिब्बल को 2014 में चांदनी चौक की जनता ने भी रिजेक्ट कर दिया। चुनाव हार गए तो कांग्रेस पार्टी में भी उनकी स्थिति खराब होने लगी। कांग्रेस से बाहर हो गए। फिर उनको याद आया कि राज्यसभा भी तो जाना है। उनके और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकील राज्यसभा जाने का रास्ता खोजते ही रहते हैं। तो कपिल सिब्बल अखिलेश यादव के पास गए और इंडिपेंडेंट लड़े जबकि अखिलेश यादव की पार्टी ने उनका समर्थन किया। अब लखनऊ और समाजवादी पार्टी के हलकों में चर्चा है कि सौदा इस बात पर हुआ कि उनको राज्यसभा भेजेंगे और बदले में वह आजम खान को जमानत दिलाएंगे। दोनों का काम हो गया।
अब यही कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि देश रहने लायक नहीं है, लेकिन आप लिखकर ले लीजिए वह देश को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। क्योंकि इतना पैसा और राज्यसभा की सीट जैसा लाभ और कहीं नहीं मिलेगा। वह तैयारी कर रहे हैं कि अगली राज्यसभा की सीट कहां से आए। तो उसके लिए एक मोटा आसामी चाहिए जो भ्रष्टाचार या आतंकवाद में फंसा हो और जिसका कोई पॉलिटिकल संरक्षक हो तो सौदा पट जाएगा। यह सब करते हुए कपिल सिब्बल को शर्म नहीं आती है। तब उनको नहीं लगता कि यह देश रहने लायक नहीं रह गया है। तब उनको नहीं लगता कि इस देश में जनतंत्र खत्म हो गया है। याद रखिए इस देश में जनतंत्र को खत्म करने वाली कांग्रेस पार्टी ही उन्होंने ज्वाइन की थी। इसी कांग्रेस ने 1975 में इमरजेंसी लगाई। संविधान का गला घोट दिया। लोगों के मौलिक अधिकार खत्म कर दिए। लेकिन कपिल सिब्बल को तब कभी नहीं लगा कि जनतंत्र खत्म हो रहा है। एक बार भी अपने जीवन में उन्होंने नहीं कहा कि कांग्रेस पार्टी ने इस देश में जनतंत्र खत्म किया। जब कांग्रेस में यह लगने लगा कि अब राज्यसभा की सीट नहीं मिलेगी तो उनको अचानक सिद्धांत याद आ गया। याद आ गया कि राहुल गांधी ठीक से पार्टी नहीं चला रहे हैं। तो पार्टी से बाहर गए और राज्यसभा मिल गई। इसके बाद फिर वह कांग्रेस पार्टी के समर्थन में बोलने लगे। लेकिन आप क्या करेंगे? देश में ऐसे ही लोगों का बोलबाला रहा है। अब उनकी समस्या यह है कि उनका बोलबाला खत्म हो रहा है। उनका जो एक छत्र राज्य था वह साम्राज्य ढह रहा है। इसलिए उनका दर्द दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। एक के बाद एक उनके आर्थिक स्रोत सूखते जा रहे हैं। तो कपिल सिब्बल को अभिषेक बनर्जी पर अंडा फेंके जाने से शर्म आ गई। अब इस शर्म को क्या कहें? यह शर्म नई-नई है क्योंकि पेट पर लात पड़ी है। पेट पर जब लात पड़ती है तो बहुत कुछ याद आने लगता है। आप इंतजार कीजिए अभी इस तरह की घटनाएं और बहुत सी होने वाली हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








