उनकी व्यूह रचना ने बेटे को तो प्रधानमंत्री बनवा दिया लेकिन देश दे दिया बड़ा घाव ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजनीति बड़ी निष्ठुर होती है,लेकिन कितनी निष्ठुर हो सकती है इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। चुनाव जीतने के लिए राजनेता किस सीमा तक जा सकते हैं, इसको समझना है तो आपको थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।
1980 में जनता पार्टी को हराकर इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आ गई थीं,लेकिन एक-डेढ़ साल बाद ही उनकी सरकार की लोकप्रियता कम होने लगी थी। उनको आशंका थी कि 1985 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी फिर से हार जाएगी। उन्हीं दिनों चंद्रशेखर ने अपनी पदयात्रा शुरू की थी और उसको बड़ा समर्थन मिल रहा था। विपक्ष एक हो रहा था। इन परिस्थितियों में इंदिरा गांधी को समझ में नहीं आ रहा था कि 1985 की जीत सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जाए। तो उन्होंने जो किया आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। उन्होंने भिंडरावाले को खड़ा किया और भिंडरावाले ने खालिस्तानी आंदोलन खड़ा किया। भिंडरावाले सरकार के संरक्षण के बिना कुछ नहीं कर सकता था। जब उसकी ताकत बढ़ने लगी तब रॉ के चीफ आर्यन काऊ की टीम ने योजना बनाई कि भिंडरावाले को स्वर्ण मंदिर से निकाला जाए यानी उसका अपहरण किया जाए। उसके लिए एक ऑपरेशन सनडाउन तैयार किया गया। जिसमें तय हुआ कि आर्मी कमांडो को लेकर दो हेलीकॉप्टर जाएंगे जबकि सीआरपीएफ स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ घेरा डाल देगी ताकि ऑपरेशन पूरा होने तक न तो कोई स्वर्ण मंदिर में जा पाए और न कोई बाहर आ पाए। यह पूरा आपरेशन कांग्रेस पार्टी का रचा हुआ एक चक्रव्यूह था। जब यह ऑपरेशन प्लान हुआ तो पहले सहारनपुर में स्वर्ण मंदिर का एक मॉडल बनाकर उसमें प्रैक्टिस हुई कि कैसे कमांडो उतरेंगे और भिंडरावाले को निकालेंगे। यह ऑपरेशन अप्रैल 1984 में होना था तो उसके पहले इसके बारे में प्रधानमंत्री को ब्रीफ किया जाना था। आर्यन काऊ और आंध्र कैडर के एक आईपीएस अधिकारी नागरानी इस आपरेशन के दो मुख्य किरदार थे। नागरानी ने इंदिरा गांधी को पूरा प्लान बताया कि कैसे हेलीकॉप्टर जाएंगे और प्रवचन के दौरान कैसे भिंडरावाले को उठाया जाएगा। इंदिरा गांधी ने नागरानी से पूछा कि इस आपरेशन में कैजुअल्टीज कितनी होंगी तो उनको बताया गया कि दोनों हेलीकॉप्टर खत्म हो सकते हैं। उसके अलावा 20% कमांडो मारे जा सकते हैं। आपरेशन में कुल 24 कमांडो जाने थे तो एक अनुमान के अनुसार लगभग पांच कमांडो मारे जा सकते थे। इसके अलावा भिंडरावाले की सिक्योरिटी में जो लोग थे, वे मारे जा सकते थे। चूंकि यह आपरेशन बैसाखी के दिन होना था तो इंदिरा गांधी ने पूछा कि सिविलियन कैजुअल्टी कितनी होने की उम्मीद है। नागरानी बोले उनमें से भी 20% मारे जा सकते हैं। इस पर इंदिरा गांधी ने कहा कि इतनी सिविलियन कैजुअलिटी का भार हम नहीं उठा सकते और ऑपरेशन को रद्द कर दिया गया। हालांकि इसको रद्द करने के और कारण भी थे। भिंडरावाले को पकड़ने के बाद उसकी गिरफ्तारी दिखाकर जेल भेजा जाना था। लेकिन भिंडरावाले के खिलाफ देशभर में एक भी एफआईआर दर्ज नहीं थी। दो और आशंकाएं थीं। गिरफ्तारी के बाद जब उससे पूछताछ होगी तो उसमें उसके कांग्रेस नेताओं के साथ संबंधों की बात बाहर आ सकती थी। दूसरा कोई केस न होने से वह गिरफ्तारी के बाद आसानी से छूट जाता। साथ ही उसकी गिरफ्तारी के बाद खालिस्तानी आतंकवादी पूरे देश में आतंक का नंगा नाच कर सकते थे।
लेकिन इंदिरा गांधी का लक्ष्य कुछ और था। उनका लक्ष्य था 1985 का लोकसभा चुनाव जीतना। इतनी आसानी से भिंडरावाले को पकड़ कर जेल में डाल दिए जाने से इंदिरा गांधी को कोई वाहवाही नहीं मिलने वाली थी। तो भिंडरावाले की ताकत और बढ़ने दी गई। इसीलिए जब स्वर्ण मंदिर में हथियार जा रहे थे तो सरकार ने ध्यान नहीं दिया। जो इंदिरा गांधी अप्रैल 1984 में ऑपरेशन सनडाउन के लिए इसलिए तैयार नहीं हुईं कि कुछ सिविलियन कैजुअल्टीज का भार हम नहीं उठा सकते। उन्हीं इंदिरा गांधी ने 3 जून 1984 को हुई सिविलियन कैजुअल्टी के बारे में जरा नहीं सोचा जब अकाल तख्त पर धावा बोला गया। उस आपरेशन ब्लू स्टार के बाद हिंसा में कितने लोग मारे गए, इस सबकी भी कोई चिंता नहीं की गई। इस आपरेशन की ब्रीफिंग के दौरान इंदिरा गांधी ने आर्यन काऊ और नागरानी से कहा था-मुझे मालूम है कि आतंकवादी एक दिन मेरी हत्या कर देंगे लेकिन मुझे इसकी चिंता नहीं है। मुझे चिंता है कि उसके बाद मेरे बच्चों का क्या होगा। इंदिरा गांधी ने एक बार भी इस बात की चिंता नहीं की कि देश का क्या होगा? यह जो भिंडरावाले नाम का भस्मासुर खड़ा किया गया है उसका नतीजा क्या होगा? उससे देश और पंजाब का कितना बड़ा नुकसान होगा? पंजाब की राजनीति, सामाजिक जीवन और उसके अलावा हिंदू-सिख एकता पर कितना बड़ा असर पड़ेगा। उनको चिंता थी तो सिर्फ इस बात की कि उनके बाद उनके बच्चों का क्या होगा? उनको चिंता थी कि 1985 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस कैसे जीतेगी।
ऑपरेशन ब्लू स्टार जिस तरह से हुआ सबको मालूम है। स्वर्ण मंदिर में सेना घुसी और दोनों तरफ से जबरदस्त फायरिंग हुई। लेकिन सवाल यह है कि भिंडरावाले को मारना क्यों था, जब उसको गिरफ्तार कर सकते थे। तो उसके पीछे यह डर था कि वह बता सकता है कि सरकार ने उसकी क्या मदद की थी। ऐसे में इंदिरा गांधी की छवि बहुत खराब हो जाती है। तो तय किया गया कि भिंडरावाले की एक्सपायरी डेट आ चुकी है। कांग्रेस और केंद्र सरकार का मानना था कि चूंकि भिंडरावाले का कद काफी बढ़ चुका है और खूब चर्चा होने लगी है तो अब यह सबसे सही समय है जब उसे हमेशा के लिए न्यूट्रलाइज कर दिया जाए। इसलिए ऑपरेशन ब्लू स्टार का मकसद सिर्फ भिंडरावाले और उसके साथियों को मारना था। हालांकि इसका नतीजा पूरे देश ने भुगता और आज तक भुगत रहा है। समय-समय पर यह जिन्न बोतल से बाहर निकल कर आ जाता है। यह सही है कि इंदिरा गांधी की जो आशंका थी कि खालिस्तानी आतंकवादी उनकी हत्या कर देंगे,वह सच साबित हुई, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि दिसंबर 1984 में लोकसभा के जो चुनाव हुए उसमें कांग्रेस पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बन गए। इंदिरा गांधी ने ये जो पूरी व्यूह रचना की थी उसमें से वह खुद तो नहीं निकल पाईं, लेकिन जाते-जाते अपने बेटे को प्रधानमंत्री बनवा गईं।
यह अलग बात है कि राजीव गांधी भी बहुत समय तक सर्वाइव नहीं कर पाए और 89 में चुनाव हार गए। तो इंदिरा गांधी की पूरी व्यूह रचना सिर्फ एक चुनाव तक टिक पाई। उसके बाद लोकसभा के जितने चुनाव हुए कभी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया। वह जोड़तोड़ या गठबंधन के जरिए ही सत्ता में आ पाई। 2014 के बाद अब जो परिस्थिति बनी है उसमें कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में लौटने के कोई आसार नहीं दिखाई देते लेकिन देश को इतना बड़ा घाव कांग्रेस ने दिया, जिसको भरने में मुझे लगता है कि पता नहीं कितने दशक लगेंगे।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)