सात गैर भाजपा नेता पहली बार भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
देश में सात ऐसे गैर भाजपाई नेता हैं जो भाजपा के समर्थन से पहली बार मुख्यमंत्री बने। इनमें पहला नाम आता है मुलायम सिंह यादव का। 1989 में जब मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने उस समय उत्तर प्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था। 425 सीटों की विधानसभा थी और उसमें बहुमत के लिए 213 का आंकड़ा चाहिए था। जनता दल को 208 सीटें मिली थीं। भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया तब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने।
लालू प्रसाद यादव 1990 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तब बिहार का विभाजन नहीं हुआ था। विधानसभा 320 सदस्यों की थी और उसमें बहुमत के लिए 161 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। चुनाव में जनता दल को 122 और बीजेपी को 39 सीटें मिली थीं। बीजेपी के समर्थन से लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने। ऐसे तीसरे नेता हैं शरद पवार। 1978 में उन्होंने बगावत करके कांग्रेस तोड़ी और समानांतर कांग्रेस पार्टी बनाई। उनकी सरकार में जनसंघ शामिल हुई। उत्तम राव पाटिल जनसंघ के नेता थे, जो शरद पवार की सरकार में मंत्री बने। जनसंघ समर्थन न करता तो शरद पवार पहली बार मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। इस कड़ी में चौथा नाम नवीन पटनायक का है। वह 1998 में राजनीति में आए और बीजू जनता दल बनाया। भाजपा ने पहले उनको केंद्र में मंत्री बनाया फिर 1999 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और बीजेडी के गठबंधन को बहुमत मिला। गठबंधन सरकार में पहली बार नवीन पटनायक मुख्यमंत्री बने। यह अलग बात है कि 2009 में उन्होंने यह गठबंधन तोड़ दिया। कश्मीर में पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती भी पहली बार भाजपा के साथ गठबंधन करके मुख्यमंत्री बन पाईं। हालांकि बाद में भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। इसी तरह कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा के बेटे एचडी कुमार स्वामी पहली बार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से मुख्यमंत्री बने। कर्नाटक की हंग असेंबली में कांग्रेस के धर्म सिंह मुख्यमंत्री बने थे लेकिन करीब सवा साल बाद कुमारस्वामी की पार्टी जेडीएस ने उनसे समर्थन वापस ले लिया और भाजपा के समर्थन से कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए। हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला भी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन सके थे। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया था।
ऐसे ही गैर भाजपाई दो और नेताओं की बात करना जरूरी है। हालांकि वे भाजपा के समर्थन से पहली बार मुख्यमंत्री नहीं बने। उसमें पहले नाम आता है चंद्रबाबू नायडू का। चंद्रबाबू नायडू के ससुर एनटी रामराव ने 1983 में नई पार्टी तेलुगु देशम बनाई थी। 1995 में जब रामाराव विदेश गए हुए थे उस समय चंद्रबाबू नायडू ने बगावत की और मुख्यमंत्री बन गए। उसके बाद चंद्रबाबू नायडू तीन बार और मुख्यमंत्री बने और तीनों बार उनके मुख्यमंत्री बनने में भाजपा की भूमिका थी। जब उन्होंने भाजपा से गठबंधन नहीं किया तो चुनाव हार गए। उन्होंने पहली बार 99 और उसके बाद 2004 में भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया था और सत्ता से बाहर रहे। 2014 में फिर भाजपा से गठबंधन किया और फिर मुख्यमंत्री बने। हालांकि आंध्र प्रदेश में भाजपा का कोई बड़ा जनाधार नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का वहां बड़ा असर हुआ। 2018 में नायडू फिर एनडीए से अलग हो गए और फिर सत्ता से बाहर हो गए। 2024 में वह फिर एनडीए में आए और फिर से मुख्यमंत्री बने। उससे पहले लग रहा था जैसे कि उनका राजनीतिक जीवन खत्म हो गया है। इस कड़ी में आखिरी नाम ममता बनर्जी का है। ममता बनर्जी भी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री नहीं बनीं, लेकिन 1998 में वह कांग्रेस से निकलीं और अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई। वह पश्चिम बंगाल में दो दलों कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट से लड़ रही थीं। ऐसे में उनको किसी बाहरी ताकत के समर्थन की जरूरत थी। 1998 में केंद्र में बीजेपी की सरकार बन गई थी तो ममता एनडीए में शामिल हो गईं। अटल जी के मंत्रिमंडल में वह मंत्री भी बनीं, लेकिन बीच में नाराज होकर चली गईं और फिर लौट कर आईं। 98 से 2004 तक जब तक केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही वह ममता बनर्जी का समर्थन करती रही। इससे उन्हें पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और सीपीएम से लड़ने में मदद मिली। हालांकि पहली बार मुख्यमंत्री वह 2011 में अपने दम पर बनीं, लेकिन उनकी शुरुआती राजनीतिक यात्रा में भाजपा सबसे बड़ी मददगार रही। हालांकि आखिर में 2026 में उनका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से ही हुआ और पूरी बाजी पलट गई। भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में 208 सीटें जीत गई। ममता बनर्जी का उसके बाद जो हाल हो रहा है वह इससे पहले किसी पार्टी का नहीं हुआ। तृणमूल कांग्रेस लगातार बिखराव की ओर है। उनके 28 में से 20 सांसदों ने अलग पार्टी बना ली है। उनके 64 विधायकों ने अलग ग्रुप बना लिया है। राज्यसभा के तीन सांसद इस्तीफा दे चुके हैं और बाय इलेक्शन में बीजेपी के उम्मीदवार बनकर फिर से संसद में पहुंच चुके हैं।
भाजपा ने समर्थन देकर जिनको भी मुख्यमंत्री बनवाया उन्हें हमेशा सरकार चलाने दी और किसी को गिराया नहीं। कर्नाटक में भी कुमारस्वामी सरकार से गठबंधन भाजपा ने नहीं तोड़ा था। वह खुद ही मुख्यमंत्री पद को लेकर हुए रोटेशन के समझौते से पलट गए थे। एकमात्र अपवाद पीडीपी का है। दूसरी ओर कांग्रेस ने केंद्र या राज्य में जिन्हें भी समर्थन दिया उन्हें कभी कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया। दोनों पार्टियों के कल्चर में ये फर्क है। भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की राजनीति के मर्म और धर्म को दोनों को समझती है। जबकि कांग्रेस पार्टी इन्हें मानने से इनकार करती है। वह मजबूरी में गठबंधन करती है। 2004 में केंद्र में जो पोस्ट पोल गठबंधन बना वह कांग्रेस की मजबूरी थी। उसके बिना कांग्रेस सत्ता में आ नहीं सकती थी। उसके पहले भी उसने जितनी सरकारों को समर्थन दिया सबको गिराया। शुरुआत चौधरी चरण सिंह से करते हैं। उनको प्रधानमंत्री के रूप में कांग्रेस ने संसद का मुंह नहीं देखने दिया और समर्थन विड्रा कर लिया। उसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने लेकिन चार महीने में उनकी सरकार गिरा दी। फिर देवगौड़ा की सरकार 11 महीने में गिरा दी। इसके बाद इंद्र कुमार गुजराल की सरकार भी 11 महीने में गिरा दी। कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए जिसको भी समर्थन दिया वह केवल टाइम गेन करने के लिए दिया। उसने कई बार मध्यावधि चुनाव का बोझ देश पर डाला। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने ऐसी कोई सरकार नहीं गिराई। उसने 98 से 2004 तक गठबंधन की सरकार केंद्र में चलाई। हालांकि 99 में जयलिता ने समर्थन वापस ले लिया था लेकिन जयललिता से संबंध बीजेपी ने नहीं तोड़ा था, जयललिता ने ही तोड़ा था। 2014 में स्पष्ट बहुमत 283 सीटें और 2019 में 300 सीटें मिलने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन धर्म को निभाया। गठबंधन के साथी दलों को सरकार में शामिल किया जबकि कोई जरूरत नहीं थी। इसीलिए 2024 में जब भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो उसके गठबंधन के साथी उसको छोड़कर नहीं गए। दोनों दलों की कार्य संस्कृति में जब आप अंतर देखेंगे तब समझ में आएगा कि भाजपा की विश्वसनीयता आज इतनी ऊपर क्यों है और कांग्रेस की विश्वसनीयता क्यों धरातल पर पहुंच गई है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)