ऐसे प्रदर्शनों में ‘नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे नारे लगने का क्या मतलब।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
जंतरमंतर पर 20-21 दिन से एक धरने का तमाशा चल रहा था। अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को उनके स्वास्थ्य के मद्देनजर हाईकोर्ट के निर्देश पर अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था जबकि उनके बाद अनशन पर बैठे एक तिलचट्टा पार्टी के नेता अभिजीत दिपके ने दो दिन में ही अनशन को समाप्त करने की घोषणा कर दी। जो रिपोर्ट आ रही हैं, उससे पता चलता है कि अनशन उसके बस की बात ही नहीं है। वह खाता इतना है कि दो-तीन दिन से ज्यादा अनशन कर ही नहीं सकता।
यह बात सही है कि नीट पेपर लीक का मुद्दा छात्रों का जेन्युइन मुद्दा है। यह छात्रों के भविष्य से जुड़ा मामला है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसके लिए जो भी जिम्मेदार हैं, उनको सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन आप देखिए कि आंदोलन किस बात से शुरू हुआ। मुख्य मांग थी कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो,लेकिन सोमवार को सोनम वांगचुक का जो पत्र जारी हुआ है, उसमें धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की बात ही नहीं है तो वह मुद्दा खत्म हो गया। दूसरी बात, यह प्रदर्शन दरअसल हिंदू विरोधी प्रदर्शन है। वहां जो नारे लगाए जा रहे हैं उससे आप अंदाजा लगाइए। नाम रहेगा अल्लाह का। इस नारे से नीट के छात्रों या देश के दूसरे छात्रों का क्या लेना-देना है। यह नारा लगाने वाले,लगवाने वाले और उसका समर्थन करने वाले आखिर कौन लोग हैं। इस प्रदर्शन में आती हैं अरुंधति राय, जो कहती हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। उनका छात्रों के मुद्दों से क्या लेना देना? उसके अलावा शबाना आजमी आती हैं, जो एक क्रिश्चियन एनजीओ के साथ जुड़ी हुई हैं, जो धर्म परिवर्तन का काम कराता है। दरअसल ये लोग नीट पेपर लीक को लेकर परेशान नहीं हैं। इनकी परेशानी हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव और एफसीआरए कानून में संशोधन बिल को लेकर है। यह संशोधन बिल आने से विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल आप धर्मांतरण के लिए नहीं कर सकते। इसकी तकलीफ भारत से लेकर अमेरिका तक है। भारत में धर्म परिवर्तन या मतांतरण के लिए बड़ी मात्रा में पैसा यूएसए और दूसरे यूरोपीय देशों से आता है। भारत में अब आपको यह बताना पड़ेगा कि जो विदेशी फंडिंग मिल रही है, उसका इस्तेमाल किस मद में कर रहे हैं। कहां से पैसा आ रहा है, एनजीओ का मुखिया कौन है। तो मूल परेशानी यह है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में जिस तरह के चुनाव परिणाम आ रहे हैं और हिंदुओं का जिस तरह से पुनर्जागरण हो रहा है,इन लोगों को समस्या उससे हो रही है। यह प्रदर्शन उसके विरोध में है।
सोमवार को हुए प्रदर्शन में करीब 10,000 लोग शामिल थे। इसमें आईसा, लेफ्ट पार्टियों से जुड़े हुए छात्र संगठनों और कुछ कांग्रेस के एनएसयूआई के लोग थे। मतलब सामान्य छात्र इसमें शामिल नहीं थे। सामान्य छात्रों की समस्याएं हैं, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन सवाल है कि दिपके और सोनम वांगचुक का छात्रों की समस्या से क्या लेना देना है? दरअसल इनके मुद्दे दूसरे हैं। ये छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं। इनका असल मुद्दा देश में अराजकता पैदा करना है। इनको उम्मीद थी कि बहुत बड़ी संख्या में लोग आएंगे। देश में जितने एनजीओ हैं, सबने पूरी ताकत लगा दी थी कि 20 जुलाई को बड़ी संख्या में लोग जंतरमंतर पहुंचें। आप देखिए तो इस आंदोलन का भी पूरा टेंपलेट वही है, जो अन्ना आंदोलन के समय था। फर्क यह है कि उस समय अन्ना हजारे के रूप में एक ऐसा नेता था, जिसका कोई राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ नहीं था। जबकि सोनम वांगचुक या दिपके की कोई इमेज नहीं है। इनकी कोई लोकप्रियता नहीं है। इसलिए इनके नाम पर लोग जुड़े नहीं। सोमवार को कुल मिलाकर पूरे विपक्ष का आखिरी प्रयास था। भारत विरोधी शक्तियों की पूरी कोशिश थी कि किसी तरह से राजनीतिक अस्थिरता पैदा की जाए। यह जो राहुल गांधी भविष्यवाणी करते घूम रहे थे कि एक साल में मोदी सरकार गिर जाएगी, अब आप देखिए कि उनको छात्रों की समस्या से कितना लेना देना है। जब नीट पेपर लीक को लेकर आंदोलन चल रहा था तो वह छुट्टी मनाने विदेश चले गए। सोशल मीडिया पर एक फोटो आई है जिसमें राहुल गांधी, एक किशोर और एक महिला किसी बोट पर बैठे हुए हैं। कहां घूम रहे हैं? यह लोग कौन हैं ? इनका राहुल गांधी से रिश्ता क्या है? जाहिर है कि कोई बहुत नजदीकी रिश्ता होगा। तभी तो ऐसे मौके पर जब उनको देश में होना चाहिए था, अपनी पार्टी के साथ होना चाहिए था, वह विदेश में घूम रहे थे। देश में उनके छात्रों की गूंज नाम के दो-तीन प्रोग्राम लगे थे, जो उनकी छुट्टी के कारण रद्द हो गए। आप अंदाजा लगाइए कि सोनम वांगचुक के अनशन में किस तरह के लोग आए। जितने आए वे सब भारत विरोधी, मोदी विरोधी और संघ विरोधी थे।
दिल्ली में सोमवार को प्रदर्शन के दौरान कई लोग संसद भवन के काफी करीब पहुंच गए। मेरा मानना है कि यह पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था की खामी है। आपको दो घटनाओं की याद दिलाता हूं। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान स्वामी रामदेव रामलीला मैदान में विरोध प्रदर्शन के लिए बैठे हुए थे। आधी रात को कांग्रेस सरकार ने पुलिसिया कार्रवाई की। बुरी तरह से लाठी चार्ज किया गया,जिसमें 71 लोग बुरी तरह घायल हुए और अस्पताल में भर्ती कराए गए। उनमें एक महिला को तो आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। इस तरह का अत्याचार हुआ था। इसके अलावा प्रदर्शन की एक घटना 7 नवंबर 1966 की है। गौ हत्या रोकने की मांग को लेकर देशभर से आए साधुओं ने प्रदर्शन किया था। पुरी के शंकराचार्य भी उसमें आए थे। प्रदर्शन का नेतृत्व करपात्री जी महाराज कर रहे थे। वह देश के बहुत बड़े संत थे। वहां पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और फिर फायरिंग भी की। उस फायरिंग में कितने लोग मरे आज तक किसी को पता नहीं। आंदोलनकारियों का कहना है कि सैकड़ों साधु मारे गए। ट्रकों में भरकर शव ले जाए गए। वह आंदोलन इसलिए हुआ था कि इंदिरा गांधी ने वादा किया था कि वह सत्ता में आईं तो गोवध पर पाबंदी लगा देंगी। इसके लिए कानून बना देंगी। बाद में वह मुकर गईं। तो आज जो कुछ जंतर-मंतर पर हो रहा है दिल्ली ने ऐसे बहुत सारे दृश्य देखे हैं। देश में जितने भी आंदोलन हुए हैं,उनका कोई न कोई नेतृत्व होता है, एक घोषित लक्ष्य होता है और एक परिभाषित उद्देश्य होता है कि हम किस मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। हमारी मांग क्या है? यह ऐसा तथाकथित आंदोलन है जिसका न कोई नेता है,न कोई घोषित लक्ष्य है और न मांगों की ऐसी कोई सूची है। हालांकि सरकार ने कॉकरोचों के प्रतिनिधियों से बात करने का फैसला किया और जेपी नड्डा बातचीत कर रहे हैं। सवाल यह है कि इस तरह के संगठनों को अगर इस तरह की लेजिटिमेसी दी जाएगी तो उसका नतीजा क्या होगा? संसद का कानून सड़क से नहीं बन सकता। ऐसी ही कोशिश पहले तथाकथित किसान आंदोलन के जरिए हुई थी, उसमें कोई किसान नहीं था। उसमें पंजाब के आढ़तिये और किसानों की दलाली करने वाले लोग थे। फिर उसमें आंदोलनजीवी जुड़ गए। उसको कितना जनसमर्थन था, उसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि उस आंदोलन के लोगों ने पार्टी बना ली और पंजाब विधानसभा का चुनाव लड़ गए। सबकी जमानत जब्त हो गई। इसी तरह से यह जो प्रदर्शन करने वाले हैं,इनका अपना कोई जनाधार नहीं है। कोई जनसमर्थन नहीं है। इन्होंने एक ऐसे मुद्दे को उठाया, जो छात्रों और उनके भविष्य से संबंधित है। यह गंभीर मुद्दा है। लेकिन इन्होंने इस तरह का तमाशा करके उसकी गंभीरता को कम किया है। मैं फिर कह रहा हूं कि सरकार को छात्रों की समस्या पर गंभीरता से सोचना चाहिए और उसका हल निकालने की दिशा में कदम उठाना चाहिए, लेकिन ऐसे लोग अगर छात्रों की समस्या को लेकर आएंगे और विरोध प्रदर्शन का नाटक करेंगे तो उस समस्या की गंभीरता उससे कम होती है। ये लोग सरकार को इस समस्या से ध्यान हटाने का मौका दे रहे हैं। ये दरअसल छात्रों का नुकसान कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ कानून सम्मत सख्त से सख्त कारवाई होनी चाहिए। यह एक तमाशा खड़ा करने की कोशिश थी, उसमें भी ये लोग असफल रहे। दिपके अनशन छोड़कर भाग गया। जो तीन दिन अनशन नहीं कर सकता वह छात्रों के लिए क्या लड़ेगा। ये सब किसी न किसी के लिए इस्तेमाल हो रहे थे। किसी न किसी की कठपुतली हैं। इसीलिए इनको जनसमर्थन नहीं मिला।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)