वर्तिका नंदा के उपन्यास ‘ज से जेल’ का लोकार्पण ।
आपका अखबार ब्यूरो।
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कला निधि प्रभाग द्वारा मीडिया शिक्षिका एवं जेल सुधारक प्रो. वर्तिका नंदा की पुस्तक ‘ज से जेल’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। पुस्तक का प्रकाशन किया है नई दिल्ली के प्रभात प्रकाशन ने। पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संदीप मेहता। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की, जबकि आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
इस अवसर पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा कि जेल और कैदी समाज के लिए एक वर्जित शब्द हैं। ऐसे विषय पर किताब लिखने के लिए वर्तिका नंदा बधाई की पात्र हैं। जो चित्रण इस पुस्तक में किया गया है, वो वाकई कमाल का है। उन्होंने कहा, ये जो तरीका है जेल में बंद कैदियों को रोशनी दिखाने का वो अद्भुत है। उन्होंने कहा, जब हम न्यायालय में बैठकर फैसला करते हैं, वो साक्ष्य, दलीलों और कानून के आधार पर होता है। लेकिन क्या परिस्थतियां हैं, अपराध करने वाले में सुधार की कितनी संभावना है, इस पर विचार नहीं कर पाते, क्योंकि मुकदमों की अत्यधिक संख्या से हमें इस पर विचार करने का अवसर नहीं मिल पाता। हालांकि जेल सुधार की दिशा में उल्लेखनीय काम भी हो रहे हैं, यह भी एक सच्चाई है। राजस्थान के सांगानेर में एक बहुत अच्छी खुली जेल है। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति न्यायालय के निर्णय के आधार पर अपनी स्वतंत्रता खो सकता है, लेकिन उसका सम्मान नहीं छीना जा सकता। उसे पूरे सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, क्या बंदियों को वापस समाज में अच्छा नागरिक बनने का अधिकार नहीं है? और उसका उत्तर भी खुद देते हुए कहा कि उन्हें यह अधिकार अवश्य है। उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार तभी प्राप्त हो सकता है, जब खुली जेल व्यवस्था को और बेहतर बनाया जाए। जेल सुधार के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है और बहुत कुछ किया जाना है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री रामबहादुर राय ने कहा, एक साधारण पाठक की दृष्टि से यह बहुत श्रेष्ठ उपन्यास है। यह किताब वर्तिका नंदा ने जेल को ऐसी जगह बनाने के लिखा है, जहां बहुत कुछ सीखा भी जा सकता है। उन्होंने अपने कारावास में बिताए गए दिनों के कुछ संस्मरण साझा करते हुए कहा कि अगर राजनीतिक बंदी जेल में आते रहते, तो जेल इतने खौफनाक नहीं होते, जेल सुधारों पर काफी काम होता।
वहीं विशिष्ट अतिथि डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, यह उपन्यास नहीं, जेल का जीवंत दस्तावेज है। जेल से जुड़े कुछ संस्मरण सुनाते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि जेल को बाहर से नहीं, अंदर से जाकर देखें, तो कई बातें आपकी आंखें खोल देंगी।
लेखिका वर्तिका नंदा ने पुस्तक लेखन की यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि इस उपन्यास के सारे पात्र वो हैं, जो उन्हें अलग-अलग जेलों में मिले। उन्होंने कहा, मैंने बहुत सी जेलों को देखा और किसी जेल से खाली हाथ नहीं लौटी। वहां की उदासियां, पीड़ाएं, परेशानियां मेरे साथ आईं। जेल मेरा सबसे बड़ा टीचर है। जेल ने मुझे अथाह अनुभव दिए। जेल ने मुझे सबल और सक्षम बनाया है।
कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन प्रभात प्रकाशन के श्री प्रभात कुमार ने किया।









