भाजपा और आरएसएस को मानता है रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा।
इस समय देश में राजनीतिक परिस्थिति पर जरा गौर कीजिए। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) नाम की एक नई संस्था आ गई है। उसके बारे में अटकलें लग रही हैं कि ये लोग राजनीतिक दल बनाएंगे। अब डेमोक्रेसी में कितने ही राजनीतिक दल और बन जाएं,उससे कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता,लेकिन सवाल है कि ये किस उद्देश्य से बन रहे हैं? यह संयोग मात्र नहीं है कि कॉकरोच जनता पार्टी बनी और उसके समर्थन में एक बड़ा इको सिस्टम आ गया है। यह नया प्रयोग है। इसकी शुरुआत राहुल गांधी को राजनीति में लाने के साथ हुई थी। राहुल से जैसे-जैसे निराशा बढ़ने लगी तो आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल आए। केजरीवाल का प्रभाव फीका पड़ने लगा तो एक तथाकथित किसान आंदोलन चलाया गया। अब कॉकरोच जनता पार्टी आई है, जो अपने को गैर राजनीतिक कहती है लेकिन है पूरी तरह से राजनीतिक। वैसे राजनीतिक होने में कोई बुराई नहीं है। झूठ बोलने में बुराई है। आप जो हैं उसे खुलकर कहिए।
अब सवाल यह है कि मैं इसे नया प्रयोग क्यों कह रहा हूं? अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है इसलिए वहां का डीप स्टेट भी सबसे ताकतवर है। यह डीप स्टेट किसी पार्टी का न तो समर्थक है और न विरोधी। वह सिर्फ इतना चाहता है कि दुनिया में जो भी सत्ता में आए वह हमारे इशारे पर चले। हमारे हितों का ध्यान रखे। हम जैसी नीतियां कहें वैसी नीतियां अपने देश में बनाए। हम चाहे हथियारों का धंधा करें, चाहे ड्रग्स का धंधा करें या चाहे फार्मास्यूटिकल के क्षेत्र में धंधा करें, किसी मामले में दखल नहीं दे। इस डीप स्टेट को मालूम है कि भारत में जो भी व्यक्ति, संगठन या संस्था भारतीय संस्कृति औैर सनातन धर्म से जुड़ी हुई है उनसे आप ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि सनातन से जुड़े लोगों में कोई बुराई नहीं होती या वे भ्रष्ट नहीं होते। लेकिन एक जगह आकर ऐसी परिस्थिति बनती है जिसके कारण से उनको ये डीप स्टेट रिजेक्ट कर देता है। वह है-ये लोग देश के खिलाफ जाने को तैयार नहीं होते। अपनी संस्कृति को नष्ट करने वालों के साथ खड़े होने को तैयार नहीं होते। वह उनकी लक्ष्मण रेखा है। डीप स्टेट भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसी रूप में देखता है। उसे लगता है कि इस रोड़े को हम हटा दें तो भारत में हमारे लिए बड़ी आसानी हो जाएगी। आपने कई जगह ऐसा पढ़ा और सुना होगा कि भारत में पीएमओ, डिफेंस मिनिस्ट्री, कॉमर्स मिनिस्ट्री, फाइनेंस मिनिस्ट्री आदि में अमेरिका या सोवियत संघ के जासूसों का जाल बिछा रहता था। यहां तक कि नेता और मंत्री भी सीआईए या केजीबी के एजेंट होते थे। ये कपोल कल्पित कहानियां नहीं हैं। लेकिन 1998 से लेकर 2004 जब तक अटल जी की सरकार चली और पिछले 12 साल जब से नरेंद्र मोदी की सरकार है, उसमें ऐसी बातें आपको सुनने को नहीं मिलेंगी। देश की सुरक्षा से भाजपा की सरकारों ने कभी कोई समझौता नहीं किया। भाजपा और दूसरी पार्टियों की सरकारों में यही फर्क है। बाकी ये भी उतने ही बुरे और घटिया हैं, जितने दूसरे थे। देश के लोग भी इन्हें सिर्फ इसी कारण पसंद करते हैं कि ये अपने देश प्रेम से समझौता करने को तैयार नहीं होते। ये अपनी संस्कृति के साथ भले न खड़े हों, संस्कृति के विरोध में खड़े होने की कोशिश नहीं करते।
तो पहले ये प्रयोग राहुल गांधी पर किया गया। राहुल गांधी का नाम लेते ही आपके जेहन में जो तस्वीर आएगी वह सनातन संस्कृति विरोधी की आएगी। राहुल गांधी के प्रयोग ने डीप स्टेट को यह बता दिया कि केवल भारतीय संस्कृति के खिलाफ स्टैंड ले लेने से कोई इस देश की सत्ता में नहीं आ जाएगा। दूसरा प्रयोग हुआ आम आदमी पार्टी का। डीप स्टेट ने लंबे समय तक अरविंद केजरीवाल में इन्वेस्ट किया। एनजीओ बनवाया, पैसा दिया फिर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देकर उनकी एक प्रतिष्ठा बनाई। फिर एक आंदोलन करवाया और आंदोलन के बाद राजनीतिक दल बनवाया। जरा याद कीजिए कि 2011 में देश में क्या माहौल था। कहा जाने लगा था कि आम आदमी पार्टी नाम की एक नई पार्टी आई है और अरविंद केजरीवाल नाम का एक नया नेता आया है जो पूरे देश की राजनीति को बदल देगा। रातों रात उनकी छवि एक राष्ट्रीय नेता की हो गई। आज अरविंद केजरीवाल कहां पड़े हैं? तिनके जैसी भी उनकी हालत नहीं रह गई है। तो डीप स्टेट का दूसरा एक्सपेरिमेंट भी फेल हो गया। डीप स्टेट की तीसरी कोशिश तथाकथित किसान आंदोलन के जरिए हुई। जिस दिन यह आंदोलन शुरू हुआ था मैं उस दिन से लगातार कहता रहा हूं कि किसानों से इस आंदोलन का कोई लेना देना नहीं था। उसमें केवल पंजाब के आढ़तिये शामिल थे,जो चाहते थे कि एमएसपी सिस्टम बना रहे जिसका वे दुरुपयोग कर सकें और अपनी कमाई बढ़ा सकें। उसके अलावा उत्तर प्रदेश का टिकैत नाम का बिचौलिया उसमें शामिल था। सरकार कृषि सेक्टर की प्रगति को भूलकर केवल एक बात में लग गई कि देश में अराजकता न फैले। तथाकथित किसान दो साल तक धरने पर बैठे रहे। इसके बाद उनको लगा कि अब तो हम मसीहा हो गए हैं तो पंजाब में चुनाव लड़ गए। चुनाव में इनको समझ में आ गया कि इनकी हैसियत जनता की नजर में क्या है। इसके बाद सीएए को लेकर अराजकता फैलाने की कोशिश हुई। दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगा भड़काया गया। उस दंगे के माध्यम से कोशिश हुई कि पूरे देश में सांप्रदायिकता को फैला दिया जाए। बाहर से बहुत पैसा आया और एक पूरा इको सिस्टम इसमें लग गया, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
अब यह कॉकरोच जनता पार्टी का नया प्रयोग आया है। यह ऐसा लग रहा है जैसे अन्ना हजारे के आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी बनने तक का एक्शन रिप्ले हो रहा हो। वही बातें कही जा रही हैं कि हम पार्टी नहीं बनाएंगे, राजनीति में नहीं आएंगे। दीपके से पूछा गया कि आपकी विचारधारा क्या है तो कह रहा है कि हमारी विचारधारा गांधी की अहिंसा की विचारधारा है। जो अभी 15 दिन पहले अपना हिंसात्मक रूप दिखा चुके हैं, वे कह रहे हैं कि हमारी अहिंसा की विचारधारा है। इसके अलावा बाबा साहब अंबेडकर का नाम ये सब केवल अपने को बचाने के लिए लेते हैं। अरविंद केजरीवाल भी लेते थे। इस तरह के तत्व बाबा साहब का नाम इसलिए नहीं लेते कि उनके मन में उनके प्रति सम्मान की भावना है,वे नाम इसलिए लेते हैं क्योंकि डीप स्टेट, अमेरिका और यूरोप का लॉन्ग टर्म प्रोजेक्ट है कि एक दिन हम दलित समाज को हिंदुओं से अलग कर देंगे। वरना डॉक्टर अंबेडकर का जो संविधान है,उसके अनुसार तो ये लोग कोई काम करते ही नहीं। डॉक्टर अंबेडकर ने तो आजादी के तुरंत बाद ही कह दिया था कि यह जो गांधी का अनशन का, भूख हड़ताल का तरीका है,यह अब हमें छोड़ देना चाहिए क्योंकि हम अब विदेशों या आक्रांताओं से नहीं लड़ रहे हैं। अब हमारे देश में संविधान के अनुसार चुनी हुई सरकार है। हमारे पास संविधान है। तो हमारी सारी लड़ाई जो भी होगी अब संविधान के प्रावधानों के मुताबिक होगी। यह आमरण अनशन और यह भूख हड़ताल ब्लैकमेल है। तो आप मान कर चलिए कि कॉकरोच जनता पार्टी नाम का एक और राजनीतिक दल बनने वाला है। इनकी कोई आईडियोलॉजी नहीं है। आईडियोलॉजी बनाने और उस पर चलने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। अगर उस पर नहीं चल पाते हैं तो वही हाल होता है जो लेफ्ट का हुआ। 100 साल पहले कम्युनिस्ट पार्टी बनी थी और 100 साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी बना था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी विचारधारा से डिगा नहीं इसलिए आज फल फूल रहा है। कम्युनिस्ट उससे डिग गए। जिहाद में उनको अपना विस्तार नजर आने लगा। दुनिया भर के जिहादियों के प्रवक्ता हो गए। नतीजा यह हुआ कि कम्युनिस्ट भारतीय राजनीति के अजायब घर की एक वस्तु हो गए हैं। ये जो विचारधारा विहीन संगठन होते हैं ये वैसे ही हैं जैसे बिना जड़ का पौधा। किसी और पौधे पर लिपट कर ये उससे अपना भोजन पानी लेते हैं। ये सब अरविंद केजरीवाल के ही चट्टे बट्टे हैं। लेकिन अब उनको लगता है कि अरविंद केजरीवाल का जमाना गया। अब हमारा जमाना आ रहा है। अब अरविंद केजरीवाल की उनके लिए उतनी उपयोगिता बची नहीं है। अरविंद केजरीवाल की यह हैसियत भी नहीं बची है कि इनको रोक सकें या इनको बढ़ा सकें। तो आप सीजेपी के जितने नेता हैं, उनकी बातें सुन लीजिए। उसमें कहीं एक वाक्य आपको भारतीय संस्कृति से जुड़ा हुआ नहीं मिलेगा। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात एक बार भी सुनने को नहीं मिलेगी। देश प्रेम की बात एक बार भी सुनने को नहीं मिलेगी। अब ये पिद्दी अभिजीत दीपके कह रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पद से हट जाना चाहिए। कौन हो तुम हटाने वाले? इस देश में कौन किस पद पर बैठेगा, ये तय करने का अधिकार केवल इस देश के मतदाता को है। इनको केवल एक प्रोजेक्ट देकर भेजा गया है कि जाओ ऐसी अराजकता पैदा करो कि वर्तमान सरकार चल न पाए। अब आप देखिए जो ये लोग सड़क पर कर रहे हैं वही राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद में कर रहे हैं। कहने को संसद का मानसून सत्र चल रहा है लेकिन संसद में चर्चा नहीं हो रही है क्योंकि कांग्रेस पार्टी को लगता है कि संसद का सत्र चलाने और चर्चा में भाग लेने से उनको कोई फायदा नहीं होने वाला। उनका फायदा तो सिर्फ अराजकता से हो सकता है। संदेश यह देना है कि भारत में संसद नहीं चलती है। तो इसलिए आप इंतजार कीजिए एक नई पार्टी के बनने का और इंतजार कीजिए उसके खत्म होने का। इस नई बनने वाली पार्टी का हश्र आम आदमी पार्टी से भी बुरा होगा। जंतरमंतर पर झूठ बोलकर 5-7 हजार लोगों को जोड़कर अभिजीत दीपके को लगता है कि वह इस देश का नेता बन गया है। अब इसका सीधा मुकाबला प्रधानमंत्री से है। याद कीजिए 2011-12 में अरविंद केजरीवाल को भी यही लगता था। ये लोग केवल अव्यवस्था पैदा कर सकते हैं और नकारात्मकता फैला सकते हैं। इसलिए इनसे सख्ती से निपटने की जरूरत है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









