देश के पहले शिक्षामंत्री ने कहा था- काफिर के प्रति मुसलमान के मन में कोई दया नहीं होनी चाहिए ।
प्रदीप सिंह।सच्चाई अक्सर कड़वी लगती है और जिनको झूठ बोलने की आदत हो, उनके लिए तो सच को सुन पाना बड़ा मुश्किल होता है। ऐसे ही लोगों में हैं फिल्मों के पटकथा लेखक और कवि जावेद अख्तर।
जावेद अख्तर ने जितनी भी फिल्में लिखीं, उनमें हिंदुओं को बुरा और मुसलमानों को अच्छा बताते रहे। उनकी बातें आप सुन लीजिए तो पता चल जाएगा कि हिंदुओं के लिए उनके मन में कितनी कड़वाहट भरी हुई है। हाल ही में प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने एक वीडियो संदेश जारी किया। उसमें उन्होंने मौलाना आजाद ने 27 अक्टूबर 1914 को कोलकाता में मुसलमानों को संबोधित करते हुए जो कहा था, उसका एक हिस्सा कोट किया। मौलाना आजाद कह रहे थे कि दुनिया भर के मुसलमानों को एक हो जाना चाहिए क्योंकि यह कैलफेट (खलीफा) को बचाने का सवाल है। यानी वह पूरी दुनिया पर इस्लाम का राज चाहते थे। उनका यह भाषण खुदते आजाद में छपा भी है। अपने भाषण में मौलाना आजाद की आगे जो कहा उसे सुनकर तो आपकी आंखें खुल जाएंगी। पता चलेगा कि हिंदू किस गलतफहमी में जी रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘दुनिया में हर संबंध टूट सकता है। पिता अपने बेटे से संबंध तोड़ सकता है, मां बेटे से संबंध तोड़ सकती है, भाई-भाई संबंध तोड़ सकते हैं, लेकिन किसी मुसलमान में इस्लाम की आत्मा का एक कण भी होगा तो वह मुसलमान से अलग नहीं हो सकता। अगर युद्ध के मैदान में एक कांटा चुभ जाए तो उसका दर्द हर मुसलमान के दिल में होना चाहिए। मिल्लत के लिए इस्लाम एक शरीर है। मुसलमान दुनिया में जहां भी हैं, वे इस्लाम का अंग हैं।’ मौलाना आजाद ने इसके आगे जो कहा उसे हिंदुओं को खासतौर से सुनना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘जो काफिर है उनके लिए आपके मन में आक्रामकता होनी चाहिए। कोई दया का भाव नहीं होना चाहिए। लेकिन जो मुसलमान है, उसके प्रति आपके मन में दया का भाव होना चाहिए।’ अब आप समझ लीजिए कि इस्लाम की नजर में काफिर कौन होते हैं? जो अल्लाह और इस्लाम को नहीं मानते। तो उनकी नजर में इस देश की बहुसंख्यक आबादी काफिर थी और उसके साथ मुसलमानों को कैसा बर्ताव करना चाहिए, यह वह बता रहे थे। मौलाना आजाद का असली नाम शायद ही आपमें से किसी ने सुना हो। उनका नाम था- सैयद गुलामुद्दीन अहमद बिन मेहरुद्दीन अल हुसैनी। जब वह युवा हुए तो मोहुद्दीन अहमद कहे गए। बाद में किस वजह से और किसने मौलाना अबुल कलाम आजाद नाम रखा,ये पता नहीं। उनका जन्म सऊदी अरब के मक्का में हुआ था। बाबर जहां से आया था, इनके पूर्वज वहीं से आए थे। मौलाना आजाद का कहना था कि मुसलमानों की बिरादरी अल्लाह ने बनाई है। तो कौन सा दुनिया में मुसलमान होगा जो अल्लाह के खिलाफ जाने की हिमाकत कर सके। बाद में इनका परिवार आकर कोलकाता में बसा। वहां इन्होंने एक उर्दू पत्रिका अल हिलाल निकाली। जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो इस पत्रिका पर प्रतिबंध लग गया। इस दौरान वह ईरान, इजिप्ट, तुर्की और फ्रांस घूमते रहे। उन्होंने बाद में कोलकाता से ही दूसरी उर्दू पत्रिका निकाली, लेकिन डिफेंस ऑफ इंडिया रूल के तहत उनको एक्सटर्न कर दिया गया था। यूनाइटेड प्रोविंस, पंजाब, बॉम्बे और दिल्ली में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध था। 1923 में वह पहली बार और 1940 में दूसरी बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। मौलाना आजाद 1946 में जो अंतरिम सरकार बनी, उसमें शिक्षा मंत्री बनाए गए। आजकल शिक्षा मंत्री के एजुकेशन बैकग्राउंड पर बड़ा सवाल उठता है,लेकिन मौलाना आजाद ऐसे शिक्षामंत्री थे जिन्होंने कभी किसी स्कूल का मुंह नहीं देखा। कहा जाता है कि इस्लाम की शिक्षा उन्होंने काहिरा में ली थी। इसके अलावा उनके पिता ने घर पर ट्यूटर रखकर उनको उर्दू, अरबी और फारसी की शिक्षा दिलवाई। इसके अलावा उनकी कोई फॉर्मल एजुकेशन नहीं हुई। गणित, विज्ञान या फिर दूसरे विषय उन्होंने कभी नहीं पढ़े, लेकिन 1946 से 1958 तक वह इस देश के पहले शिक्षा मंत्री रहे। इससे आप समझिए कि उन्होंने शिक्षा का क्या कबाड़ा किया होगा। वह नेहरू के सबसे प्रिय थे। तो इस देश में शिक्षा का सत्यानाश करने का श्रेय मौलाना आजाद के साथ-साथ जवाहरलाल नेहरू को भी जाता है। हद तो इस बात की रही कि एक नहीं लगातार पांच मुसलमान देश के शिक्षा मंत्री बने।
तो जब आनंद रंगनाथन ने मौलाना आजाद के भाषण को कोट किया तो सबसे ज्यादा परेशानी जावेद अख्तर को हुई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि आपने मौलाना आजाद के बारे में जो बात लिखी है, जरा इसका सोर्स बताइये, ये कहां कहा गया है? जावेद अख्तर का मतलब था कि आनंद रंगनाथन झूठ बोल रहे हैं और वह इसका सोर्स नहीं बता पाएंगे। लेकिन आनंद रंगनाथन के साथ-साथ बहुत से विशेषज्ञों ने इसका सोर्स बता दिया। उसके बाद से मैंने देखा नहीं कि जावेद अख्तर का कोई जवाब आया हो। मैं आपको एक और घटना बताता हूं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव मौलाना आजाद के बड़े मुरीद थे और उनको बहुत बड़ा राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता मानते थे। मुलायम सिंह यादव को लगा कि मौलाना आजाद की बातों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए तो उन्होंने उर्दू के एक स्कॉलर को बुलाया और उनसे कहा कि आपको एक प्रोजेक्ट दे रहे हैं। मौलाना आजाद ने जो अखबारों,पत्रिकाओं में लेख लिखे,उन सबका ट्रांसलेशन हिंदी में करवाइए। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में उसके लिए एक दफ्तर खुल गया। स्टाफ और बजट भी दे दिया गया। दो ढाई महीने ये प्रोग्राम चला। उसके बाद जिनको यह जिम्मा सौंपा गया था उन्होंने मुलायम सिंह यादव से मिलने का समय मांगा। उन्होंने मुलायम से पूछा कि मौलाना आजाद की छवि आपके मन में क्या है? मुलायम बोले-वह राष्ट्रवादी नेता थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। हम उनका बहुत सम्मान करते हैं। इस पर उर्दू के जिस स्कॉलर को यह प्रोजेक्ट सौंपा गया था उन्होंने कहा कि मौलाना आजाद की ये छवि बनी रहे या खत्म हो जाए? इस पर मुलायम उखड़ गए और बोले-आप यह कैसी बात कर रहे हैं। जवाब में उर्दू स्कॉलर बोले-अगर यह अनुवाद छप गया तो मौलाना आजाद की जो छवि आप और आप जैसे लोगों के मन में है, वह पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी। उनके संपादकीय और लेख इतने जहरीले हैं कि उनको छापना मुश्किल है। वह बचा इसलिए है कि उर्दू में है। हिंदी या अंग्रेजी में नहीं छपा, इसलिए लोगों तक पहुंचा नहीं। उसी दिन यह प्रोजेक्ट बंद हो गया।
हमारे देश के लोग विशेषकर हिंदू सच को स्वीकार ही नहीं करना चाहते। वे शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन गड़ा कर बैठे रहते हैं। सोचते हैं कि आंधी तूफान जो भी है निकल जाएगा। हमारे ऊपर कोई असर नहीं पड़ेगा। अरे,अब तो टेक्नोलॉजी आ गई है। मौलाना आजाद के जो भी लेख और संपादकीय उर्दू में छपे हैं जरा उनका अनुवाद करके पढ़ लीजिए। आपको पता चल जाएगा कि मौलाना आजाद क्या सोचते थे। आनंद रंगनाथन ने इतना थोड़ा सा हिस्सा कोट किया है, उसी से आपको समझ जाना चाहिए कि मौलाना आजाद की सोच का दायरा इस्लाम से बाहर नहीं था। इस्लाम से जो बाहर है, वह उनकी और इस्लाम की नजर में काफिर है और काफिरों के बारे में इस्लाम क्या कहता है अगर आज भी यह बताने की जरूरत है तो हम सब पर लानत है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








