जनता वही दवा दे रही जो 15 साल उसे मिली
राजनीति की शुरुआत तमाशे से हुई और आज खुद तमाशा बन गईं। मैं ममता बनर्जी के बारे में बात कह रहा हूं। उनकी राजनीति की शुरुआत 1974-75 की एक घटना से हुई। लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चल रहा था। इसी बीच वह कोलकाता गए थे। उस समय ममता बनर्जी यूथ कांग्रेस की लीडर थीं। वह जेपी की एंबेसडर कार के बोनट पर चढ़ गईं और उस पर कूदने लगीं। उनकी वह तस्वीर देश भर में और देश से बाहर भी छपी। वह दिन और आज का दिन,आप जरा तुलना कीजिए। ममता बनर्जी कहां से चली थीं और कहां पहुंच गईं हैं।
ममता बनर्जी जिस तमाशे को अपना राजनीतिक हथियार बना लेती थीं आज वही ममता बनर्जी खुद तमाशा बन गई हैं और उनके विरोधियों के लिए वह हथियार बन गई हैं। 30 मई की घटना आप भूले नहीं होंगे, जब उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी अपने एक कार्यकर्ता की मौत पर दुख जताने के लिए उसके घर जा रहे थे। वहां पर स्थानीय महिलाओं ने उन पर अंडे फेंके। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि टीएमसी की सरकार में जब महिलाओं पर अत्याचार हो रहे थे उस समय बुआ और भतीजा चुप्पी क्यों साधे थे। उस पर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया। बल्कि जो आरोपी थे, उनको बचाने की कोशिश होती रही। अब तो टीएमसी के नेता खुद खुलकर बोल रहे हैं कि आरजी कर की घटना के समय हम उसे दबाने और आरोपियों को बचाने की कोशिश करते रहे। तो अभिषेक बनर्जी पर कुछ अंडे क्या गिरे,ममता बनर्जी बौखलाकर तमाशे पर उतर आईं। वह भूल गईं कि 2021 के चुनाव के बाद उन्होंने हिंसा का कैसा तांडव करवाया था। पश्चिम बंगाल के हजारों लोगों को भागकर असम में शरण लेनी पड़ी थी। यह किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी, लेकिन ममता बनर्जी के लिए गर्व की बात थी। तो अभिषेक बनर्जी को अंडा पड़ने की घटना के बाद जब अपोलो हॉस्पिटल ले जाया गया तो वहां के डॉक्टर्स ने कहा कि कोई बड़ी चोट नहीं है। इन्हें घर ले जाइए। इस पर ममता बनर्जी को लगा कि अगर घर ले जाएंगे तो फिर तमाशा क्या बनेगा? विक्टिम कार्ड कैसे खेलेंगे? इसके बाद वह अभिषेक को बेलव्यू हॉस्पिटल ले गईं। उस हॉस्पिटल की शायद उन्होंने कभी कुछ मदद की होगी। तो ममता बनर्जी का एक ऑडियो टेप वायरल हो रहा है, जिसमें वह बेलव्यू हॉस्पिटल के सीईओ को धमका रही हैं कि हमने तुम्हारी मदद की थी, हमें याद रखो। जब केंद्र में भाजपा की सरकार नहीं होगी तब हम तुमको देख लेंगे। राहुल गांधी की तरह उन्हें भी सपना आ रहा है कि केंद्र की सरकार गिर जाएगी।
ममता बनर्जी को लग रहा है कि पश्चिम बंगाल में तो सरकार 5 साल रहने वाली है। 208 सीटों वाली शुभेंदु सरकार के गिरने या हटने की कोई संभावना ही नहीं है। सोमवार को मंत्रिमंडल का विस्तार हो जाने के बाद तो अब राज्य सरकार पूरी ताकत से काम करेगी। केंद्र और राज्य की यह डबल इंजन सरकार ममता बनर्जी के लिए बुरी खबर है। तो उस बुरी खबर से निपटने का उनके पास राजनीतिक उपाय तमाशा है। तो बेलव्यू हॉस्पिटल के डाक्टरों ने भी अभिषेक के कुछ टेस्ट कराने के बाद जब कहा कि कोई गंभीर चोट नहीं है, इनको ले जाइए तो ममता बनर्जी हॉस्पिटल के सीईओ को धमकाने लगीं। सरकार में रहते हुए हमेशा अल्लाह को याद करने वाली ममता ने उनसे कहा कि तुमको भगवान माफ नहीं करेगा। तुम बहुत गलत कर रहे हो। दरअसल ममता चाहती थीं कि अभिषेक बनर्जी को भर्ती कर लिया जाए। ऐसा होता तो फिर उनको कई दिन तक यह विक्टिम कार्ड खेलने का मौका मिलता कि मेरे भतीजे पर हमला हुआ है। किंतु ऐसा कुछ हो नहीं पाया। इसके बाद उन्होंने इंडी गठबंधन के नेताओं को फोन घुमाना शुरू किया लेकिन किसी ने फोन ही नहीं उठाया। अब उनके पास दूसरा रास्ता था कि अपने लोगों को उकसाएं। तो उन्होंने विधायक दल की बैठक बुला ली। लेकिन यहां भी उनके साथ खेल हो गया। बैठक में तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से केवल 20 विधाायक आए।
अब ममता बनर्जी कह रही हैं कि अभिषेक अगर हेलमेट न पहने होते तो अंडे से उनकी मौत हो सकती थी। अब इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है कि अंडा लगने से किसी की मौत हो सकती है। ये बात कभी ममता बनर्जी के ध्यान में नहीं आई कि उनके कार्यकर्ता जब बम फोड़ते थे,गोली चलाते थे,चाकूबाजी करते थे, उससे तो किसी की मौत होती नहीं थी। तो जब अपने पर पड़ती है तब समझ में आता है।
आज ममता बनर्जी को वही दवा मिल रही है, जो दवा वह 15 साल से पश्चिम बंगाल के लोगों को बांट रही थी और अभी तो उसकी शुरुआती डोज है। तृणमूल कांग्रेस, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति लोगों में जिस तरह की नाराजगी है,वह इतनी आसानी से जाने वाली नहीं है। पश्चिम बंगाल के लोग केवल ममता बनर्जी को सत्ता से हटाकर संतुष्ट नहीं हुए हैं। वे चाहते हैं कि वह उसी तरह भुगतें, जो 15 साल तक उन्होंने पूरे प्रदेश को भुगतने पर मजबूर किया। उनके मन में प्रतिशोध की एक भावना है। धुरंधर फिल्म का एक डायलॉग है-प्रतिशोध का सबसे बड़ा ईंधन होता है धैर्य और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी वही धैर्य दिखा रहे हैं। वह सामान्य गति से काम कर रहे हैं कि जिसने गलत किया है उसकी जांच होगी। उसको सजा मिलेगी। सब कुछ कानून के मुताबिक होगा। तो ममता बनर्जी को यह विक्टिम कार्ड भी नहीं मिलने वाला कि उनके खिलाफ पॉलिटिकल वेंडेटा चल रहा है। पूरे पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कार्यकर्ताओं का जो पैरेलल आतंक का तंत्र बना हुआ था, वह 4 मई को नतीजा आते ही टूट गया। तृणमूल के अत्याचार के समय जितनी जनता सड़क पर आई थी, उससे कई गुना ज्यादा आज सड़क पर है। और मैं फिर बार-बार कह रहा हूं कि पश्चिम बंगाल चुनाव का यह नतीजा पूरे देश की राजनीति को मूल रूप से बदलेगा। यह कोई सामान्य चुनाव नतीजा नहीं है। यह भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का नतीजा है।
पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे ने एक और बहुत बड़ा काम किया है। जो लोग बोलते थे कि सरकार तुम्हारी सिस्टम हमारा, उनकी जुबान पर लकवा मार गया है। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि इस जनादेश को गलत कैसे साबित करें। और अब तो सुप्रीम कोर्ट तक ने एसआईआर को कानून सम्मत ठहरा दिया है। तो विक्टिम कार्ड के जितने पत्ते थे,वे सब एक-एक करके छीन लिए गए हैं। सबसे बड़ा काम मतदाता ने किया। फिर कानून ने किया और भाजपा एवं उसके नेताओं ने तो किया ही। और मैं जो धैर्य की बात कर रहा था, उसमें मैं अपनी कमजोरी को स्वीकार करता हूं कि 2021 से 26 के बीच कम से कम तीन बार मुझे लगा था कि केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धैर्य डिगा नहीं। उनको विश्वास था कि वह मतदान के जरिए इस सरकार को हटा सकते हैं। यह आत्मविश्वास उसी व्यक्ति में आ सकता है जो जमीन से जुड़ा हुआ हो और जिसे इस बात का भरोसा हो कि जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह धर्म का रास्ता है।
पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे का असर आपको डेढ़-दो दशक तक हर चुनाव में दिखाई देगा। 2027 में यूपी समेत सात राज्यों के चुनाव होने वाले हैं। आपको हर राज्य में पश्चिम बंगाल की छाया दिखाई देगी क्योंकि पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने सोए हुए हिंदू को जगा दिया है। उसने दिखा दिया है कि एकता में कितनी ताकत है। 30% मुस्लिम आबादी होने के बाद भी पश्चिम बंगाल और 40% मुस्लिम आबादी होने के बाद भी असम में भाजपा की जीत कोई सामान्य जीत नहीं है। जिन लोगों को लग रहा था कि मोदी को राहुल गांधी चैलेंज कर सकते हैं, वह राहुल लगातार फेल हो रहे हैं। जिनको लग रहा था कि मोदी को ममता बनर्जी चैलेंज कर सकती हैं तो ममता बनर्जी अब अपने घाव सहला रही हैं। तीसरा नेता उनको लगता था कि एमके स्टालिन दक्षिण से उठेंगे और पूरे भारत पर छा जाएंगे। वह सपना भी खत्म हो गया। अब ले देकर पिटे पिटाए अखिलेश यादव से उम्मीद बची है। तो उनको मालूम नहीं है कि जो हाल ममता बनर्जी और एमके स्टालिन का हुआ, उससे बहुत ज्यादा बुरा हाल अखिलेश यादव का होने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












