द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती से विशेष संवाद।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
आज धर्मान्तरण का प्रश्न सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुका है। एक ओर इसे व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता का विषय कहा जाता है, तो दूसरी ओर इसे सभ्यता, परम्परा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

वस्‍तुत: ऐसे समय में जब धर्म, आस्था और पहचान को लेकर अनेक प्रकार की बहसें चल रही हैं, द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री “सदानन्द सरस्वती महाराज” धर्मान्तरण के प्रश्न को राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे तक सीमित नहीं मानते हैं। वे इसे शास्त्रीय और दार्शनिक दृष्टि से भी देखते हैं। यही कारण है जोकि जगद्गुरु शंकराचार्य सनातन धर्म से जुड़े अनेक विषयों पर खुलकर बोलते हैं, हिन्‍दू धर्म से जुड़ी सभी जिज्ञासाओं का शास्‍त्रोक्‍त पद्धति से समाधान देते हैं। आज सिर्फ नगरीय एवं ग्रामीण संस्‍कृति में ही नहीं देश के वनआछादित जीवन में भी वे सफलता से सनातन धर्म का भाव जागृत कर रहे हैं।

प्रस्तुत है उनसे हुई एक विस्तृत बातचीत के संपादित अंश-

प्रश्न : गुरुदेव! आज धर्मान्तरण (कन्‍वर्जन) को लेकर देशभर में चर्चा है। आप इसे किस दृष्टि से देखते हैं?

जगद्गुरु शंकराचार्य : सबसे पहले यह समझना होगा कि धर्म क्या है। आज अधिकांश विवाद इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि लोग धर्म को सिर्फ पूजा-पद्धति या बाहरी पहचान मान लेते हैं, जबकि सनातन परम्परा में धर्म जीवन का आधार है। यह केवल मंदिर जाने, तिलक लगाने या कोई विशेष वेश धारण करने का नाम नहीं है। धर्म मनुष्य को उसके माता-पिता, कुल, परम्परा, संस्कार और शास्त्रों से प्राप्त होता है। धर्म मनुष्‍य को पशुता से ऊपर उठाता है।

यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि ‘धर्मान्तरण’ शब्द ही शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है; इसे ‘धर्मत्याग’ कहना अधिक उचित होगा। यदि कोई व्यक्ति अपने पिता को बदल नहीं सकता, अपनी जन्मभूमि को बदल नहीं सकता, अपने पूर्वजों को बदल नहीं सकता, तो फिर धर्म का परिवर्तन कैसे कर सकता है? धर्म कोई वस्त्र नहीं है जिसे आज पहना और कल उतार दिया।

प्रश्न : किंतु आधुनिक समाज में यह तर्क दिया जाता है कि धर्म व्यक्ति की निजी पसंद है।

जगद्गुरु शंकराचार्य : पसंद और सत्य में अंतर होता है। किसी व्यक्ति को कोई विचारधारा अच्छी लग सकती है, कोई उपासना-पद्धति आकर्षित कर सकती है, किन्तु धर्म सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं है। सनातन धर्म मनुष्य को कर्म, पुनर्जन्म, पाप-पुण्य, मोक्ष और आत्मा के शाश्वत स्वरूप का ज्ञान देता है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति धर्म बदलना चाहता है तो उसे पहले यह समझना होगा कि वह किसे छोड़ रहा है और किसे स्वीकार कर रहा है। तब क्‍या वह त्‍याग करनेवाले के दोष और स्‍वीकार किए जानेवाले धर्म के गुणों को जानता है?

आज दुर्भाग्य यह है कि बहुत से लोग अपने ही ‘धर्म’ को जाने बिना उसके बारे में निर्णय लेने लगते हैं। ज्ञान के अभाव में लिया गया निर्णय स्वतंत्रता नहीं, भ्रम है और भ्रम की अवस्‍था कदापि स्‍थायी नहीं रहती, किंतु जब तक रहती है, व्‍यक्‍ति उसे ही सत्‍य मानकर व्‍यवहार करता है, इसलिए हमारा मानना है कि यह भ्रम होना ही क्‍यों चाहिए? जीवन में भ्रम के लिए कोई स्‍थान नहीं होना चाहिए। अत: प्रत्‍येक धार्मिक को चाहिए कि वह अपने सनातन धर्म को ज्ञान के आलोक से जानें।

प्रश्न : क्या केवल पूजा-पद्धति बदल लेने से धर्म बदल जाता है?

जगद्गुरु शंकराचार्य : कदापि नहीं। यदि कोई व्यक्ति शिखा त्याग दे, तिलक न लगाए, मंदिर न जाए या किसी अन्य पद्धति से प्रार्थना करने लगे, तो इससे धर्म का मूल तत्व नहीं बदल जाता। धर्म का सम्बन्ध मनुष्य की विश्व-दृष्टि से है। अन्‍तरात्‍मा से है। कुल-परम्‍परा से है।

उदाहरण के लिए, सनातन धर्म पुनर्जन्म को स्वीकार करता है। कर्मफल को स्वीकार करता है। मोक्ष को जीवन का परम लक्ष्य मानता है। यदि कोई व्यक्ति इन मूल सिद्धान्तों को छोड़कर दूसरी अवधारणा स्वीकार करता है, तब प्रश्न उठता है कि उसने यह निर्णय किस आधार पर लिया? क्या अध्ययन के आधार पर या किसी प्रभाव के कारण? सनातन हिन्‍दू धर्म में तो शास्‍त्र ही प्रमाण हैं।

प्रश्न : आप धर्मान्तरण की बढ़ती घटनाओं के पीछे क्या कारण देखते हैं?

जगद्गुरु शंकराचार्य : मुख्य कारण है; धर्म का अज्ञान। जिस समाज को अपने शास्त्रों का ज्ञान नहीं होगा, वह बाहरी प्रभावों से प्रभावित होगा ही। आज अनेक लोग वेद, उपनिषद, गीता और भारतीय दर्शन का नाम तो जानते हैं, किंतु उनके संदेश से अपरिचित हैं।

दूसरा कारण है सामाजिक और आर्थिक दुर्बलता। जब किसी व्यक्ति की विवशताओं का लाभ उठाकर उसे प्रभावित किया जाता है, तब वह अपने मूल धर्म और संस्कृति से दूर हो सकता है। धर्म प्रचार और धर्मान्तरण में अंतर है। ज्ञान देना एक बात है, किन्तु प्रलोभन देकर विश्वास बदलना दूसरी बात।

प्रश्न : क्या इस विषय में कानून की आवश्यकता है?

जगद्गुरु शंकराचार्य : यदि किसी व्यक्ति को भय, दबाव, छल, प्रलोभन या आर्थिक सहायता के लालच से धर्म बदलने (कन्‍वर्जन) के लिए प्रेरित किया जाता है, तो यह नैतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए कानून होना चाहिए, परन्तु कानून का उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना न होकर उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना होना चाहिए।

मैं मानता हूँ कि दण्ड उस व्यक्ति को मिलना चाहिए जो छलपूर्वक धर्मान्तरण कराता है, न कि उस व्यक्ति को जो परिस्थितियों का शिकार बन गया।

प्रश्न : कुछ लोग कहते हैं कि हिन्दू धर्म बहुत पुराना है और समयानुसार उसमें परिवर्तन होना चाहिए।

जगद्गुरु शंकराचार्य : यहाँ एक मूलभूत भ्रम है। लोग धर्म और व्यवस्था को एक समझ लेते हैं। व्यवस्था समयानुसार बदल सकती है, किंतु धर्म के शाश्वत सिद्धान्त नहीं बदलते। सत्य बदल सकता है क्या? अहिंसा बदल सकती है क्या? करुणा, दया, आत्मसंयम और ईश्वरभक्ति बदल सकती है क्या?

ये धर्म के मूल तत्व हैं और ये सभी कालों में समान रहते हैं। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, दया, करुणा, आत्मसंयम और ईश्वर-भक्ति, ये धर्म के शाश्वत तत्व हैं। इनका न तो कोई विकल्प है और न ही समय इनके महत्व को कम कर सकता है। अत: जैसे धर्म-शास्‍त्र का परिवर्तन नहीं हो सकता, माता-पिता का परिवर्तन नहीं किया जा सकता, तब धर्म परिवर्तन कैसे?

परिवर्तन और परिष्कार में अंतर है। जीवन की परिस्थितियाँ बदलती हैं, व्यवस्थाएँ बदलती हैं, किन्तु धर्म के मूल सिद्धान्त पूर्वत ही रहते हैं। वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। उनका आधार किसी व्यक्ति की कल्पना नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा अनुभूत सत्य है, इसलिए धर्म का मूल स्वरूप मनुष्य की इच्छा से परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर और अन्य स्मृतिकारों ने धर्म को नहीं बदला; उन्होंने विभिन्न परिस्थितियों में धर्म के आचरण की व्याख्या की, इसलिए धर्म का परिष्कार और धर्म का परिवर्तन यह दोनों ही अलग-अलग बातें हैं।

प्रश्न : यदि राजा या सरकार चाहे तो क्या धर्म में परिवर्तन कर सकती है?

जगद्गुरु शंकराचार्य : भारतीय परम्परा में धर्म को सत्‍ता से ऊपर रखा गया है। शास्त्र कहते हैं- राजनीति और नेता धर्म नियंत्रित होना चाहिए। “तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मः।” अर्थात धर्म स्वयं राजाओं का भी राजा है। राजा का कार्य धर्म की रक्षा करना है, धर्म बनाना नहीं। आज की भाषा में कहें तो सरकार कानून बना सकती है, प्रशासन चला सकती है, किंतु धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों का निर्माण नहीं कर सकती।

प्रश्न : आधुनिक शिक्षा और भौतिकवाद के युग में धर्म को कैसे जीवित रखा जा सकता है?

जगद्गुरु शंकराचार्य : धर्म को जीवित रखने की आवश्यकता नहीं है; धर्म स्वयं शाश्वत है। आवश्यकता धर्मबोध की धर्म पालन है। वर्तमान काल की शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ रोजगार प्राप्त करना रह गया है। बच्चों को विज्ञान, तकनीक और अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता है, किंतु जीवन का उद्देश्य क्या है, यह नहीं बताया जाता। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति, नैतिक शिक्षा, गीता, उपनिषद और दर्शन का परिचय होना चाहिए। जब तक नई पीढ़ी अपने बौद्धिक और आध्यात्मिक आधार से परिचित नहीं होगी, तब तक वह पश्चिमी भौतिकवाद के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकेगी।

प्रश्न : आप “धर्मान्तरण” शब्द पर ही आपत्ति क्यों करते हैं?

जगद्गुरु शंकराचार्य : क्योंकि धर्म का अन्तरण सम्भव नहीं है। आप घर बदल सकते हैं, देश बदल सकते हैं, भाषा बदल सकते हैं, नागरिकता बदल सकते हैं; लेकिन जन्म, वंश, माता-पिता और पूर्वज नहीं बदल सकते। इसी प्रकार धर्म भी परम्परा और संस्कार से प्राप्त होता है, इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि इसे धर्मान्तरण नहीं, बल्कि धर्मत्याग कहना चाहिए।

प्रश्न : समाज के लिए आपका अंतिम संदेश क्या है?

जगद्गुरु शंकराचार्य : मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि सनातन धर्म को समझिए। धर्म जीवन को दिशा देने वाला विज्ञान है। धर्म मनुष्य के जीवन का आधार है। धर्म हमें जोड़ता है, दिशा देता है और आत्मोन्नति का मार्ग दिखाता है। यह मनुष्य को केवल इस लोक में नहीं, परलोक में भी कल्याण का मार्ग दिखाता है। अपने शास्त्र पढ़िए। अपने पूर्वजों की परम्परा को जानिए। अपने धर्म को समझिए। क्योंकि जो समाज अपने आध्यात्मिक आधार को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक पहचान भी खो देता है।

सनातन धर्म का संदेश किसी के विरोध का नहीं, बल्कि आत्मबोध, सत्य, करुणा और विश्वकल्याण का संदेश है और इसलिए मैं पुनः कहूँगा कि “धर्मान्तरण नहीं, धर्मबोध आवश्यक है; क्योंकि धर्म बदला नहीं जाता, समझा और जिया जाता है। सदाचार पूर्वक हमें धर्म पालक होना है। युवा पीढ़ी को धर्म की शिक्षा प्राप्‍त हो। स्‍कूल, कॉलेज शिक्षा केंद्रों में धर्म शिक्षा अनिवार्य हो। गो वंश की रक्षा हो। हिन्‍दू मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए।”
(साभार : ऑर्गेनाइजर)