पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद 2014 से भी बड़ा परिवर्तन होता दिखाई देगा ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एक गठबंधन जिसकी गांठ कभी बंधी ही नहीं। स्वाभाविक था कि वह बिखरेगा और बिखरना शुरू हो गया है। उस गठबंधन का नाम है इंडी अलायंस।
2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हराने के उद्देश्य से जुलाई 2022 में यह गठबंधन बड़े जोशो खरोश के साथ बना था। उसका फार्मूला वही था कि अगर सत्तारूढ़ दल के खिलाफ सारे विपक्षी दल एक हो जाएं तो उसे हरा सकते हैं। यह जो गणित लगाया जाता है कि सत्तारूढ़ दल को इतने परसेंट वोट मिले और उसके खिलाफ इतने वोट पड़े तो जो वोट सत्तारूढ़ दल को नहीं मिले वह सब हमको मिल जाएंगे,ऐसा कम से कम भारत की राजनीति में तो कभी नहीं हुआ है। इसका पहला प्रयोग 1971 में हुआ था। उस समय सारे विपक्षी दल कांग्रेस के खिलाफ इकट्ठा हो गए। लेकिन फिर भी कांग्रेस की प्रचंड जीत हुई। यहीं से सबक मिला कि केवल अर्थमेटिक जोड़ने से सत्ता परिवर्तन नहीं होता। सत्ता परिवर्तन के लिए एक केमिस्ट्री चाहिए होती है और वह केमिस्ट्री पार्टियों के बीच की नहीं, विपक्षी दलों और मतदाता के बीच में होनी चाहिए। यानी मतदाता को आप और आपके नेतृत्व पर भरोसा हो। 1977 में ऐसा ही हुआ। कांग्रेस विरोधी सारी पार्टियां एक साथ आ गईं और जनता पार्टी बनाई। उस समय इमरजेंसी के खिलाफ माहौल था। एक केमिस्ट्री थी अपोजिशन लीडर्स और जनता के बीच में कि इस सरकार को हटाना है और इस सरकार के विकल्प के रूप में हम आपको देख रहे हैं। उस समय किसी ने नहीं पूछा कि आपका प्रधानमंत्री कौन होगा? चुनाव में जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला और उसकी सरकार बन गई। चूंकि गठबंधन में वैचारिक मतैक्य नहीं था इसलिए वह गठबंधन ज्यादा समय तक टिक नहीं सका और ढाई साल में ही सरकार गिर गई।
विपक्षी एकता की दूसरी कोशिश 1989 में हुई। कई दलों को मिलाकर जनता दल बना जबकि लेफ्ट पार्टीज और भाजपा अलग रहीं। इनके साथ सीटों का तालमेल हो गया। नतीजा यह हुआ कि 1984 में 414 लोकसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1989 में 197 सीटों पर सिमट गई और जनता दल के विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बोफोर्स और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोगों ने तय किया कांग्रेस पार्टी से छुटकारा पाना है। उसके बाद 1998 में भाजपा ने तय किया कि वह अपने जो कोर इश्यूज हैं, उनको किनारे रखकर समझौता करने को तैयार है। तो एनडीए बना और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गई। लेकिन 99 में एक वोट से सरकार गिर गई। फिर से चुनाव हुआ और फिर से एनडीए गठबंधन चुनाव जीत गया। 2004 में एनडीए का गठबंधन चुनाव हार गया। 2004 में कांग्रेस सत्ता में आई लेकिन किसी चुनाव पूर्व गठबंधन के कारण नहीं, चुनाव बाद के गठबंधन के कारण। चूंकि कांग्रेस को गठबंधन के ज्यादा साथी मिल गए इसलिए उसकी सरकार बन गई। लेकिन 2014 में स्थितियां बदल गईं। देश के लोगों ने तय किया कि गठबंधन का खेल बहुत हो चुका। एक पार्टी को बहुमत मिलना चाहिए। 2014 में पहली बार भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल गया और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए। 2019 में भाजपा को उससे ज्यादा बहुमत मिल गया। लेकिन 2024 में वह बहुमत कम हो गया। हालांकि उसका कारण 2022 में बना इंडी गठबंधन नहीं था बल्कि अन्य वजहें थीं। इंडी गठबंधन वह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया जो 1977 में जनता पार्टी, 1989 में जनता दल और 1998 में एनडीए ने किया कि सत्तारूढ़ दल के विरोध में जो वोट है, उसको एकजुट कर सके। इसीलिए वह सत्ता के दरवाजे तक नहीं पहुंच पाया।
अब इस इंडी गठबंधन को देखिए। यह गठबंधन आज तक अपना नेता नहीं चुन पाया। नेता तो छोड़िए कन्वीनर तक नहीं अपॉइंट कर पाया। अपना दफ्तर नहीं बना पाया। अपना कोई विज़न डॉक्यूमेंट नहीं पेश कर पाया। 2024 के चुनाव में भी कहीं साथ रहा कहीं खिलाफ लड़ा। लेफ्ट पार्टीज इस गठबंधन में शामिल हैं, लेकिन केरल में लेफ्ट और कांग्रेस एक दूसरे के खिलाफ लड़े। टीएमसी इस गठबंधन में शामिल है, लेकिन 2024 में कांग्रेस और टीएमसी अलग-अलग लड़े। ऐसा कई राज्यों में हुआ। अब स्थितियां बदल रही हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से जिस तरह से भाजपा एक के बाद एक राज्यों में विजय हासिल कर रही है, इस गठबंधन के नेताओं का मनोबल टूट रहा है। इस गठबंधन को बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी का एक ही लक्ष्य था। चालाकी से राहुल गांधी को पूरे विपक्ष का नेता बनाना। लेकिन राहुल गांधी को इस गठबंधन की अध्यक्षता सौंपने से ममता बनर्जी ने इनकार कर दिया। तो राहुल गांधी को नेतृत्व नहीं मिला। अब जिस तरह से भाजपा का राजनीतिक विस्तार बढ़ रहा है, आप मानकर चलिए कि पांच विधानसभाओं के चुनाव के नतीजे के बाद यह गठबंधन पूरी तरह से बिखर जाएगा। यही अपने आप में आश्चर्य है कि 4 साल तक इस गठबंधन के होने का भ्रम बना रहा, जो कि वास्तव में गठबंधन था ही नहीं।
इन पांचों विधानसभाओं के चुनाव के नतीजे के बाद सबसे ज्यादा फजीहत कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी की होने जा रही है। 4 मई के बाद इंडी गठबंधन के विसर्जन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और उसके संकेत अभी से मिलने शुरू हो गए हैं। पश्चिम बंगाल के चुनाव के आखिरी चरण में राहुल गांधी जिस तरह से ममता बनर्जी पर हमला कर रहे हैं, वह कोई राजनीतिक समझदारी का कदम नहीं है। वह व्यक्तिगत खुन्नस का मामला है। उनको लग रहा है कि ममता बनर्जी से बदला लेने का मौका आ गया है और वह अपने भाषणों में यह बात स्वीकार कर रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बन रही है। अगर उनको जरा भी संदेह होता कि ममता बनर्जी फिर से आ सकती हैं तो वह ममता के बारे में उस तरह की बातें नहीं बोलते, जो बोल रहे हैं। उनके भाषणों से समझ जाइए कि यह गठबंधन कितना मजबूत था। 2014 के बाद जो परिवर्तन हुआ,उससे भी बड़ा परिवर्तन होता हुआ आपको 4 मई के बाद दिखाई देगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)