खात्मे की ओर केजरीवाल की राजनीति,पंजाब गया तो आप का सर्वाइव करना मुश्किल।
प्रदीप सिंह।आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सदस्यों में से सात भाजपा में शामिल हो गए। सवाल है कि इसका राजनीतिक असर क्या होगा? आम आदमी पार्टी लगातार कमजोर हो रही इसके प्रमाण दिखाई दे रहे हैं। पहले वह दिल्ली विधानसभा का चुनाव हारी। पंजाब में भी उसकी सरकार तेजी से अलोकप्रिय होती जा रही है। दिन पर दिन अरविंद केजरीवाल नए-नए विवादों और घोटालों में घिर रहे हैं। अब दिल्ली में उनको जो नया सरकारी आवास मिला है, उसके रेनोवेशन को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि इतनी महंगी टाइल्स, मार्बल और तमाम तरह की फिटिंग्स कहां से लगवा रहे हैं? अब तो उनको विधायक या मुख्यमंत्री का वेतन भी नहीं मिलता। तो पैसा कहां से आ रहा है?
राज्यसभा के सात सदस्यों का पार्टी छोड़ देना कोई सामान्य घटना नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में राज्यसभा सदस्यों ने इससे पहले कोई पार्टी नहीं छोड़ी। इन सात में से चार हरभजन सिंह,संदीप पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी और अशोक मित्तल पंजाब से हैं। आप यह कह सकते हैं कि ये राज्यसभा के सदस्य हैं। इनका अपना कोई जनाधार नहीं है। इनके रहने या जाने से पंजाब की राजनीति पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला है। बात बिल्कुल सही है। लेकिन राजनीति में एक और चीज होती है परसेप्शन। यानी आम आदमी पार्टी के प्रति धारणा क्या बन रही है? भाजपा ने इन सात राज्यसभा सदस्यों को पार्टी में शामिल क्यों कराया? इसका सीधा सा गणित है कि राज्यसभा में भाजपा अब अकेले बहुमत के और करीब आ गई है। लेकिन यह बहुत छोटी बात है। उसके लिए इन्हें शामिल नहीं कराया गया है। आम आदमी पार्टी की इस समय पंजाब में सरकार है और 2027 में वहां विधानसभा चुनाव होने वाला है। 2027 में ही गुजरात विधानसभा का भी चुनाव होने वाला है। गुजरात में पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को 13% वोट मिले थे। भाजपा को आम आदमी पार्टी को पंजाब और गुजरात दोनों जगह रोकना है। अब रोकने के दो तरीके हैं। एक ऑर्गेनिक और दूसरा इनऑर्गेनिक। ऑर्गेनिक तरीका यह है कि अपनी ताकत बढ़ाइए। भाजपा के सामने गुजरात में तो यह समस्या है नहीं। लेकिन साथ ही वह नहीं चाहती कि गुजरात की राजनीति में एक नई पार्टी की एंट्री हो और उसकी ताकत बढ़े।

मैं मानता हूं कि ये जो सात राज्यसभा सदस्य भाजपा में शामिल हुए हैं, इनके जरिए उसने पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। अब सवाल उठता है कि जब इन लोगों का कोई जनाधार नहीं है तो उनको अपनी पार्टी में लेने से भाजपा कैसे तैयारी कर रही है। इसका जवाब है कि भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि आम आदमी पार्टी अंदर से टूट रही है। यह अरविंद केजरीवाल के खिलाफ एक तरह की बगावत है। जिन सात राज्यसभा सदस्यों ने आम आदमी पार्टी को छोड़ा हैं,उनमें संदीप पाठक का नाम सबसे महत्वपूर्ण है। वह केजरीवाल के बहुत करीबी और पार्टी के रणनीतिकार थे। कहा जाता है कि पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को गुजरात में जो सफलता मिली उसकी सारी रणनीति संदीप पाठक ने ही बनाई थी। इसके बावजूद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा चुनाव की रणनीति और तैयारी से संदीप पाठक को अलग कर दिया। संदीप पाठक दिल्ली आईआईटी से पढ़े हैं। आम आदमी पार्टी जब बनी थी तो कई लोग अच्छी खासी नौकरियां छोड़कर पार्टी में आए थे। धीरे-धीरे सब विदा हो गए हैं। अरविंद केजरीवाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी ईमानदारी और व्यवस्था को बदलने की इच्छा रखने वाले नेता की छवि थी। वह दोनों ध्वस्त हो चुकी हैं। इतनी जल्दी कोई पार्टी या उसका शीर्षस्थ नेता भ्रष्टाचार के इतने आरोपों में घिर जाए और जेल चला जाए, यह इससे पहले कभी नहीं हुआ।

अरविंद केजरीवाल की राजनीति धीरे-धीरे खत्म हो रही है। पंजाब का विधानसभा चुनाव तय करेगा कि आम आदमी पार्टी और खासतौर से अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक भविष्य क्या होगा। अरविंद केजरीवाल के हाथ से जिस दिन पंजाब निकला उस दिन पार्टी भी निकल जाएगी। वैसे भी पार्टी के जाने का खतरा बना हुआ है। शराब घोटाले में ईडी ने वकेरियस लायबिलिटी के तहत पार्टी को भी आरोपी बनाया है। अगर ईडी अपना केस साबित करने में सफल हो जाती है तो आम आदमी पार्टी का रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाएगा और वह राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो जाएगी। आम आदमी पार्टी में पहली बार इतनी बड़ी बगावत हुई है। अभी तक अरविंद केजरीवाल लोगों को निकालते थे। यह पहली बार है कि केजरीवाल ने नहीं, इन सात लोगों ने केजरीवाल को छोड़ दिया। उससे भी बड़ी बात यह है कि पार्टी में इतना बड़ा विद्रोह हो रहा था और केजरीवाल को कोई भनक तक नहीं लगी। वह चेन्नई में एमके स्टालिन के साथ रोड शो कर रहे थे। इससे लगता है कि केजरीवाल किसी दूसरी दुनिया में जी रहे हैं। उनको अपनी पार्टी की ही खबर नहीं है। आमतौर पर होता यह है कि पार्टियों को भनक लग जाती है। उसको रोकने का उनके पास एक तरीका होता है कि जितने संभावित बागी हैं, उनमें से कुछ को पार्टी पहले ही निकाल देती है। जिससे दो तिहाई लोग न टूटने पाएं। आम आदमी पार्टी वह भी नहीं कर पाई और ये सातों लोग भाजपा में शामिल हो गए।

अब आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब और गुजरात में खतरा है। मैं फिर कह रहा हूं कि पंजाब की सत्ता जाने के बाद आम आदमी पार्टी का सर्वाइव करना मुश्किल हो जाएगा। पार्टियां हारने के बाद जीतती भी हैं। लेकिन वही पार्टी, जो सड़क पर उतरकर परिश्रम करने को तैयार हो। अरविंद केजरीवाल यह अपने जीवन में कभी कर ही नहीं सकते। अरविंद केजरीवाल को लग्जरी का नशा हो गया है। दिल्ली में शीश महल गया तो पंजाब में मिल गया। अगर पंजाब में सरकार चली जाएगी तो उनकी सारी लग्जरी भी चली जाएगी। फिर उनको चलने के लिए स्टेट का हेलीकॉप्टर नहीं मिलेगा। तो इसलिए अरविंद केजरीवाल के बुरे दिनों की बहुत तेज गिनती शुरू हो चुकी है। यह भारतीय राजनीति का ऐसा विष है, जिसका जल्दी से जल्दी निकलना बहुत जरूरी था और उसके निकलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



