पहले चरण में वोटर ने ध्वस्त किया ममता के डर का तंत्र।
प्रदीप सिंह।पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान हो गया। पहले चरण की जो 152 सीटें हैं, इन्हीं से तय होना था कि सरकार किसकी आ रही है। 2021 के चुनाव में इन 152 सीटों में से 59 बीजेपी और 93 सीटें ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी जीती थी। पहले चरण में 92.6% पोलिंग हुई है। यह अपने आप में एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड है। इसकी प्रशंसा भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत तक ने की है।
इस चुनाव से कई चीजें तय होने जा रही हैं। पहली बात 92.6% पोलिंग का मतलब है कि मतदाता ने वोट चोरी का नारा लगाने वालों का मुंह काला कर दिया है। दूसरा, जो लोग देश और दुनिया में घूम-घूम कर कह रहे थे कि भारत में जनतंत्र खतरे में है, यह मतदान उनके मुंह पर करारा तमाचा है। प्रधानमंत्री के झालमुड़ी खाने से उसकी जो झार तृणमूल कांग्रेस को लगी थी, राज्य में मतदान का प्रतिशत देखकर बहुत बड़ी झार बाकी सभी दलों को लगी है। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव हमेशा याद रखा जाएगा और वह इसलिए नहीं कि कौन सी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और कौन सी पार्टी सत्ता में आ गई बल्कि इसलिए कि लोगों ने डर को हराकर जनतंत्र का साथ दिया। अपने जीवन,अपने परिवार के जीवन,अपनी संपत्ति की सुरक्षा की परवाह किए बिना मतदान केंद्र तक गए और मतदान किया। इसमें बहुत बड़ा योगदान चुनाव आयोग और हमारे सुरक्षा बलों का है।
आप कहेंगे कि पश्चिम बंगाल में वोट परसेंटेज तो पहले भी ज्यादा होता था। ममता बनर्जी जो तीन चुनाव जीती हैं सबमें 80% से ज्यादा पोलिंग हुई है। फर्क क्या है? फर्क यह है कि लगभग 50-55 साल बाद पश्चिम बंगाल के मतदाता ने अपना वोट डाला है और अपनी मर्जी से डाला है। पहले होता यह था कि आप घर बैठिए आपका वोट पड़ जाएगा। दूसरा आप वोट डालने आइए लेकिन हम जिसको कह रहे हैं उसको वोट डालेंगे वरना आप जिंदा रहेंगे कि नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। और तीसरा जो डर से निकलकर वोट देते थे। बीजेपी को पिछले चुनाव में 38% वोट ऐसे ही लोगों का मिला था। लेकिन इस बार लोगों ने डर को अपने घर के दरवाजे के अंदर नहीं आने दिया। ममता बनर्जी ने डर का जो तंत्र खड़ा किया था उसको पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने ध्वस्त कर दिया। इस चुनाव में भाजपा का संगठन कमजोर है या मजबूत है, यह सब बातें इररेलेवेंट हो चुकी हैं। जनता खुद भाजपा का संगठन बन गई है और आप याद कीजिए जब भी भय से निकलकर मतदाता वोट करता है तो सत्ता बदलती है। मुझे 1977 का चुनाव याद है। इमरजेंसी के दौरान 19 महीने लोगों ने जो आतंक का माहौल देखा और उससे निकलकर जब वोट देने का मौका आया तो इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेता को सत्ता से उखाड़ कर बाहर फेंक दिया। इंदिरा गांधी खुद की रायबरेली सीट तक हार गईं। यही ममता बनर्जी के साथ हो रहा है। उनको लगा था कि कट मनी और सिंडिकेट के जरिए जो तंत्र उन्होंने खड़ा किया है उसके बल पर वह फिर जीत जाएंगी, लेकिन जनता ने उस तंत्र को तोड़ दिया।
मैं पहले भी यह बात कह चुका हूं और फिर दोहरा रहा हूं कि अगर ममता बनर्जी खुद भवानीपुर से चुनाव हार जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि जब जनता सड़क पर उतरती है तो बड़े-बड़े तख्त और ताज हवा में उड़ जाते हैं। पहले चरण के मतदान ने ही पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे को तय कर दिया है। मेरा अनुमान है कि भाजपा पहले चरण की 152 सीटों में से 100 से 120 सीटें जीतने वाली है। लेकिन बात केवल इतनी नहीं है कि चुनाव का फैसला हो गया है। यह चुनाव केवल हार-जीत का मामला नहीं है। यह डेमोक्रेसी के मजबूत होने,डेमोक्रेसी के जड़ पकड़ने और डेमोक्रेसी में लोगों के अटूट भरोसे का चुनाव है। पश्चिम बंगाल से बाहर जो लोग रह रहे थे वे अपने पैसे खर्च करके फ्लाइट से, ट्रेन से या बाय रोड वोट देने के लिए आए। इन सभी का कहना था कि बदलाव चाहिए। अब सोशल मीडिया का जमाना है और सबको दिखाई दे रहा है कि देश के दूसरे प्रदेशों उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश में कैसे बदलाव हुआ है और पश्चिम बंगाल बंगाल की हालत क्या है? ममता बनर्जी के रहते तो राज्य के हालात सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है। इसीलिए जिस परिवर्तन का नारा देकर ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आई थीं, उसी परिवर्तन के नारे से वह बाहर जा रही हैं।
ऐसा बहुत कम होता है कि चुनाव के पहले चरण में चुनाव का नतीजा दिखाई देने लगे, लेकिन इस बार ऐसा हो गया है। राहुल गांधी तक ममता बनर्जी पर सीधा हमला बोलने लगे हैं। इसे आप हल्के में मत लीजिए। सवाल है कि चुनाव के बीच में मतदान से एक दिन पहले ऐसा उन्होंने क्यों किया? इसके दो कारण हैं। पहला,उनको विश्वास हो चुका है कि ममता बनर्जी सत्ता से बाहर जा रही हैं। और दूसरा, खुन्नस यानी बदला लेने की भावना। याद कीजिए जब इंडिया अलायंस बना था तो सवाल उठा था कि इसका अध्यक्ष कौन हो? कांग्रेस चाहती थी कि वह सबसे बड़ी पार्टी है तो अध्यक्षता राहुल गांधी को मिलनी चाहिए। ममता बनर्जी ने वीटो लगा दिया था कि राहुल गांधी को नहीं बनने देंगे। वैसे भी ममता के राहुल से संबंध कभी ठीक नहीं रहे। तो राहुल गांधी उस मौके की तलाश में थे जब ममता बनर्जी से बदला लिया जा सके। अभी तक इसलिए नहीं बोल रहे थे कि उनको डर था कि अगर ममता जीत गईं तो उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ जाएगी। विपक्षी दलों में यह मांग उठेगी कि ममता बनर्जी को विपक्ष का नेतृत्व सौंपा जाए। जब राहुल गांधी को इत्मीनान हो गया कि ममता बनर्जी की हार सुनिश्चित है तब उन्होंने उन पर हमला बोल दिया। यह संकेत हैं, जो बताते हैं कि चुनाव का नतीजा क्या होने वाला है।
प्रधानमंत्री के झालमुड़ी खाने पर जिस तरह से ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने रिएक्ट किया उससे पता चलता है कि उनके अंदर हताशा किस कदर बैठ चुकी है। तृणमूल कांग्रेस केवल हार नहीं रही है बल्कि बुरी तरह से हार रही है। बहुत से लोगों को लगता है कि बड़ा क्लोज कंटेस्ट है। किसी भी तरफ जा सकता है। यह सब फर्जी बातें हैं। बीजेपी तृणमूल कांग्रेस से मीलों आगे है। यह चुनाव देश की पूरी राजनीति की नई कहानी लिखेगा। 4 मई के बाद बहुत कुछ परिवर्तन होना है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



