विदेश जाकर भारत का अपमान करने की सजा मिलनी ही चाहिए।
प्रदीप सिंह।राम माधव का नाम आपने सुना जरूर होगा। इनका पूरा चरित्र बड़ा रहस्यमय है। वह भारत के साथ हैं या भारत के खिलाफ, भाजपा के साथ हैं या भाजपा के खिलाफ, भारत सरकार के साथ हैं या भारत सरकार के खिलाफ, यह तय करना बहुत मुश्किल है।


इसके अलावा अमेरिका ने जब भारत पर 50% टैरिफ लगाया तो उन्होंने एक एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा। उसमें उन्होंने कहा कि यह समस्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फोन कॉल से हल हो सकती है। उनका मतलब था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन करें और एक तरह से माफी मांगें। लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ। प्रधानमंत्री ने अमेरिका के राष्ट्रपति का फोन तक नहीं उठाया। राम माधव ऐसे नेताओं में हैं पाकिस्तान की दोस्ती की बड़ी बात करते हैं। जो चाहते हैं कि गोली और बोली दोनों साथ-साथ चले। उनको ऐसा लगता है कि उन्हें कुछ भी कहने का खुला लाइसेंस मिला हुआ है। उनकी जीवन शैली देखिए। साल में एक दर्जन से ज्यादा बार वह विदेश जाते हैं। किसके लिए काम करने जाते हैं? भारत सरकार और पार्टी ने तो उनको कोई ऐसा जिम्मा दे नहीं रखा है। दरअसल वह किसी के इशारे पर काम कर रहे हैं। हो सकता है कि किसी के दबाव में भी हों। उनके कारनामों की सूची बहुत बड़ी है। यह भाजपा और संघ के लोग अच्छी तरह से जानते हैं।

अमेरिका जाकर राम माधव ने जो भी बातें कहीं हैं, वह भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपमानित करने के लिए कही हैं। वह भारत को अमेरिका का पिट्ठू बता रहे हैं। जो राहुल गांधी बोलते हैं,वही बातें राम माधव बोल रहे हैं। लेकिन राम माधव का नाम आएगा तो भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आएगा। अगर इन दोनों संगठनों को अपनी प्रतिष्ठा, देश के गौरव और देश के स्वाभिमान की चिंता है तो राम माधव जैसे लोगों के साथ क्या होना चाहिए यह उनको तय करना चाहिए। राम माधव सरकार या पार्टी के कोई प्रवक्ता नहीं हैं। अमेरिका में जाकर ऐसी बात बोलने की उनकी हिम्मत कैसे हुई? यह हिम्मत उनको किस ताकत से मिल रही है? उन्होंने जो काम किया है, इसके मेरी नजर में सिर्फ तीन कारण हो सकते हैं। पहला आप कह सकते हैं कि उनको जानकारी नहीं थी। दूसरा आप कह सकते हैं कि उन्होंने किसी बुरे इरादे से ऐसा नहीं किया। लेकिन यह दोनों बातें पूरी तरह से गलत है। तीसरा कारण है और वही इस मामले में सही हो सकता है कि वह अपने को परम ज्ञानी मानते हैं। वह सोचते हैं कि प्रधानमंत्री क्या जानते हैं? विदेश मंत्री क्या जानते हैं? विदेश नीति मैं जानता हूं। मुझे पता है कि किस तरह का स्टैंड सरकार को लेना चाहिए। उनकी बातों से ऐसा लगता है कि वह डोनाल्ड ट्रंप के सामने मर्सी पिटीशन लेकर गए थे कि भारत को बख्श दीजिए। भारत आपके कहने के मुताबिक चलेगा। वह अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी से कॉम्प्रोमाइज करने के लिए तैयार है। राम माधव के इस आचरण से विपक्ष को एक बहुत बड़ा मुद्दा मिल गया है। अगर कांग्रेस पार्टी इसका लाभ उठाए तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा। उनके एक लाइन के स्पष्टीकरण कि मैं फैक्चुअली इनकरेक्ट था, से बात नहीं बनने वाली। आप भारत को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा चुके हैं। मुझे लगता नहीं कि इसको भारत सरकार चुपचाप बर्दाश्त करने वाली है। यह नेशनल पॉलिसी की बात है।

राम माधव वही बोल रहे हैं जो राहुल गांधी बोलते हैं। राम माधव वह बिल्कुल नहीं बोल रहे हैं जो भारत सरकार बोलती है। उन्होंने भारत सरकार, प्रधानमंत्री, भारत की विदेश नीति, ट्रेड पॉलिसी और इकोनमिक पॉलिसी पर सीधा हमला बोला है। वह हर महीने या हर दूसरे महीने दुनिया में किसी न किसी राष्ट्रध्यक्ष या शासनाध्यक्ष से मिल रहे हैं। आखिर किस हैसियत से? और भाजपा एवं संघ इसको बर्दाश्त कर रहा है। सवाल यह है कि क्यों? अगर राम माधव के खिलाफ इस समय कोई कार्रवाई न हुई तो आप समझिए कि कुएं में भांग पड़ी हुई है। राम माधव को अगर रोका नहीं गया तो भारत सरकार और भाजपा को नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। देश की प्रतिष्ठा गिराने वाले को हर हाल में सजा मिलनी चाहिए। वरना आज राम माधव बोले हैं कल कोई और बोलेगा और कोई रोक नहीं पाएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं आपका अखबार के संपादक हैं)



