एक केस से छुटकारा पाना चाहते थे, दूसरा पड़ गया गले ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
चालाकी या चतुराई अपने आप में कोई दुर्गुण नहीं है, लेकिन अगर चालाकी और चतुराई के साथ धूर्तता और अहंकार भी हो तो ऐसा जहर बनता है जो इसका इस्तेमाल करने वाले के लिए ही घातक बन जाता है। अरविंद केजरीवाल के साथ यही हुआ है।
पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सीबीआई की अपील पर लोअर कोर्ट के फैसले पर स्टे दिया था। लोअर कोर्ट ने शराब घोटाले के आरोपी अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को बिना ट्रायल ही बरी कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी। जस्टिस स्वर्णकांता ने अपने आदेश में कहा कि लोअर कोर्ट का फैसला इस मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक लागू नहीं होगा। अब दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल चाहते तो सुप्रीम कोर्ट जा सकते थे, लेकिन उनको मालूम था कि वहां से भी कोई राहत नहीं मिलने वाली है और राहत नहीं मिलेगी तो उनका खेल कैसे चलेगा। तो उन्होंने फैसला किया कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज स्वर्णकांता शर्मा और जुडिशरी पर हमला किया जाए। केजरीवाल ने कहना शुरू किया कि हमें आपसे न्याय नहीं मिलेगा क्योंकि आप कुछ ऐसी संस्थाओं के कार्यक्रम में गईं, जो संघ से जुड़े हुए हैं। उसके अलावा आपके बेटे का नाम सरकारी वकीलों के पैनल में है। केजरीवाल ने मांग की कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अपने को इस मामले से अलग कर लें। लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने ऐसा करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं अपनी और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा से समझौता नहीं करूंगी। अब मामला फंस गया तो अरविंद केजरीवाल ने दूसरा रास्ता निकाला। उन्होंने कहा कि हम आपकी कोर्ट का बॉयकॉट करेंगे। न हम अपीयर होंगे और न ही हमारा वकील अपीयर होगा। इस पर नियम के अनुसार जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि फिर हम न्यायमित्र का अपॉइंटमेंट करेंगे। यानी कोर्ट की ओर से वकील दिया जाएगा जो आपका केस लड़ेगा। एमिकस क्यूरी बनने के लिए कुछ वकील तैयार भी हो गए। इसीबीच केजरीवाल एंड कंपनी ने सोशल मीडिया पर जस्टिस स्वर्णकांता के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। वे महात्मा गांधी की समाधि पर चले गए और कहा कि सत्याग्रह कर रहे हैं। बिना इजाजत के कोर्ट प्रोसीडिंग्स की क्लिपिंग्स निकालकर सोशल मीडिया पर चलाना शुरू कर दिया। केजरीवाल और उनके साथियों को लगा कि ऐसा करने वह जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा और न्यायपालिका को दबाव में ले आएंगे। यह खेल हमसे बेहतर तो कोई खेल ही नहीं सकता। सोशल मीडिया पर कैंपेन चलने से डरकर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा खुद इस केस से हट जाएंगी। लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने साफ कर दिया कि मैं किसी हालत में नहीं हटूंगी। मैं इस केस की सुनवाई करूंगी। हालांकि अरविंद केजरीवाल हाईकोर्ट के  चीफ जस्टिस के पास भी गए थे कि स्वर्णकांता शर्मा को हटा दिया जाए,लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। इसके बाद जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने फैसला सुनाया तो उसमें पूरी बाजी पलट कर रख दी।
केजरीवाल और उनके साथियों को लग रहा था कि अदालत न्यायमित्र अपॉइंट करेगी तो हम उसका भी बॉयकॉट करेंगे। जो भी फैसला आएगा उसे एकतरफा फैसला बताएंगे। लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने दूसरा रास्ता चुन लिया। उन्होंने कहा इन लोगों ने जो कैंपेन चलाया है और उसके जरिए जिस तरह से मेरी और इस न्यायालय की प्रतिष्ठा को गिराने की कोशिश की है उसको देखते हुए मैं इन लोगों यानी अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक और विनय मिश्रा के खिलाफ क्रिमिनल कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट की प्रोसीडिंग शुरू कर रही हूं। चूंकि इस मामले की सुनवाई मैं ही करूंगी तो जो अदालती व्यवस्था है कि अगर कोई जज किसी लिटिगेंट के खिलाफ क्रिमिनल कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट की सुनवाई कर रहा है तो उस क्लाइंट के खिलाफ दूसरा जो मूल केस है उसकी सुनवाई नहीं कर सकता तो मैं वह केस दूसरे जज को ट्रांसफर कर रही हूं। अब आप अरविंद केजरीवाल की धूर्तता देखिए कि यह फैसला आते ही वह घोषणा करने लगे कि सत्य की जीत हो गई, महात्मा गांधी का सत्याग्रह जीत गया, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इस मुकदमे से अलग हो गईं। जबकि वास्तव में मामला इसका ठीक उल्टा है। अरविंद केजरीवाल जहां खड़े थे, उससे और ज्यादा बुरी स्थिति में आ गए हैं। अरविंद केजरीवाल और उनके साथी केस से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को हटाना चाहते थे लेकिन क्रिमिनल कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट का मुकदमा अलग से शुरू हो गया। बाकी मूल मुकदमा तो चलेगा ही। उसे दूसरा जज सुनेगा और वह भी साक्ष्यों के आधार पर फैसला करेगा। ऐसा नहीं है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा नहीं सुनेंगी तो फैसला अरविंद केजरीवाल के पक्ष में आ जाएगा। तो केजरीवाल और उनके साथी एक मुकदमे से अपने को बचाने की कोशिश कर रहे थे। उनको लग रहा था कि जज के खिलाफ कैंपेन चलाकर इस मामले से छुटकारा मिल जाएगा,लेकिन दूसरा मुकदमा भी गले पड़ गया। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों के लिए क्रिमिनल कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के मुकदमे में बचाव की गुंजाइश नहीं है क्योंकि आजकल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का लाइव टेलीकास्ट होता है, लेकिन आप उसकी क्लिपिंग्स निकालकर या रिकॉर्डिंग बिना परमिशन के सोशल मीडिया पर नहीं डाल सकते। अरविंद केजरीवाल को उनकी चालाकी, धूर्तता और अहंकार बहुत भारी पड़ने वाला है। अब उनको बताना पड़ेगा कि यह कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट उन्होंने क्यों किया? उसके बचाव में वह क्या बोलेंगे? इस मामले उन्हें जेल और जुर्माना दोनों हो सकता है। तो वह जो नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे, वह पूरा ध्वस्त हो गया। अब उनके खिलाफ एक नैरेटिव खड़ा हो गया है कि यह आदमी बहुत धूर्त है। यह किसी भी संवैधानिक संस्था को बदनाम करने की हर संभव कोशिश कर सकता है।
अरविंद केजरीवाल को लगा था कि चालाकी और धूर्तता के तो हम मास्टर हैं। इसी से तो हम राजनीति में आए। इसी से हम सत्ता में आए। याद कीजिए दिल्ली विधानसभा में दिया गया उनका वह बयान कि दिल्ली के मालिक हम हैं। नरेंद्र मोदी को तीन जन्म हमको हटाने के लिए लेने पड़ेंगे। तीन जन्म तो छोड़िए कुछ महीने में ही दिल्ली से उनका सफाया हो गया और अब अगला नंबर पंजाब में है। जो व्यक्ति लगातार दोबार प्रचंड बहुमत लेकर सत्ता में आया वह व्यक्ति दिल्ली में अपनी विधानसभा की सीट नहीं बचा पाया। तो दिल्ली के लोगों में उनकी लोकप्रियता कहां पहुंच गई है,इसका अंदाजा आप लगा लीजिए। अब शीश महल, प्राइवेट और सरकारी विमान, अन्य सुख सुविधाएं वह पंजाब में भोग रहे हैं। लेकिन मैं कह रहा हूं कि 2027 अरविंद केजरीवाल की राजनीति के समापन का वर्ष बनेगा। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद वहां आम आदमी पार्टी की सरकार तो नहीं आने वाली।
तो अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने इस बार गलत पंगा ले लिया। राजनीतिक दल से आप लड़ें, राजनीतिक दल के खिलाफ अभियान चलाएं, झूठ बोले, सच बोले, वह एक अलग मामला होता है। लेकिन किसी संवैधानिक संस्था पर हमला करने के लिए लक्ष्मण रेखा लांघ जाएं तो फिर आपका मुसीबत में पड़ना तय है। अरविंद केजरीवाल उनके साथी उस मुसीबत से घिरे हुए हैं। उससे निकलने का उनके पास कोई रास्ता नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)