व्‍योमेश चन्‍द्र जुगरान।
याद करें, 4 नवम्बर 2011 को अन्‍ना हजारे ने जब दिल्ली में 19 दिन का मौन व्रत तोड़ा था, तब उनकी जुबान उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्‍यमंत्री मेजर जनरल (अप्रा.) भुवन चन्‍द्र खंडूड़ी के लोकायुक्‍त विधेयक की तारीफ करते न थकी थी। अगले दिन 5 नवम्बर को अन्‍ना ने स्वयं भुवन चन्द्र खंडूड़ी से मुलाकात कर इस विधेयक को मील का पत्थर बताया था और कहा था कि उत्तराखंड का लोकायुक्‍त कानून देश के अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण है। इससे पहले 2 नवंबर को उत्तराखंड की इस ऐतिहासिक पहल के स्वागत में वरिष्‍ठ कानूनविद् शांतिभूषण समेत टीम अन्‍ना के प्रमुख सहयोगियों ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था कि खंडूड़ी सरकार का यह कदम संसद में एक सशक्त लोकपाल विधेयक के लिए आधारशिला का काम करेगा। शांतिभूषण का तो यहां तक कहना था कि उत्तराखंड का लोकायुक्‍त बिल अन्‍ना के जनलोकपाल का शत-प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है।
विधेयक को खंडूड़ी सरकार ने पहले विधानसभा से और फिर राज्यपाल से पास कराकर सचमुच एक नजीर पेश की थी। पर, 2012 के विधानसभा चुनाव में कोटद्वार सीट पर खंडूड़ी की हार और देहरादून की सत्ता पर जोड़तोड़ वाली कांग्रेस सरकार के काबिज होने के बाद राजनेताओं की जमात ने खंडूड़ी के लोकपाल को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। देश में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्‍नाई उफान के बीच आया उत्तराखंड का वह जनादेश हैरान करने वाला था। भुवन चन्‍द्र खंडूड़ी को तो 2009 में मुख्‍यमंत्री से पद से हटाकर 26 माह बाद में फिर से वापस लाया गया था। असल में माह बाद ही राज्‍य विधानसभा के चुनाव होने थे और भाजपा का अंतरिम सर्वे बता रहा था कि पार्टी की ‘वाट’ लगना तय है। ऐसे में एक बार फिर ईमानदार और अनुशासनप्रिय जनरल खंडूड़ी याद आए। उन्‍हें फिर से सूबे की कमान सौंपी गई और चुनाव में नारा दिया गया- ‘खंडूड़ी हैं जरूरी…। खंडूड़ी के पास मात्र चार माह का समय था। इतनी कम अवधि के बावजूद वह भ्रष्‍टाचार निरोधक लोकायुक्‍त जैसा विधेयक पारित करा कर पार्टी को जीत के मुहाने तक ले आए मगर पार्टी के भितरघातियों की कारस्‍तानी से कोटद्वार सीट से अपना चुनाव गंवा बैठे। लेकिन खंडूडी हार के बावजूद भितरघातियों के चक्रव्यूह में लड़े सेनानायक कहलाए। उनकी ‘चुनावी शहादत’ ने भितरघातियों और षडयंत्रकारी ‘जयद्रथों’ के तमाम छल-प्रपंचों की असलियत खोल कर रख दी।
वक्‍त ने उत्तराखंड को ईमानदारी की राजनीति की ओर बढ़ने का एक यह दूसरा शानदार अवसर दिया था। पहला मौका तब आया था, जब फरवरी 2007 में उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में जनरल भुवन चन्‍द्र खंडूड़ी अपनी पार्टी के लिए एक आकर्षक चुनावी वादा बन गए थे। देहरादून की जनसभा में अटल विहारी वाजपेयी ने खंडूड़ी का हाथ उठाकर लोगों से कहा था- आप भाजपा को वोट दें, हम आपको खंण्‍डूड़ी देंगे…। किसी राजनेता के राजनीतिक जीवन में ऐसा मौका दुलर्भ होता है जब उसकी छवि के आगे तमाम लोकलुभावन चुनावी नारे फीके पड़ जाएं ! नवोदित राज्‍य की तत्‍कालीन परिस्थितियों को शायद वाजपेयी जी बखूबी भांप रहे थे। केंद्र से मिले विशेष राज्‍य के दर्जे के बावजूद उत्तराखंड पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके बीमारू राज्‍य की खोह में जाने के खतरे बढ़ गए थे। खंडूडी केंद्र की वाजपेयी सरकार के ईमानदार और कुशलतम मंत्रियों में से थे- एकदम जांच-परखा सोना सरीखे ! फौजी पृष्‍ठभूमि का तमगा भी उन्‍हें दूसरों से अलग करता था। उत्तराखंड की तत्‍कालीन परिस्थितियों में खंडूड़ी एक शानदार नाम और बेहतरीन चयन था।
चुनाव जीतने के बाद वह मुख्‍यमंत्री बने और उन्‍होंने प्रशासनिक सुधार, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और राजकीय कोष की सुध लेना शुरू किया। जब उनकी कार्यशैली खासकर भ्रष्‍टाचार, बेईमानी, भाई-भतीजावाद और फिजूलखर्ची पर ताबड़तोड़ प्रहार करने लगी तो देहरादून से लेकर दिल्‍ली तक तक नेताओं-नौकरशाहों की मजबूत लॉबी जनरल के ‘छावनी राज’ से तिलमिला उठी। उनके इर्दगिर्द जाल बुना जाने लगा। काम में मशगूल मुख्‍यमंत्री खंडूड़ी अपनी ही पार्टी के महत्‍वाकांक्षी नेताओं के षडयंत्रों से अनजान रहे। 2009 के लोकसभा चुनावों में उत्तराखंड में भाजपा के सफाए के बाद खंडूड़ी के विरोधियों का काम और भी आसान हो गया।
निश्चित ही पार्टी आलाकमान से सामने यह प्रश्न तो रहा होगा कि जो शख्स तत्कालीन वाजपेयी सरकार के पांच सबसे काबिल मंत्रियों में शुमार माना गया हो, उसे कम समय में ही उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य के सीएम के रूप में फेल कैसे मान लिया जाए! फिर, राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान जनता से किए गए इस वादे की लाज कैसे संभलेगी कि ‘आप भाजपा को वोट दें हम आपको खंडूड़ी देंगे… ! परंतु वाजपेयी-आडवाणी के ‘उत्तरकाल’ से डगमगाती पारिस्थितिकी ने पराजयेत्तर पार्टी को खंडूरी की ‘चुनावी बलि’ लेने का आसान मौका दे दिया। तब के राज्यसभा सदस्य और खंडूड़ी के विरोधी भगत सिंह कोश्यारी अपना इस्तीफा राज्यसभा के उपसभापति को दे आए और मीडिया से मुखातिब हो उत्तराखंड में पार्टी के सफाए की नैतिकता का जिम्मा ओढ़ बैठे ! जाहिर है परोक्ष रूप से उनके निशाने पर खंडूड़ी थे। फिर कोश्यारी की मान-मनोव्वल का सिलसिला शुरू हुआ और  कोश्यारी चुपचाप मान भी गए। इसके चंद रोज बाद ही खंडूड़ी को दिल्ली बुलाकर कुर्सी छोड़ने का फरमान सुना दिया गया। यह सब ऐसे था, मानो सारी पटकथा पहले से ही लिखी गई हो।
मजेदार बात यह रही कि दिल्ली स्थित भाजपा हेडक्वार्टर में जब पर्यवेक्षक  वैंकया नायडू और थावर चंद गहलोत की निगरानी में नए नेता के चयन के लिए विधायक दल की बैठक हुई तो कोश्यारी के पक्ष में मात्र तीन विधायकों के समर्थन की पर्ची निकली। आलाकमान नेता पद के लिए निशंक पोखरियाल का नाम तय कर चुका था। इस तरह खंडूड़ी की सदरी से खजाने की चाभी निकाल ली गई जिसे उन्होंने भूमाफियाओं, दलालों, भ्रष्‍ट नौकरशाहों और पार्टी फंड के नाम पर जेबें भरने वालों के हाथ नहीं पड़ने दिया था। सियासत के इस खेल में बाजी चाहे जिसके हाथ लगी हो, मगर सच था कि पहाड़ ने एक नेकनीयत और ईमानदार राजनेता गंवा दिया था। खुद खंडूड़ी ने अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए साफ-साफ कहा था कि उन्हें ईमानदारी की सजा मिली है और राज्य के संसाधनों पर डाके की ताक में बैठे भूमाफियों और दलालों के भ्रष्‍ट गठजोड़ ने बहुत सोची-समझी साजिश के तहत उन्हें किनारे लगाया है। बात सच निकली। खंडूड़ी के उत्तराधिकारी उत्तराखंड को न सिर्फ पुराने ढर्रे, बल्कि और बदतर स्थिति में पहुंचाने वाले सिद्ध हुए।
भुवनचन्‍द्र खंडूड़ी ने इसी 19 मई को देहरादून में अंतिम सांस ली। वह 91 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार चल रहे थे। 20 मई को पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ उनका अंतिम संस्‍कार किया गया। 1 अक्‍टूबर 1934 को जन्‍मे खंडूड़ी ने इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय और बाद में प्रतिष्ठित सैन्‍य संस्‍थानों से उच्‍च शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्‍त किया। 1990 तक उन्होंने भारतीय सेना के इंजीनियर्स कोर में सेवाएं दीं और मेजर जनरल के  पद से सेवानिवृत हुए। सेवाकाल के दौरान उन्हें राष्ट्रपति के परम विशिष्ट सैन्य पदक से भी नवाजा गया। 1991 में उन्‍होंने राजनीति में प्रवेश किया और गढ़वाल संसदीय क्षेत्र से पहली बार सांसद चुने गए। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) के रूप में उन्‍होंने यादगार पारी खेली और राष्‍ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को नया आयाम दिया। उनका निधन खासकर उत्तराखंड की राजनीति में एक युग का अवसान है। शुचिता और ईमानदारी की राजनीति पर जब भी बात होगी, जनरल भुवन चन्‍द्र खंडूड़ी सदैव प्रथम पंक्ति में नजर आएंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)