इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के दबाव में राहुल ने सतीशन के नाम पर लगाई मुहर,चहेते वेणुगोपाल किया किनारे।
प्रदीप सिंह।विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद 10 दिन बाद आखिरकार कांग्रेस ने तय कर लिया कि केरलम में उसका मुख्यमंत्री कौन होगा। मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस पार्टी ने वीडी सतीशन को चुना। अब देखने में तो यह बड़ी स्वाभाविक सी बात लगती है। सतीशन पांच साल से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। सीपीएम के खिलाफ ग्राउंड पर लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन यह मामला उतना सीधा नहीं है।
केरलम में मुख्यमंत्री पद की रेस में दो और नाम थे। एक केसी वेणुगोपाल, जो कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन और राहुल गांधी के राइट हैंडमैन हैं। दूसरा रमेश चेन्निथला, जो प्रदेश अध्यक्ष और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। ये दोनों रेस से बाहर हो गए। मेरा मानना है कि तमिलनाडु में क्रिश्चियन मुख्यमंत्री बनने के बाद केरलम में मुस्लिम सरकार बन गई है। आप कहेंगे कि वीडी सतीशन तो मुस्लिम हैं नहीं तो मुस्लिम सरकार कैसे बन गई? पहले केरल की डेमोग्राफी को समझिए और फिर केरल विधानसभा के गणित को जानिये। केरलम तीन सामाजिक समूहों में बंटा हुआ है। पहला सबसे छोटा सामाजिक समूह है क्रिश्चियंस का, जिनकी आबादी 18.38% है। दूसरा समूह मुसलमानों का है,जिनकी आबादी 26.56% है। तीसरा सबसे बड़ा समूह हिंदुओं का है,जिनकी आबादी 54.73% है। केरलम में आबादी के दृष्टि से हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन प्रभाव की दृष्टि से हिंदू अल्पसंख्यक हैं। उनका राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं है। दोनों गठबंधन एलडीएफ और यूडीएफ की सारी कोशिश रहती है कि मुस्लिम और क्रिश्चियन को साथ जोड़ा जाए क्योंकि ये दोनों एकमुश्त वोट करते हैं। इस विधानसभा चुनाव का जो नतीजा आया है उसमें 35 मुस्लिम विधायक जीते हैं। इन 35 में से 22 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के हैं। उसके सारे के सारे विधायक मुसलमान हैं। इसके अलावा आठ मुस्लिम विधायक कांग्रेस और पांच मुस्लिम विधायक एलडीएफ से जीते हैं।
केरलम में मुख्यमंत्री पद के लिए असली प्रतिद्वंद्विता वीडी सतीशन और केसी वेणुगोपाल के बीच थी। केसी वेणुगोपाल राहुल गांधी के व्यक्ति थे। उन्होंने ही टिकट बांटे थे तो इसलिए विधायक दल में सबसे ज्यादा समर्थन केसी वेणुगोपाल को था। लेकिन उनको क्यों नहीं बनाया गया, उसके कई कारण हैं। एक कारण तो यह है कि केसी वेणुगोपाल अलप्पुझा से सांसद हैं। अगर उनको मुख्यमंत्री बनाया जाता तो उनको लोकसभा सीट से इस्तीफा देना पड़ता। तो पार्टी में यह मानना था कि अगर केसी वेणुगोपाल इस्तीफा देंगे और उनकी जगह किसी और को बाय इलेक्शन में उतारा जाएगा तो वह सीट सीपीएम को जा सकती है। दूसरा केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एक विधायक को इस्तीफा दिलवाना पड़ता और बाय इलेक्शन में वेणुगोपाल हार जाते तो फिर कांग्रेस का क्या होता? लेकिन सवाल यह है कि क्यों हार जाते? उसके पीछे कारण यह है कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग उनके नाम पर तैयार नहीं थी। मुस्लिम लीग की पसंद वीडी सतीशन थे। अब वीडी सतीशन का सामाजिक आधार देखिए। चर्च के लोग उनको पसंद नहीं करते। केरलम में ओबीसी कम्युनिटी एजवा की आबादी करीब 30% है। एजवा भी सतीशन को पसंद नहीं करते। विधायकों का बहुमत केसी वेणुगोपाल के पक्ष में था। राहुल गांधी भी चाहते थे कि वेणुगोपाल बनें, लेकिन राहुल गांधी की नहीं चली। वह केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए। दूसरी ओर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग वीडी सतीशन को चाहती थी। अगर सतीशन को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता तो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग असंतुष्ट खेमे में चली जाती। ऐसे में वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बना दिया जाता तो उनकी सरकार की राजनीतिक स्थिरता हमेशा संदेह के घेरे में रहती। तो राहुल गांधी ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सामने सरेंडर कर दिया। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि केरल में मुस्लिम सरकार बनने जा रही है। केरलम में करीब 54% आबादी होने के बावजूद हिंदू बंटा हुआ है। अब आप इस गणित को समझिए। मुस्लिम और क्रिश्चियन एकजुट हैं। मुस्लिम लव जिहाद का शिकार होने के बावजूद इस बार क्रिश्चियन समुदाय ने मुसलमानों के साथ वोट किया। वह हिंदुओं की संरक्षक पार्टी बीजेपी के साथ नहीं गया। बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने इस बार क्रिश्चियन समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी,लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। बल्कि मैं कहूंगा कि क्रिश्चियन समुदाय ने केरलम में बीजेपी को धोखा दिया। लव जिहाद, लैंड जिहाद के मुद्दे पर क्रिश्चियन समुदाय ने बीजेपी की मदद ली। वोट देने का मौका आया तो बीजेपी को छोड़ दिया।

वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाए जाने से अब 22 विधायकों वाली इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग सरकार की ड्राइविंग सीट पर होगी। केरलम की शिक्षण और वित्तीय संस्थाओं पर लंबे समय तक ईसाइयों का कब्जा रहा। उसके बाद गल्फ में जब केरलम के मुसलमान गए और वहां से पैसा भेजना शुरू किया तो धीरे-धीरे मुसलमानों का प्रभाव बढ़ने लगा। अब केरलम में शिक्षण और वित्तीय संस्थाओं पर मुस्लिम समाज का अच्छा खासा प्रभाव है। बहुसंख्यक हिंदू बहुत पीछे हैं। क्योंकि वह बंटे हुए हैं। संख्या में कम होने के बावजूद ईसाई और मुस्लिम समुदाय दोनों ज्यादा प्रभावी हैं। तो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यह सरकार चलाएगी, इसमें किसी को कोई दूर-दूर तक संदेह नहीं होना चाहिए। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को नाराज करने या उसकी बात न मानने का जोखिम उठाने की हिम्मत कांग्रेस पार्टी में नहीं है। कांग्रेस को डर है कि अगर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को नाराज किया तो हो सकता है कि वह सीपीएम के साथ चले जाए। सीपीएम पिछले 5 साल से लगातार कोशिश कर रही है कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग एलडीएफ में आ जाए। भाजपा का बढ़ता हुआ प्रभाव भी कांग्रेस को डरा रहा है। आपको लगेगा कि भाजपा की तो केवल तीन ही सीटें हैं। लेकिन आपको यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि 2016 में पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की सिर्फ तीन सीटें थीं, जो 21 में 77 और 26 में 207 हो गईं। ऐसा ही केरलम में 2031 और उसके बाद 2036 में नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता। इसके लिए भाजपा को पश्चिम बंगाल की तरह केरलम में भी हिंदुओं को एकजुट करना होगा।

भाजपा की निगाह एजवा कम्युनिटी पर है। यह समुदाय लंबे समय से सीपीएम के साथ रहा है। वीएस अच्युतानंदन इसी समाज से आते थे। इसके अलावा बीजेपी की नजर नायर समाज पर भी है, जो जनसंख्या की दृष्टि से एजवा के बाद दूसरे नंबर पर आता है। तो कांग्रेस के लिए अब डर केवल सीपीएम का नहीं रह गया है। केरलम की राजनीति में भाजपा का भी डर कांग्रेस के मन में समाने लगा है। इसलिए जैसे आदमी डरता है तो जोर से किसी चीज को पकड़ता है। उसी तरह से कांग्रेस ने जोर से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को पकड़ लिया है। मुस्लिम लीग कांग्रेस की मजबूरी बन गई है और यह आगे चलकर उसकी समस्या बनने वाली है क्योंकि मुख्यमंत्री तो कांग्रेस का रहेगा, लेकिन नीतियां मुस्लिम लीग के आधार पर बनेंगी। यह इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग उसी मुस्लिम लीग से जुड़ी हुई है,जिसने पाकिस्तान बनवाया। इसमें वही लोग,वही मानसिकता,वही सोच और वही नीति है।
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग अब तक केरलम की किसी भी सरकार में इतनी प्रभावी नहीं थी,जितनी अब होगी। उसका कारण यह भी है कि कांग्रेस देश में इससे ज्यादा कमजोर स्थिति में शायद ही कभी रही हो। केरलम में सरकार बनाना कांग्रेस के पॉलिटिकल सर्वाइवल के लिए बेहद जरूरी था। इसीलिए राहुल गांधी ने अपने करीबी दोस्त और राइट हैंड मैन केसी वेणुगोपाल की बलि दे दी और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। आप थोड़े दिन इंतजार कीजिए। फिर देखिए कि केरलम की इस सरकार पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का कितना और कैसा प्रभाव है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








