प्रदीप सिंह।जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। यानी जिस पर जब बीतती है तभी पता चलता है कि दर्द क्या होता है। यही आजकल ममता बनर्जी के साथ हो रहा है।
ममता बनर्जी 15 साल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं। कोई ऐसा अत्याचार नहीं है, जो उनके राज में न हुआ हो। पश्चिम बंगाल से सीपीएम को हटाने में उनकी सबसे बड़ी मदद नक्सलियों और माओवादियों ने की। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जैसे ही टाटा को सिंगूर में बुलाकर एक तरह से घोषणा कर दी कि वह पश्चिम बंगाल का औद्योगिकीकरण करने जा रहे हैं, यह माओवादियों को मंजूर नहीं हुआ। माओवादियों ने एक तरह से मजदूर यूनियनों और वसूली के जरिए अपनी सत्ता चलाई। वे ट्राइबल्स के कोई दोस्त नहीं थे। वे ट्राइबल्स,विकास, पश्चिम बंगाल और देश के दुश्मन थे। सीपीएम को हटाने के लिए ऐसे माओवादियों से ममता बनर्जी ने हाथ मिलाया। इसका नतीजा यह हुआ कि 2011 में पश्चिम बंगाल में सीपीएम की सत्ता चली गई और ममता बनर्जी आ गईं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में एक भी इंडस्ट्री नहीं आई। टाटा का प्लांट भी गुजरात चला गया। इससे आप समझ सकते हैं कि ममता बनर्जी ने कितना बड़ा नुकसान पश्चिम बंगाल का किया। पश्चिम बंगाल एक समय देश का सबसे बड़ा औद्योगिक राज्य था। वहां से ममता ने इंडस्ट्रीज को खत्म कर दिया।
अपनी सत्ता जाने के बाद वही ममता बनर्जी गुरुवार को काला कोट पहनकर हाईकोर्ट पहुंचीं। उन्होंने कानून की पढ़ाई की है। सुप्रीम कोर्ट में भी वह एसआईआर के मुद्दे पर अपना केस प्लीड कर चुकी हैं। वह हाईकोर्ट क्यों पहुंचीं,यह भी जानना जरूरी है। उन्हीं की पार्टी के नेता कल्याण बनर्जी के बेटे ने मामला दर्ज कराया था कि चुनाव नतीजे आने के बाद पश्चिम बंगाल में हिंसा हो रही है। मुझे नहीं मालूम कि यह बात सुनकर आपको हंसी आएगी या रोना आएगा। यह बात ममता बनर्जी के मुंह से सुनकर बड़ा अजीब सा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि शैतान वेद वाक्य बोल रहा है। जिसने राजनीतिक हिंसा को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया हो। ममता राज में चुनाव से पहले हिंसा, चुनाव के दौरान हिंसा और चुनाव के बाद और हिंसा होती थी। इस मामले में उन्होंने सीपीएम की पूरी-पूरी नकल की। उन्होंने अपने कैडर को एक तरह से अपराधियों के गिरोह में बदल दिया। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में जिस तरह की हिंसा हुई, उससे भयावह चुनावी हिंसा मुझे नहीं लगता कि भारत के किसी प्रदेश में कभी हुई हो। सैकड़ों लोग मारे गए। हजारों की संख्या में लोगों ने पश्चिम बंगाल से भागकर असम में शरण ली। ऐसा आतंक का राज चलाने वाली ममता बनर्जी कह रही हैं कि उनके कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा हो रही है। उन्होंने बताया कि 10 लोगों की हत्या हुई है। कोर्ट में उनका अगला वाक्य सुनिए, उसे सुनकर आपको और आश्चर्य होगा। उन्होंने कहा कि चुनावी हिंसा में मारे गए लोगों में से छह हिंदू हैं। इसका मतलब ममता बनर्जी नैरेटिव बना रही हैं कि भाजपा हिंदू विरोधी है और हिंदुओं की हत्या करा रही है। अब ममता बनर्जी के मुंह से ये सब बातें सुनकर मुझे नहीं लगता कि कोई उनके इस नैरेटिव पर विश्वास करेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस कुछ कर नहीं रही है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि संदेश खाली में जब आपकी पार्टी के नेता ने महिलाओं पर अत्याचार किया, बलात्कार किया,घर में घुसकर मारा पीटा,आग लगाई, तब आपने क्या किया था? आरोपी शाहजहां शेख को सीबीआई से बचाती रहीं। आपकी पुलिस उसको छिपाती रही। इसके अलावा आरजी कर की घटना के बाद आपकी सरकार ने क्या किया? विक्टिम परिवार को ही सरकार प्रताड़ित करती रही और जो आरोपी थे, उनको बचाने का हरसंभव प्रयास किया गया। आरजी कर कांड के सबूत तक नष्ट कराए गए। आज पश्चिम बंगाल में सड़कों और गलियों में चोर चोर के नारे लग रहे हैं। पीसी चोर, भाइपो चोर के गाने और कविताएं बन रही हैं। लोग इन पर थिरक रहे हैं। यह राजनीतिक विरोध नहीं है। यह अत्याचार से प्रताड़ित लोगों की आह निकल रही है। ममता बनर्जी को यह आह राजनीतिक रूप से जला देगी।
ममता बनर्जी के राज में मुस्लिम आबादी को छोड़कर 70% हिंदुओं पर जमकर अत्याचार हुए। उस समय आप जय श्री राम का नारा नहीं लगा सकते थे। नारा लगाएंगे तो गिरफ्तार कर लिया जाएगा। थाने ले जाकर पिटाई होगी। मुकदमा होगा। उसी का नतीजा है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को 207 सीटें मिली हैं। यह ममता बनर्जी के अत्याचार के खिलाफ लोगों का जयघोष है। व्यक्ति जब सत्ता में होता है और अहंकार उस पर हावी हो जाता है तो उसको लगता है कि हम तो सत्ता से बाहर कभी जाएंगे ही नहीं। वही हाल ममता बनर्जी का था। जनादेश आने के बाद भी उन्होंने ग्रेसफुली उसको स्वीकार नहीं किया। कहा कि मुझे हराया गया है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से मना कर दिया। उनको बर्खास्त करना पड़ा। यह अपने आप में पहला और एकमात्र उदाहरण है। यह सब करने वाली ममता बनर्जी हाईकोर्ट में कह रही हैं कि बंगाल को बचाइए। कह रही हैं यह बुलडोजर वाला राज्य नहीं है। उन्हें यह समझना चाहिए कि बुलडोजर क्यों चलता है? बुलडोजर उत्तर प्रदेश में तो न्याय का प्रतीक बन गया है। वह वहीं चलता है जहां सरकारी जमीन, निजी जमीन और दूसरे की संपत्ति पर कब्जा हो। बाकायदा जो लीगल प्रोसीजर है, उसको फॉलो किया जाता है। बुलडोजर जहां चलता है, वहां जनसमर्थन आप देखिए। उससे पता चलता है कि यह कानून सम्मत ही नहीं, जनसम्मत भी है। लेकिन अहंकार में डूबी हुई ममता बनर्जी को यह जमीनी वास्तविकता दिखाई नहीं दे रही है। उनको लगता है कि काला कोट पहनकर वह अदालत में पहुंचेंगी तो फैसला बदल जाएगा,कानून बदल जाएगा,संविधान बदल जाएगा। आप कानून और संविधान का उल्लंघन करने के बाद विक्टिम कार्ड खेलने के लिए अदालत जाएं तो यह कैसे चल सकता है? लेकिन ममता बनर्जी तो ममता बनर्जी हैं। दरअसल वह खबर और चर्चा में बने रहने के लिए ऐसा कर रही हैं। उनकी पार्टी चुनाव हार गई है। वह मुख्यमंत्री रही नहीं। विधायक भी नहीं रहीं। तो अब उनके पास यही सब बचा है। विक्टिम कार्ड खेलने की तो वह माहिर हैं, लेकिन विक्टिम कार्ड की भी एक समय सीमा होती है। वह तब तक चलता है जब तक लोगों के मन में संदेह हो कि यह सच है या गलत है। जब लोगों के मन में पक्का हो चुका हो कि आप गलत रास्ते पर हैं, कानून और संविधान के विरोध में हैं, तब यह विक्टिम कार्ड नहीं चलता। इसलिए 2021 में ममता बनर्जी का जो विक्टिम कार्ड चला वह 2026 में नहीं चला क्योंकि उसकी एक्सपायरी डेट निकल चुकी थी। उस एक्सपायर्ड विक्टिम कार्ड को फिर से खेलने की कोशिश में ममता बनर्जी को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह बात ममता बनर्जी और उनके साथी जितनी जल्दी समझ जाएं उतना अच्छा होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
ममता बनर्जी के राज में मुस्लिम आबादी को छोड़कर 70% हिंदुओं पर जमकर अत्याचार हुए। उस समय आप जय श्री राम का नारा नहीं लगा सकते थे। नारा लगाएंगे तो गिरफ्तार कर लिया जाएगा। थाने ले जाकर पिटाई होगी। मुकदमा होगा। उसी का नतीजा है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को 207 सीटें मिली हैं। यह ममता बनर्जी के अत्याचार के खिलाफ लोगों का जयघोष है। व्यक्ति जब सत्ता में होता है और अहंकार उस पर हावी हो जाता है तो उसको लगता है कि हम तो सत्ता से बाहर कभी जाएंगे ही नहीं। वही हाल ममता बनर्जी का था। जनादेश आने के बाद भी उन्होंने ग्रेसफुली उसको स्वीकार नहीं किया। कहा कि मुझे हराया गया है। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से मना कर दिया। उनको बर्खास्त करना पड़ा। यह अपने आप में पहला और एकमात्र उदाहरण है। यह सब करने वाली ममता बनर्जी हाईकोर्ट में कह रही हैं कि बंगाल को बचाइए। कह रही हैं यह बुलडोजर वाला राज्य नहीं है। उन्हें यह समझना चाहिए कि बुलडोजर क्यों चलता है? बुलडोजर उत्तर प्रदेश में तो न्याय का प्रतीक बन गया है। वह वहीं चलता है जहां सरकारी जमीन, निजी जमीन और दूसरे की संपत्ति पर कब्जा हो। बाकायदा जो लीगल प्रोसीजर है, उसको फॉलो किया जाता है। बुलडोजर जहां चलता है, वहां जनसमर्थन आप देखिए। उससे पता चलता है कि यह कानून सम्मत ही नहीं, जनसम्मत भी है। लेकिन अहंकार में डूबी हुई ममता बनर्जी को यह जमीनी वास्तविकता दिखाई नहीं दे रही है। उनको लगता है कि काला कोट पहनकर वह अदालत में पहुंचेंगी तो फैसला बदल जाएगा,कानून बदल जाएगा,संविधान बदल जाएगा। आप कानून और संविधान का उल्लंघन करने के बाद विक्टिम कार्ड खेलने के लिए अदालत जाएं तो यह कैसे चल सकता है? लेकिन ममता बनर्जी तो ममता बनर्जी हैं। दरअसल वह खबर और चर्चा में बने रहने के लिए ऐसा कर रही हैं। उनकी पार्टी चुनाव हार गई है। वह मुख्यमंत्री रही नहीं। विधायक भी नहीं रहीं। तो अब उनके पास यही सब बचा है। विक्टिम कार्ड खेलने की तो वह माहिर हैं, लेकिन विक्टिम कार्ड की भी एक समय सीमा होती है। वह तब तक चलता है जब तक लोगों के मन में संदेह हो कि यह सच है या गलत है। जब लोगों के मन में पक्का हो चुका हो कि आप गलत रास्ते पर हैं, कानून और संविधान के विरोध में हैं, तब यह विक्टिम कार्ड नहीं चलता। इसलिए 2021 में ममता बनर्जी का जो विक्टिम कार्ड चला वह 2026 में नहीं चला क्योंकि उसकी एक्सपायरी डेट निकल चुकी थी। उस एक्सपायर्ड विक्टिम कार्ड को फिर से खेलने की कोशिश में ममता बनर्जी को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह बात ममता बनर्जी और उनके साथी जितनी जल्दी समझ जाएं उतना अच्छा होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









