भाजपा की निगाहें 70 प्रतिशत गैर जट सिख वोटरों पर, नायब सिंह सैनी ने मोर्चा संभाला।
प्रदीप सिंह।भारतीय जनता पार्टी के पिछले 12 सालों में अलग-अलग राज्यों में प्रोजेक्ट रहे हैं। 2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद पार्टी का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट उत्तर प्रदेश था,जो 2017 में सफलतापूर्वक पूरा हो गया। उसके बाद 2024 में उड़ीसा, 2026 में बिहार और मैं मानता हूं कि अब तक के सबसे बड़े प्रोजेक्ट पश्चिम बंगाल में भी पार्टी ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए। पश्चिम बंगाल की जीत कोई मामूली जीत नहीं है। यह भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदलने वाली जीत है। अब पार्टी का अगला प्रोजेक्ट पंजाब है।
2027 में सात राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, गोवा, पंजाब और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है। इसलिए यह राज्य भाजपा के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। लोकसभा चुनाव में उसे सबसे ज्यादा नुकसान यहीं हुआ था। लेकिन, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को मैं भाजपा के लिए कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं मानता। वहां तीसरी बार उसकी सरकार बनेगी, इसमें मुझे अभी से कोई संदेह नहीं है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती वाला राज्य पंजाब है। पश्चिम बंगाल की तरह यह भी बॉर्डर स्टेट है और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है। यहां पाकिस्तान की आईएसआई का बड़ा दखल है। ड्रग रैकेट चलाना, इनफिल्ट्रेशन, हथियार भेजना यह सब आईएसआई पंजाब में लगातार कर रही है। पंजाब की भगवंत सिंह मान की सरकार के लिए ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। उसके लिए मुद्दा सिर्फ यह है कि सत्ता के जरिए कैसे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सकता है। वह उसी में लगी हुई है। जरा पंजाब की राजनीति को समझते हैं,उससे पता चलेगा कि वहां भाजपा के लिए चुनौती कितनी बड़ी है।

पंजाब की राजनीति जट सिख प्रभावित राजनीति रही है। हालांकि उनकी आबादी मुश्किल से 30% है और 70% आबादी गैर जट सिखों की है। लेकिन पंजाब में सत्ता में कौन आएगा,यह जट सिख ही तय करते हैं। जब से राज्य बना है तब से 13 मुख्यमंत्री हुए हैं,इनमें से 11 जट सिख हुए हैं। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि उसके पास जट सिख समाज से कोई नेता नहीं है और जट सिख समाज भाजपा को स्वीकार भी नहीं करता। यह जो तथाकथित किसान आंदोलन हुआ था, उसके बाद से भाजपा के प्रति और ज्यादा नाराजगी है। भाजपा के लिए पंजाब में अगर कोई मौका बन सकता है तो वह गैर जट सिख समाज,जो आबादी का 70 फीसदी है, से ही बन सकता है। इसमें ओबीसी समाज, दलित समाज, शहरी हिंदू और यहां के वोटर बन गए दूसरे राज्यों से आए माइग्रेंट्स शामिल हैं। इस समाज को एक करने के लिए भाजपा काम शुरू भी कर चुकी है। 2024 में हरियाणा जीतने और नायब सिंह सैनी को वहां का मुख्यमंत्री बनाने के बाद भाजपा ने प्रोजेक्ट पंजाब पर काम शुरू कर दिया था। नायब सिंह सैनी के लगातार पंजाब में दौरे हो रहे हैं। 1931 का जो सेंसस है उसके मुताबिक, तब तक पंजाब, हरियाणा और हिमाचल सब एक ही राज्य था, उस समय जो सैनी समाज है, उसमें 52% लोग सिख और 48% हिंदू थे। तो नायब सिंह सैनी के होने का फायदा यह है कि इन दोनों समाजों में उनके लिए सहज तौर पर संपर्क करना आसान है। इसीलिए भाजपा उनका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। भाजपा पंजाब में जो सोशल इंजीनियरिंग कर रही है, उसमें नायब सिंह सैनी की केंद्रीय भूमिका है। वह भाजपा के प्रोजेक्ट पंजाब का मुख्य हिस्सा हैं।

भाजपा ने इस बात को समझ लिया है कि पंजाब की पारंपरिक राजनीति के जरिए यानी जट सिख को आगे करके वह सत्ता में आने की सोच नहीं सकती है। लेकिन जट सिख को बिल्कुल काटकर भी वह आगे नहीं बढ़ सकती है। तो उसको दिखावे के लिए एक जट सिख फेस को आगे रखना पड़ेगा, लेकिन उसको अगर वोट मिलना है तो वह गैर जट सिख समुदाय से ही मिलना है। जिस तरह से शिरोमणि अकाली दल खत्म हुआ है, उसके बाद पंजाब की राजनीति में एक वैक्यूम पैदा हो गया है। आम आदमी पार्टी की राज्य में जिस तरह से सरकार चल रही है, वह उस वैक्यूम के दायरे को और बढ़ा रही है। कांग्रेस भी राज्य में मजबूत हो नहीं रही है। ऐसे में किसी और चुनाव की तुलना में 2027 के चुनाव में बीजेपी के लिए संभावना ज्यादा है। लेकिन यह सब कुछ निर्भर करेगा कि भाजपा शहरी हिंदू, खासतौर से व्यापारी समाज को कितना जोड़ पाती है। इसके अलावा दलित समाज, उसमें भी रामदसिया और रविदसिया को भाजपा को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई कदम उठाए हैं। बनारस में रविदास का मंदिर है। उनके जन्मदिन और बैसाखी के समय बनारस से पंजाब के लिए विशेष ट्रेन चलाई जा रही है। पिछले 12 साल में प्रधानमंत्री ने पंजाब के लिए जितना कुछ किया है, आज तक किसी अन्य प्रधानमंत्री ने नहीं किया।
2024 का लोकसभा चुनाव बीजेपी पंजाब में अकेले लड़ी थी। उसको करीब 18% वोट मिले। 23 विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने लीड किया। लेकिन इन आंकड़ों के आधार पर आप यह नहीं कह सकते कि वह सत्ता में आने जा रही है या बहुत बड़ा प्लेयर होने जा रही है। अगर भाजपा पंजाब की राजनीति में बड़ा प्लेयर बनेगी तो 70 फीसदी गैर जट सिख समाज के समर्थन से ही बनेगी और उसके लिए प्रोजेक्ट पर काम जारी है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह दलित समाज ने खुलकर भाजपा का साथ दिया है,उसका संदेश पंजाब तक भी जरूर पहुंचेगा। पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में से 75 प्रतिशत भाजपा जीती है जबकि ट्राइबल सीटों पर तो उसका 100% स्ट्राइक रेट रहा। ओबीसी, दलित और जनजातीय समाज में भाजपा की पैठ पिछले 12 सालों में बहुत ज्यादा बढ़ी है। अब सवाल यह है कि क्या पंजाब में यह एक्सपेरिमेंट सफल होगा? अभी कहना बहुत मुश्किल है। बहुत जल्दी भी है। पंजाब की राजनीति में बदलाव तभी हो सकता है जब 70% गैर जट सिख समाज तय कर ले कि हमने जट सिख राजनीति का प्रभुत्व बहुत देख लिया, अब इसको बदलने की जरूरत है। अभी तक पंजाब में जो राजनीतिक परिस्थिति नजर आ रही है, उसमें हंग असेंबली आने की संभावना बहुत ज्यादा है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनने की लड़ाई होगी। शिरोमणि अकाली दल तो हाशिये पर खिसक चुका है। उसके पास कोई लीडर भी बचा नहीं है। सुखबीर बादल को अब कभी पंजाब के लोग स्वीकार नहीं करने वाले हैं। 2027 के चुनाव में पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी ये तीनों मुख्य प्लेयर होंगे। भाजपा का ध्यान पंजाब पर इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि उसकी सीमा पाकिस्तान से लगती है। देश की सुरक्षा की दृष्टि से वहां राष्ट्रवादी सरकार जरूरी है।
पंजाब में भाजपा की समस्या स्वीकार्यता है। वहां भाजपा की स्वीकार्यता उस तरह नहीं बनी है,जैसी अन्य राज्यों में है। उसका बड़ा कारण यह भी है कि दशकों से वह शिरोमणि अकाली दल के जूनियर पार्टनर के रूप में रही। विधानसभा चुनाव में उसे 23 सीटें और लोकसभा चुनाव में चार सीटें लड़ने के लिए मिलती थीं। ऐसे में उसका दायरा सिमट गया था। मैं यह नहीं कहने जा रहा हूं कि पंजाब की जट सिख के प्रभुत्व वाली राजनीति बदलने जा रही है,लेकिन वह बदल सकती है। पहली बार मुझे लग रहा है कि भाजपा समझदारी का काम कर रही है कि वह जट सिख वोट के चक्कर में नहीं फंस रही है। जट सिख समाज भाजपा और आरएसएस को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उसके कुछ ऐतिहासिक कारण हैं। अकाली दल से गठबंधन के कारण शहरों में हिंदू वोट भाजपा से छिटककर कांग्रेस के साथ चला जाता है। क्या इस बार हिंदू वोट लौट कर भाजपा के साथ आएगा,यह बड़ा सवाल होगा। इसके साथ ही भाजपा दलित,ओबीसी,शहरी हिंदू और गैर जट सिख का जो सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है,क्या वह सफल होगा। पंजाब में भी भाजपा को 70% आबादी में से ही अपने लिए सत्ता में आने लायक सीटें जीतने की कोशिश करनी है। यह काम मुझे लगता है कि पश्चिम बंगाल से भी ज्यादा कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है। राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार तेजी से अलोकप्रिय हो रही है। अरविंद केजरीवाल का पंजाब में रहना आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ा नेगेटिव प्वाइंट है। पंजाब में कांग्रेस पार्टी भी ऊपर आती हुई दिख नहीं रही है। इसलिए भाजपा के लिए संभावना के द्वार खुलते हैं। अब सब कुछ उसके संगठन और नैरेटिव बनाने की क्षमता पर निर्भर करता है। बाकी राज्यों में उसने यह बखूबी करके दिखाया है। क्या पंजाब में वह यह नैरेटिव बनाने में कामयाब हो पाएगी कि वह सत्ता में आ सकती है? अगर यह नैरेटिव बनेगा तभी 70% गैर जट सिख समाज उसकी ओर उम्मीद की नजर से देख सकता है। अभी से कुछ कहना बहुत कठिन है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
पंजाब में भाजपा की समस्या स्वीकार्यता है। वहां भाजपा की स्वीकार्यता उस तरह नहीं बनी है,जैसी अन्य राज्यों में है। उसका बड़ा कारण यह भी है कि दशकों से वह शिरोमणि अकाली दल के जूनियर पार्टनर के रूप में रही। विधानसभा चुनाव में उसे 23 सीटें और लोकसभा चुनाव में चार सीटें लड़ने के लिए मिलती थीं। ऐसे में उसका दायरा सिमट गया था। मैं यह नहीं कहने जा रहा हूं कि पंजाब की जट सिख के प्रभुत्व वाली राजनीति बदलने जा रही है,लेकिन वह बदल सकती है। पहली बार मुझे लग रहा है कि भाजपा समझदारी का काम कर रही है कि वह जट सिख वोट के चक्कर में नहीं फंस रही है। जट सिख समाज भाजपा और आरएसएस को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उसके कुछ ऐतिहासिक कारण हैं। अकाली दल से गठबंधन के कारण शहरों में हिंदू वोट भाजपा से छिटककर कांग्रेस के साथ चला जाता है। क्या इस बार हिंदू वोट लौट कर भाजपा के साथ आएगा,यह बड़ा सवाल होगा। इसके साथ ही भाजपा दलित,ओबीसी,शहरी हिंदू और गैर जट सिख का जो सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है,क्या वह सफल होगा। पंजाब में भी भाजपा को 70% आबादी में से ही अपने लिए सत्ता में आने लायक सीटें जीतने की कोशिश करनी है। यह काम मुझे लगता है कि पश्चिम बंगाल से भी ज्यादा कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है। राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार तेजी से अलोकप्रिय हो रही है। अरविंद केजरीवाल का पंजाब में रहना आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ा नेगेटिव प्वाइंट है। पंजाब में कांग्रेस पार्टी भी ऊपर आती हुई दिख नहीं रही है। इसलिए भाजपा के लिए संभावना के द्वार खुलते हैं। अब सब कुछ उसके संगठन और नैरेटिव बनाने की क्षमता पर निर्भर करता है। बाकी राज्यों में उसने यह बखूबी करके दिखाया है। क्या पंजाब में वह यह नैरेटिव बनाने में कामयाब हो पाएगी कि वह सत्ता में आ सकती है? अगर यह नैरेटिव बनेगा तभी 70% गैर जट सिख समाज उसकी ओर उम्मीद की नजर से देख सकता है। अभी से कुछ कहना बहुत कठिन है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











