पश्चिम बंगाल के जनादेश से निकले सात संदेश
प्रदीप सिंह।पश्चिम बंगाल और असम का जनादेश सात संदेश देता है। खासतौर से पश्चिम बंगाल क्योंकि सबसे बड़ा और निर्णायक परिवर्तन यहीं हुआ है। वहां की जनता ने बीजेपी को दो तिहाई बहुमत दिया है। 2016 में जो सिर्फ तीन सीटों वाली पार्टी थी, वह 2021 में 77 और 2026 आते-आते 207 विधायकों वाली पार्टी बन गई। इससे आप अंदाजा लगाइए कि देश की राजनीति और समाज में कितनी तेजी से बदलाव आ रहा है। यह देखकर दिनकर जी की एक कविता की ये पंक्तियां याद आती हैं- दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जयप्रकाश नारायण अपनी हर सभा के पहले इसका पाठ कराते थे। लेकिन, मैं इसमें एक शब्द जोड़ना चाहता हूं- सिंहासन खाली करो कि हिंदू जनता आती है।
यह संदेश पश्चिम बंगाल और असम का भी है। पश्चिम बंगाल में हिंदू दूसरे दर्जे का नागरिक बन गया था। वहां हिंदुओं की स्थिति बांग्लादेश के हिंदुओं से बेहतर नहीं थी। फर्क सिर्फ यह था कि यहां राज भी हिंदुओं का था और अत्याचार भी हिंदुओं पर था। तो इस जनादेश का पहला संदेश यह है कि तृणमूल कांग्रेस का जो महाजंगल राज था, उसने हिंसा, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद, कट मनी और सिंडिकेट का जो तंत्र फैलाया हुआ था,उसे समाज के हर वर्ग ने नकार दिया है। यही कारण है कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में से 75% पर बीजेपी की जीत हुई है जबकि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी सीटों पर उसे सफलता मिली है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह ममता बनर्जी का नहीं, उनके गुंडा तंत्र का विरोध है। जबकि वास्तव में यह ममता बनर्जी का ही विरोध है। जो गुंडा तंत्र, सिंडिकेट व कट मनी का तंत्र था,उसकी सिरमौर तो ममता बनर्जी ही थीं। जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार हुआ, हत्या हुई, बलात्कार हुए तब आपने उसके विरोध में एक भी शब्द ममता बनर्जी के मुंह से सुना। सुनते भी कैसे क्योंकि उनके राज में भी तो यही हो रहा था और जो लोग इसके लिए जिम्मेदार थे, उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा था।
इस जनादेश का दूसरा संदेश है कि भय का स्थान अब भरोसे ने ले लिया है। सत्ता में आने से पहले भाजपा लोगों में यह विश्वास पैदा करने में सफल हो गई कि भय का राज जा रहा है और भरोसे का राज आ रहा है। उसको चुनने का मतलब है भय, अत्याचार, कुशासन और ममता बनर्जी के अधिनायकवाद से मुक्ति। तीसरा, यह ममता बनर्जी के गुंडा राज को उखाड़ कर फेंकने और जनतंत्र की पुनर्स्थापना का जनादेश है। पश्चिम बंगाल में करीब पांच दशक बाद जनतंत्र की पुनर्स्थापना हो रही है। लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने 34 साल डेमोक्रेसी को अपने पैरों तले रौंदा। उनका डेमोक्रेसी में सैद्धांतिक रूप से विश्वास ही नहीं था। वे तो मजबूरी में चुनाव में आए। उनका सिद्धांत तो था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। ममता बनर्जी ने सीपीएम के उस राज को न केवल अपनाया बल्कि उससे और आगे निकल गईं। 15 साल तक उन्होंने ऐसा ही किया। इस जनादेश का चौथा संदेश है भय,भ्रष्टाचार और आतंक के राज से आजादी। आप पश्चिम बंगाल की सड़कों और गलियों में देखिए। इस समय जिस तरह का जश्न मनाया जा रहा है लग रहा है जैसे आजादी का उत्सव मनाया जा रहा हो। वह बताता है कि लोगों को किस तरह से दबाकर रखा गया था। जब उनको महसूस हुआ कि आजादी मिली है तो वे मुखर हो गए हैं। पांचवा संदेश यह है कि समाज के सबसे निचले तबके और सबसे ऊंचे तबके दोनों ने एक स्वर से उद्घोष किया है कि हमारी चुप्पी एक सीमा तक ही रहती है और अत्याचार जब बर्दाश्त के बाहर हो जाता है तो वह चुप्पी इतना शोर मचाती है कि अत्याचारी के मन में भय बैठ जाता है। इस जनादेश का छठा संदेश है कि घुसपैठ अब बर्दाश्त नहीं। पश्चिम बंगाल में घुसपैठ कांग्रेस के समय में शुरू हुई, सीपीएम ने उसको आगे बढ़ाया और ममता बनर्जी उसको नए शिखर पर ले गईं। घुसपैठ का मतलब केवल डेमोग्राफिक चेंज नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है। जब राज्य सरकार बांग्लादेश से लगी हुई सीमा पर फेंसिंग के लिए जमीन देने से मना कर दे, हाईकोर्ट का आदेश हो कि 31 मार्च तक जमीन एक्वायर करके बीएसएफ को हैंडओवर कीजिए और राज्य सरकार अनदेखी कर दे। उसके बाद हाईकोर्ट को राज्य सरकार पर जुर्माना लगाना पड़े तो आप समझिए कि ममता बनर्जी की सरकार देश की सुरक्षा के प्रति कितनी सजग थी। तो इस मामले को अब जनता ने अपने हाथ में ले लिया कि जो राष्ट्र की सुरक्षा से समझौता करेंगे,जो डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश करेंगे, उनको अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे। उनके खिलाफ हम वोट के हथियार का इस्तेमाल करेंगे। जनता जब इसका इस्तेमाल करती है तो इसकी मारक क्षमता से अत्याचारी बच नहीं पाते। यही ममता बनर्जी के साथ हुआ है। वह अपनी सीट भवानीपुर तक नहीं जीत पाईं। 2021 में तो शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें नंदीग्राम से 1500 वोटों से ही हराया था। इस बार शुभेंदु ने उन्हें भवानीपुर में 15,000 से ज्यादा वोटों से हराया है।
मेरी नजर में इस जनादेश का सातवां और सबसे महत्वपूर्ण संदेश है हिंदू नवजागरण। यह मुस्लिम वोट के वीटो को काटता है। यह इस अवधारणा को पूरी तरह से ध्वस्त करता है कि जिसको मुसलमानों का वोट मिलेगा, वही सत्ता में आएगा। भाजपा 2014 से यह लगातार कर रही है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल और असम में थी। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में 27% मुसलमान हैं,जो अब तक 30% हो चुके होंगे। इसी तरह से असम में करीब 35% आबादी मुसलमानों की है। इस चुनौती को भाजपा ने शानदार तरीके से पार किया है। असम में भाजपा और उसके सहयोगी दल 102 सीटों पर जीते हैं जबकि पश्चिम बंगाल में उसे 207 सीटों पर जीत मिली है। इस जीत को स्वीकार करने के लिए जिहादियों का समर्थक लेफ्ट इको सिस्टम अभी तक तैयार नहीं है। वह बहाने तलाश रहा है। इसे एसआईआर की जीत बता रहा है। सवाल है कि एसआईआर तो केरल और तमिलनाडु में भी हुआ था। वहां की जीत एसआईआर की क्यों नहीं है? इन लोगों को सपने में भी यह मानने में उनको कष्ट होगा कि हिंदू जाग रहा है। वह अब राजनीतिक रूप से सोचने लगा है। हिंदू बंटने को तैयार नहीं है। आरोप लगाया जा रहा है कि बीजेपी ने ध्रुवीकरण कराया। लेकिन जब तक मुस्लिम तुष्टिकरण चल रहा था तब किसी के मुंह से आवाज नहीं निकली। तब वह सेकुलरिज्म था और हिंदू एक हो तो वह सांप्रदायिकता है। आप इस फर्क को समझिए। यह बात पिछले 70-80 साल से हिंदू सुनता चला आ रहा है। अब उसने तय किया कि बहुत हो गया। जो समझना है समझो। हम वह करेंगे जो सनातन के लिए अच्छा है। जो इस देश के लिए अच्छा है। यह हिंदू नवजागरण संदेश दे रहा है कि जो हमारा है, उसको हम हासिल करके रहेंगे। एक इंच नहीं छोड़ेंगे। जो लोग अभी तक सेकुलरिज्म के नाम पर हिंदुओं को ठग रहे थे,उनको समझ में नहीं आ रहा है कि हो क्या गया? यह सोया हुआ हिंदू जाग कैसे गया? सोते हुए हिंदुओं को इन लोगों के अत्याचार ने जगा दिया है। अब वह अपने अधिकारों,अपनी संस्कृति,अपनी सभ्यता और अपने धर्म के लिए लड़ने को तैयार है। यह जनादेश इस बात का भी संदेश है कि डरो हिंदू विरोधियों क्योंकि हिंदू जाग गया है। इसलिए आप देखिए देश से लेकर विदेश तक एक तरह का हाहाकार सा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो शायद अपने देश के सारे राज्यों के नाम नहीं जानते होंगे, वे पश्चिम बंगाल की जीत पर नरेंद्र मोदी को बधाई दे रहे हैं। विदेशों के जितने भारत विरोधी अखबार हैं,उनके अंदर की बेचैनी और खलबली देखिए। उनको अभी तक यह बात पच नहीं रही है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की दो तिहाई बहुमत से सरकार बन गई।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











