वर्ष 1995 की बात है। तब मोबाइल फोन का युग नहीं था। मैं उन दिनों हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर था। माता-पिता से मिलने लखनऊ आया हुआ था। वापस लौटने के लिए मेरे पास अम्बाला तक का ट्रेन रिजर्वेशन था और अम्बाला से बस पकड़ कर मुझे शिमला पहुँचना था।
वापसी में एक साहब मुझे लखनऊ में स्टेशन तक छोड़ गए और मैं अम्बाला जानेवाली ट्रेन में बैठ गया। ट्रेन चल पड़ी, तब मुझे याद आया कि मैं लखनऊ में घर से पैसे लेना तो भूल ही गया था। अब मेरी जेब में एक भी पैसा नहीं था और अम्बाला पहुँच कर शिमला जाने के लिए बस का टिकट खरीदना था। अगले दिन मेरी ट्रेन अम्बाला पहुँची। मेरे पास चाय पीने के लिए भी पैसे नहीं थे। लखनऊ से चलते समय मेरी माताजी ने रास्ते के लिए थोड़ा खाना बाँध दिया था, तो उससे मेरा रास्ता कट गया। इस कारण भूखे नहीं रहना पड़ा।
अम्बाला पहुँच कर स्टेशन से सड़क तक अपना सामान जैसे-तैसे ढोकर लाया। मेरे पास सामान कुछ ज्यादा ही वजनदार था। अम्बाला स्टेशन से सड़क की दूरी कोई आधा किलोमीटर रही होगी। सड़क पर पहुँचा, तो वहाँ से पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की बसें गुजर रही थीं। शिमला जाने के लिए मैंने हिमाचल पथ परिवहन निगम की बस पर बैठने का निश्चय किया। यह सोचा कि उसमें शायद कोई मेरे पहचान का मिल जाए, क्योंकि मैं वहीं रहता हूँ।
मैंने हिमाचल जाने वाली एक बस को हाथ दे कर रोका। वह बस दिल्ली से शिमला जा रही थी। मैं सामान लेकर उस बस में चढ़ने लगा, तो बस कण्डक्टर ने सामान चढ़वाने में मेरी मदद की। फिर बस चलने लगी। थोड़े ही समय में कण्डक्टर ने टिकट बनवानेक्षके लिए कहा। पहले तो मैंने उसे अनसुना कर दिया, परंतु जब उसने तेज आवाज में टिकट बनवाने के लिए मुझसे कहा तो मैंने बड़े सहमे एवं विनम्रता भरे स्वर में उससे कहा – ‘कण्डक्टर साहब! मेरे पास पैसे नहीं हैं, मेरा मतलब कि मैं लखनऊ से आ रहा हूँ, परंतु दुर्भाग्यवश मैं चलते समय पैसा लेना ही भूल गया। मैं शिमला यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाता हूँ।’ कण्डक्टर ने मेरी बात सुनी और मेरे कहने के लहजे से उसने मेरी बात पर विश्वास कर लिया और कहने लगा – ‘साहब! मुझे तो आपकी बात पर भरोसा है, लेकिन यदि रास्ते में टिकट चेकिंग हो गई, तब तो मेरी नौकरी जाने की नौबत आ जाएगी और आपको भी फौरन उसी जगह पहाड़ी सड़क पर बस से उतार दिया जाएगा।’
हमारी ये बातें पीछे वाली सीट पर बैठे एक व्यक्ति सुन रहे थे। अचानक वे सज्जन कण्डक्टर से बोले – ‘ओ भाई! कोई बात नहीं, मैं दे देता हूँ इनका किराया।’ यह सुनकर मुझे बड़ा सुकून मिला और मैं उन सज्जन के प्रति आभार व्यक्त करने लगा। फिर मैंने उनसे उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया। वह इस उपकार के बदले में कुछ नहीं चाहते थे।
बाद में जब बस शिमला के पुराने बस स्टैंड (जो कि गुरुद्वारे के पास था) पहुँच गई, तो मेरे सामने एक विकट समस्या यह थी कि पहाड़ पर चढ़ना था और सामान का वजन भी ज्यादा था। अब कुली के बगैर जाना नामुमकिन सा था। कुली को वहाँ खान कहते हैं, वे लोग पैदल चल कर घर तक सामान पहुँचा देते हैं। अब समस्या यह थी कि मैं कुली तो कर लूँ, लेकिन वहाँ भी घर पर रुपये नहीं पड़े थे। बहरहाल मैंने सोचा पहले कुली कर लिया जाए, फिर देखा जाएगा। मेरे मन में एक विश्वास भी था कि जब यहाँ तक प्रभुने पहुँचा दिया है तो वे आगे भी अवश्य ही कोई व्यवस्था कर देंगे।
मैं शिमला में सांगटी में रहता था। कुली ने बस स्टैंड से सांगटी तक मेरा सामान ढोने के 100 रुपए मांगे। उस बस स्टैंड से सांगटी की दूरी कोई लगभग चार-पांच किलोमीटर होगी। तो मैंने खुद की बात मान ली। और उसे 100 रुपए भाड़ा देना तय कर लिया। कुली करके मैं आगे बढ़ा ही था कि कुछ ही दूरी पर मुझे एक परिचित मिल गये और मैंने उनसे 100 रुपये उधार माँग लिए और कहा कि कल आपको वापस कर दूँगा। उन्होंने ‘कोई बात नहीं’ कहते हुए सौ रुपये मुझे दिये और घर पहुँच कर मेरी यात्रा सुखद सम्पन्न हो गई। यद्यपि इस घटना को आज तीस वर्ष से अधिक हो गए हैं, परंतु बस में बैठे अनजान सहयात्री के सद्भावनापूर्ण सहयोग को जब याद करता हूँ, तो हृदय गद्गद हो उठता है।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)









