सीजेपी के आंदोलन से भारत विरोधी तत्वों की पहचान, हिंसा करने वाले बख्शे नहीं जाएंगे।
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन समाप्त होने के बाद बहुत से तथ्य उभर कर सामने आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि इस आंदोलन में शामिल 2873 ऐसे लोगों की पहचान हुई है, जो आपराधिक बैकग्राउंड के हैं। इन पर हत्या के प्रयास, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार, डकैती और अपहरण जैसे आरोप हैं। कुछ पर पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई हो चुकी है। दिल्ली पुलिस ने फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम से इनकी पहचान की है।
20 जुलाई को आंदोलनकारियों ने संसद मार्च की कॉल दी जबकि उन्हें सिर्फ जंतरमंतर पर धरने की इजाजत थी। संसद मार्च की परमिशन नहीं थी। पहला कानून उन्होंने ये तोड़ा। ऐसे में जो आयोजक थे क्या उनको जवाबदेह नहीं होना चाहिए? अब तो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट भी कहते हैं कि आंदोलन के दौरान अगर हिंसा और तोड़फोड़ होती है तो आंदोलन की कॉल देने वाले को जवाबदेह ठहराया जाएगा। राज्यों में भी ऐसे कानून बन गए हैं कि सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से उसकी कीमत वसूली जाएगी। ये आंदोलन खत्म होने के बाद अब सारा फोकस सुप्रीम कोर्ट में शिफ्ट हो गया है। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि आपके पास जितने रिकॉर्ड हैं, उन सबको सुरक्षित रखिए। जिन विद्यार्थियों का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है उनको रिहा कर दीजिए। 3 अगस्त को इसकी फिर सुनवाई होगी। अदालत ने संकेत दिया कि किसी रिटायर्ड चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में इस पूरे मामले की जांच हो सकती है। इसे मैं सुप्रीम कोर्ट की भी बड़ी अग्नि परीक्षा मानता हूं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा,वह तय करेगा कि भविष्य में आंदोलन किस तरह के होंगे। क्या उसमें हिंसा की छूट होगी? कौन सा ऐसा समय आए जब पुलिस को बल प्रयोग करना चाहिए और कब नहीं करना चाहिए? क्या संसद में घुसने की कोशिश करने पर बल प्रयोग नहीं होना चाहिए? पुलिस बैरिकेड तोड़ने पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। इन सारे सवालों का जवाब सुप्रीम कोर्ट या उस जांच कमेटी को देना होगा जो पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता में बनाई जाएगी।
आप देखिए कि किस तरह से इस पूरे आंदोलन की फंडिंग हो रही थी। एक आदमी अमेरिका से आया, जो कुछ समय पहले तक आम आदमी पार्टी के लिए काम कर चुका था और दिल्ली सरकार के पेरोल पर था। वह एक ऑनलाइन पार्टी बनाता है और दिल्ली आकर धरने पर बैठ जाता है। इसका और सोनम वांगचुक का संबंध कैसे बना,इसके बारे में अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि अब इन दोनों के रास्ते अलग हो चुके हैं। अब दिल्ली और दूसरे राज्यों में जिन लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए हैं,उन्हें बचाने के लिए वकीलों की एक टीम सामने आ रही है, जिसकी अगुवाई कपिल सिब्बल कर रहे हैं। याद रखिए कपिल सिब्बल हर उस मुकदमे की पैरवी करने के लिए आगे आते हैं जो सनातन और देश के विरोध में हो। वह अर्बन नक्सलियों का साथ देते हैं। आतंकवादियों को फांसी पर चढ़ने से रोकने के लिए भी वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं। इस आदोलन के दौरान जिस तरह से खाना पहुंचाया गया,वह भी बड़ी चर्चा का विषय रहा। हर आंदोलन में खाने पीने का प्रबंध आयोजक करते हैं, लेकिन इस आंदोलन में उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी। मुस्लिम देशों से फूड ऑर्डर आ रहे थे। विदेशों से ही उनका पेमेंट हो रहा था। भारत में नीट का पेपर लीक हो गया,इससे मुस्लिम देशों का क्या संबंध है? अभिजीत दीपके और उनके साथियों में कोई छात्र नहीं है, कोई नीट परीक्षा का परीक्षार्थी नहीं था, नीट के एग्जामिनेशन सिस्टम से उनका कोई लेना देना नहीं था। उनको देश में अराजकता पैदा करने के लिए एक मुद्दा चाहिए था। एक सज्जन हैं जुनैद भाई। वह उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में छोटी सी मोबाइल रिपेयर की दुकान चलाते हैं। आंदोलनस्थल पर वह रोज एक लाख रुपये का खाना मुफ्त बांटते थे। सवाल है कि उन्हें पैसा कौन दे रहा था?
इस आंदोलन के दौरान मेन स्ट्रीम मीडिया पर हमले हुए। ऐसा पहली बार हुआ। जबकि आंदोलनकारी तो उनकी कवरेज के लिए मीडिया का स्वागत करते हैं। सबसे बुरा व्यवहार तो महिला रिपोर्टर्स के साथ हुआ। इस आंदोलन में शामिल कई लड़कियों ने जिस तरह की गालीबाजी की,वह सबसे ज्यादा चिंताजनक रहा। उन्होंने देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री को ऐसी गालियां दीं कि पुरुष भी शर्माएंगे। इस आंदोलन का छात्रों की समस्या या नीट पेपर लीक से कुछ लेना देना नहीं था,इस बात को अच्छी तरह से समझना चाहिए। इसमें देश के जेन जी का कोई पार्टिसिपेशन नहीं था। चेन्नई से तमिल में एक पत्रिका निकलती है तुगलक। एस गुरुमूर्ति उसके संपादक हैं। उन्होंने आंकड़े प्रस्तुत किए हैं कि पिछले 10-12 सालों में किन-किन तीर्थ स्थानों पर जेन जी कितनी संख्या में पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन तीर्थ यात्राओं में 50 फीसदी जेन जी के लोग शामिल होते हैं। आप अयोध्या में राम मंदिर की बात कर लीजिए, काशी विश्वनाथ मंदिर की बात कर लीजिए, दूसरे धार्मिक स्थानों की बात कर लीजिए, वहां जेन जी के लोगों का जाना लगातार बढ़ रहा है। इसका क्या संकेत है? इसका मतलब है कि ये जो लोग जा रहे हैं वे अपनी संस्कृति से जुड़े हुए हैं। ये जो जंतरमंतर पर आपने देखा, ये अपनी संस्कृति से कटे हुए लोग थे। इन्होंने दुनिया के सामने भारत के युवाओं की छवि को धक्का पहुंचाया है। ये भारत के युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते। लेकिन मीडिया के एक सेक्शन द्वारा इनको छात्र नेता के रूप में दिखाया जा रहा है। इनकी वाहवाही हो रही है। इससे पता चलता है कि इन मीडिया संस्थानों में जो लोग हैं उनको भारतीय संस्कृति और भारत के नैतिक मूल्यों से कोई लेना देना नहीं है। वरना ऐसे लोगों का महिमा मंडन क्यों होता?
भारत का जो युवा वर्ग है वह स्टार्टअप शुरू कर रहा है। वह स्पेस रिसर्च में जा रहा है। वह नए-नए इनोवेशन कर रहा है। उसको इन सब चीजों के लिए फुर्सत नहीं है। जो बेकार या अनइंप्लॉयबल लोग हैं वे ही ऐसे आंदोलनों में जाते हैं। उनका लालच होता है कि उनको खाने को मिलेगा। ऐसे भी किस्से हैं कि हवाई टिकट भेजकर और होटल में रुकने का प्रबंध करके लोगों को इस आंदोलन में बुलाया गया। इसमें मुस्लिम समाज के लोग शामिल हुए। इसमें ईसाई समाज के लोग शामिल हुए जिनका नीट या शिक्षा व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं था। इसीलिए मैं फिर कह रहा हूं कि शत्रु बोध का अभाव इस समय देश का सबसे बड़ा संकट है। याद कीजिए हमारे पूर्व सीडीएस जनरल रावत ने क्या कहा था- आने वाले समय में हमको ढाई फ्रंट की लड़ाई लड़नी होगी। एक पाकिस्तान,एक चीन और आधा अपने देश में जो लोग हैं। अर्बन नक्सल्स ने अब अपना कलेवर बदल लिया है लेकिन तेवर नहीं बदला है। अगर मंच पर इस देश की बर्बादी और हिंदू धर्म के देवी देवताओं के खिलाफ नारे लगते हैं तो इसका मतलब ये इस देश का हित चाहने वाले लोग नहीं हैं। ये सब धीरे-धीरे फिर इकट्ठा हो रहे हैं। सारे देश विरोधी तत्व बिलों से निकल कर बाहर आ गए हैं। सरकार के लिए इनकी पहचान का संकट नहीं रह गया है। 36 दिन के इस आंदोलन के दौरान सरकार के पास जितना डाटा इकट्ठा हुआ है, वह बहुत समय तक इनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए काफी है। यह इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस हैं। सुप्रीम कोर्ट भी यह नहीं कह पाया कि जिनका आपराधिक बैकग्राउंड है, उनको भी आप रिहा कर दीजिए या उनके खिलाफ एफआईआर वापस ले लीजिए। धरना स्थल पर कौन-कौन लोग आए और किस तरह के लोग आए, उससे आप समझ जाइए कि इनका मकसद क्या है? इनका एकमात्र उद्देश्य भारत में अराजकता पैदा करना है। इनको एक एजेंडा दिया गया था और इनको लग रहा है कि उसमें सफल हो गए। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को ये लोग ट्रॉफी की तरह लेकर घूम रहे हैं। उनको मालूम नहीं है कि इस इस्तीफे के बाद उन्होंने अपने गले में फंदा डाल लिया है। अब ये लोग हल्ला मचा रहे हैं कि सरकार सबको रिहा करे। सरकार एफआईआर वापस ले ही नहीं सकती है। वह अदालत ही लेगी। तो जो लोग भी हिंसक गतिविधियों में शामिल थे उनके खिलाफ तो मुकदमा चलेगा ही और उनको सजा भी मिलेगी। अभिजीत दीपके अभी छिप छिपा कर जो खेल खेल रहे हैं, बहुत जल्दी आप देखेंगे कि उसकी सच्चाई भी सामने आ जाएगी। उसके पीछे वह तमाम शक्तियां हैं जो भारत को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहतीं। इन शक्तियों का लक्ष्य इस सरकार को गिराना और प्रधानमंत्री को हटाना है, लेकिन इनको अंदाजा नहीं है कि इन्होंने किससे पंगा ले लिया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









