मोदी ने एक छोटे त्याग से भारत का बहुत बड़ा नुकसान बचा लिया ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों की सारी मांगें मान लीं और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। इस सारे मामले को देखिए तो लगता है कि नरेंद्र मोदी आंदोलनकारियों के सामने झुक गए। लेकिन जरा इसको बारीकी से देखने की कोशिश कीजिए। सबसे पहले बात कंपनसेशन देने की। तथाकथित छात्रों की मांग क्या थी? जिन बच्चों ने आत्महत्या की उनके परिवारों को एक करोड़ का मुआवजा दिया जाए। सरकार ने आश्वासन क्या दिया कि नियमों के अनुसार जो अधिकतम दिया जा सकता है, वह दिया जाएगा। क्या इसको झुकना कहेंगे? दूसरी मांग एफआईआर विड्रॉ करने की थी। सरकार ने कहा कि जो बच्चे शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे,उनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं होगी और हुई है तो वापस हो जाएगी,लेकिन जिन लोगों ने हिंसा की उनके खिलाफ एफआईआर वापस नहीं होगी। अब ऐसे लोगों के खिलाफ बड़ी तेजी से कार्रवाई चल रही है। परीक्षा से संबंधित एजुकेशनल रिफॉर्म्स पर सरकार पहले ही घोषणा कर चुकी थी। कई कदम उठाए जा चुके थे। अब सरकार नया बिल लेकर आ रही है। प्रधानमंत्री ने नंदन नीलकेणि की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बना दी है, जो इन रिफॉर्म्स का प्रस्ताव तय करेगी।
अब बात आती है धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की। मैं यहीं पर कहूंगा कि प्रधानमंत्री झुक गए, लेकिन ध्यान रखिए झुकना और टूटना दो अलग-अलग चीजें होती हैं। पिछले 25 साल में कभी ऐसा नहीं हुआ कि नरेंद्र मोदी किसी चुनौती के सामने टूट गए हों। वह स्ट्रांग लीडर हैं, यह बात उनके विरोधी भी मानते हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी रिजीड स्ट्रांग लीडर नहीं हैं। वह लचीले हैं। लचीला आदमी झुक सकता है और जो झुक सकता है, वही तन सकता है। वह लगातार 25 साल से सत्ता में हैं। 13 साल तक मुख्यमंत्री रहे और 12 साल से ज्यादा प्रधानमंत्री रहते हो गए। अभी आगे भी रहने वाले हैं, इसमें कोई शक नहीं है। जिन लोगों को यह गलतफहमी है कि जंतरमंतर से मोदी को हटाया जा सकता है या उनकी सरकार गिराई जा सकती है, वे सपनों की दुनिया में जी रहे हैं। तो सवाल है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा प्रधानमंत्री ने क्यों लिया? देखिए सरकार या किसी संगठन के मुखिया पर दबाव पड़ता है तो वह जो फैसला लेता है इस बात को तोलमोल कर लेता है कि इसका उसको फायदा क्या होगा और नुकसान क्या होगा। मान लीजिए प्रधानमंत्री अड़ जाते और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं लेते तो फिर क्या होता? यह आंदोलन आने वाले दिनों में उन राज्यों में फैलता जहां 2027 की शुरुआत में चुनाव होने हैं और उसके बाद अन्य राज्यों में भी पहुंचता। देश में उसी तरह का माहौल बन जाता जैसे नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में हुआ। हालांकि वहां की तरह भारत में सरकार नहीं गिरती। सरकार की स्थिरता पर कोई खतरा भी नहीं आता, लेकिन उसका असर यह होता कि दुनिया भर में संदेश चला जाता कि भारत में अराजकता है। भारत में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी हुई है। दुनिया का कौन सा ऐसा इन्वेस्टर है, जो ऐसे माहौल में आकर पैसा लगाना चाहेगा? तो इसलिए मैं कह रहा हूं इस तथाकथित आंदोलन के लक्ष्यों की ओर ध्यान दीजिए। यह भारत में राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता पैदा करने एवं देश की प्रगति रोकने के लिए था।
सरकार ने अभी जो कदम उठाए है जैसे एफसीआरए  में संशोधन का फैसला किया है उससे बहुत बौखलाहट है। जितने विदेशी फंडेड एनजीओ हैं और उनके फंड पर जो वकील और दूसरे लोग काम करते थे, उन सबके अंदर घबराहट है कि उनका धंधा बंद होने वाला है। मामला केवल यहीं तक नहीं है। अलग-अलग राज्यों में यूनिफार्म सिविल कोड के लिए कानून बन रहा है और धीरे-धीरे यह केंद्रीय स्तर पर भी बनेगा। यह बात इन लोगों को समझ में आ गई है। इनको यह भी समझ में आ गया है कि एनआरसी आने वाला है। नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस जरूर बनेगा और नागरिकता का सवाल उसी से हल होगा। एनआरसी के बाद जो कार्ड मिलेगा वही नागरिकता का प्रमाण होगा। जंतरमंतर पर आपको बहुत सारे मुस्लिम संगठन दिखाई दिए,वक्फ कानून में संशोधन हो जाने से उनमें बहुत बौखलाहट है। एफसीआरए में संशोधन से धर्मांतरण के प्रयासों पर काफी हद तक लगाम लगेगी। देश की डेमोग्राफी बदलने के जितने प्रयास हो रहे थे,उन सब पर अंकुश लगाया जा रहा है। तो जंतरमंतर पर जो हुआ,वह इसी सब बौखलाहट का नतीजा था। प्रधानमंत्री को यह सब समझ में आ गया था। प्रधानमंत्री के सामने इसी तरह की चुनौती तथाकथित किसान आंदोलन के समय भी आई थी। वह आंदोलन पूरे दो साल चला था। उसके पीछे भी कई देसी विदेशी ताकतें थीं। उस  दौरान भी ये ताकतें चाहती थीं कि एक गोली चल जाए।

इसी तरह सीएए को लेकर शाहीन बाग का धरना हुआ और उसका नतीजा क्या हुआ? आखिर में हिंदुओं के खिलाफ दंगा हुआ। हिंदुओं को मारा गया। तो पिछले काफी समय से इस सरकार को अस्थिर करने और मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने की लगातार कोशिश हो रही है। अब आप अंतर देखिए। सरकार बिल्कुल दृढ़ प्रतिज्ञ थी कि सीएए को लागू करना ही है। शाहीन बाग और देश के कई हिस्सों में महीनों तक प्रदर्शन हुए, लेकिन सरकार झुकी नहीं। क्योंकि वह उसका लक्ष्य था। लेकिन तथाकथित किसान आंदोलन पर सरकार झुक गई और तीनों कृषि कानून वापस ले लिए। तब भाजपा समर्थकों ने भी मोदी की आलोचना की कि वह झुक गए। लेकिन प्रधानमंत्री के सामने बड़ा लक्ष्य था कि क्या देश में अराजकता पैदा होने देते? क्या देश में खासतौर से पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद को जड़ जमाने देते? उनको सौदा करना था कि देश की सुरक्षा की चिंता करें या तीन कृषि कानूनों की। तो उन्होंने तीन कृषि कानूनों को बलिदान कर दिया। मेरी नजर में यह एक छोटा समझौता था जिसको मिलिट्री की भाषा में स्ट्रेटेजिक रिट्रीट भी कहते हैं। यानी ज्यादा तेजी से अटैक करने के लिए आप दो कदम पीछे हटते हैं। तीन कृषि कानूनों को वापस लेकर उन्होंने देश में अराजकता पैदा करने के सारे प्रयास ध्वस्त कर दिए। अब आप सोच कर देखिए कि यह सौदा महंगा था या सस्ता था।
इसी तरह इस तथाकथित छात्र आंदोलन का टेंपो सरकार ने बढ़ने दिया। आखिर में सब इस मांग पर आ गए कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कम कुछ स्वीकार नहीं। विपक्ष और सीजेपी सबने कहा कि यह तो नॉन नेगोशिएबल है। इसके बाद सरकार ने एक झटके में इस्तीफा करा दिया। नतीजा क्या हुआ? इस्तीफे के आश्वासन पर सोनम वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ दिया और इस्तीफे की घोषणा से अभिजीत दिपके और उसके साथियों ने अपना आंदोलन खत्म कर दिया। कांग्रेस पार्टी और उसके साथी दलों के हाथ कुछ नहीं लगा। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष को समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें। तो अब गोल पोस्ट शिफ्ट कर रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर प्रधानमंत्री ने देश के विकास में बाधा बनने वाली बहुत बड़ी समस्याओं को हल कर दिया। इस एक फैसले से आंदोलन दूसरे राज्यों में फैलने से रुक गया और जो ताकतें भारत में निवेश के वातावरण के खिलाफ माहौल बना रही थीं, उन्हें भी झटका लगा। अब तौल कर देखिए कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर प्रधानमंत्री ने सही किया या गलत किया। ऐसा कभी नहीं होता कि आप हर युद्ध जीतें। बड़ा युद्ध जीतने के लिए कुछ लड़ाइयां हारनी पड़ती हैं और वही मोदी करते हैं। एक चीज जो नहीं करते कि उनका जो लक्ष्य है, उससे समझौता नहीं करते। वह फैसला इस आधार पर करते हैं कि इससे देश, समाज,उनकी पार्टी,उनकी सरकार का फायदा होगा या नुकसान होगा। जहां दिखता है कि नुकसान हो सकता है,वहां नहीं झुकते। सीएए का मामला आपके सामने है। और यह जो सीजेपी का आंदोलन था इससे उनको लगा कि अगर इस्तीफा नहीं लिया तो देश का बड़ा नुकसान हो सकता है। तो एक छोटे सैक्रिफाइस से उन्होंने बहुत बड़ा नुकसान बचा लिया। इस एक फैसले के बाद जो देश में आग लगाने की कोशिश कर रहे थे,वे रो रहे हैं। जो लड़कियां जंतरमंतर पर खड़े होकर गालियां दे रही थीं,वे रोते हुए वीडियो बना रही हैं कि हमारी पोस्ट डिलीट कर दो। हमको घर में डांट पड़ रही है। इस पूरे मुद्दे पर बीजेपी, मोदी, कांग्रेस, केजरीवाल, दिपके की दृष्टि से मत सोचिए। सिर्फ एक लक्ष्य, एक चीज सोचिए कि क्या भारत के हित में है और क्या भारत के हित में नहीं है। आपका फैसला इसी पर आधारित होना चाहिए। इस बारे में सारे पक्षों पर सोचकर आप जो फैसला लेंगे,मैं मानता हूं वह सही होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)