कांग्रेस को कभी फायदा नहीं पहुंचाएगा भाजपा का नाराज समर्थक ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
अगर किसी एक पार्टी का नुकसान हो रहा है तो दूसरी पार्टी का फायदा हो जाएगा, राजनीति में अक्सर ऐसा नहीं होता। कभी-कभी किसी तीसरी पार्टी को लाभ हो जाता है या कभी ऐसा होता है कि जो नुकसान दिख रहा है वह आखिरी समय में आकर नुकसान रह नहीं जाता।
मैं बात करने जा रहा हूं 2029 के लोकसभा चुनाव की। वर्तमान परिस्थिति में साफ लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी को नुकसान हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को धक्का पहुंचा है और यह धक्का इसलिए नहीं पहुंचा कि उनके विरोधी मजबूत हो गए हैं। यह कमजोरी भाजपा के अपने मतदाता वर्ग की नाराजगी और अविश्वास से आई है। अब ये अविश्वास 2029 तक बना रहेगा या इसमें कोई परिवर्तन आएगा,इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता,लेकिन जो गठबंधन दिख रहे हैं उनके बारे में जरूर बात कर सकते हैं। 2029 तक एनडीए में कोई बड़ा बदलाव आएगा, ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है। 2019 में चंद्रबाबू नायडू चले जरूर चले गए थे, लेकिन 2024 में वह वापस आ गए। नीतीश कुमार आते-जाते रहते थे, लेकिन अब उनके कहीं और जाने की गुंजाइश बची नहीं है। तो भाजपा के साथ इस समय जो ज्यादातर दल हैं,वे साथ रहने वाले हैं एक-आध छोटे-मोटे दल, जो मौसम विज्ञानी होते हैं, की बात छोड़ दीजिए। तो ऐसे में राहुल गांधी आजकल बहुत सक्रिय हैं। इसी सक्रियता में हाल ही में उन्होंने छात्रों की गूंज कार्यक्रम शुरू किया था। हालांकि उनके हर कार्यक्रम क्षणजीवी होते हैं। आपको याद होगा कि उन्होंने एक यात्रा भी की थी,लेकिन उस यात्रा की बात आज कांग्रेस के लोग भी नहीं करते। इस समय छात्रों में कुछ असंतोष है। इसलिए उन्हें लगा कि छात्रों की गूंज कार्यक्रम के जरिए वह छात्रों की इस नाराजगी का फायदा उठा सकते हैं। उन्होंने देखा कि पिछले दिनों कॉकरोच जनता पार्टी सारा श्रेय लेकर चली गई, उनके हाथ कुछ नहीं लगा। अब वह फिर से छात्रों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वैसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। मद्रास आईआईटी की एक युवती ने झूठ की गूंज नाम से एक छोटा सा प्रयास शुरू किया और कांग्रेस व राहुल गांधी का सारा कैंपेन हवा में उड़ गया। इससे पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी कितनी पोली जमीन पर खड़े थे। इसलिए मैं कह रहा हूं कि राहुल और उनके सलाहकार जो सपना देख रहे हैं कि 2029 में वह देश के प्रधानमंत्री बनेंगे, वह पूरा होगा ऐसा लगता नहीं। वैसे राजनीति में सपना कोई भी देख सकता है। राहुल गांधी तो पिछले 24 साल से ये सपना देख रहे हैं। यूपीए के शासन में उनके पास पीएम बनने का मौका भी था, लेकिन उनको अंदर से विश्वास नहीं था कि वह इस बड़े पद के योग्य हैं।
राहुल गांधी तो 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए भी बड़ी मुश्किल से माने। 2017 में गुजरात विधानसभा का चुनाव था और कांग्रेस को लग रहा था कि वह जीत रही है। कांग्रेसियों ने सोचा कि राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लांच करने का बस यही मौका है। मोदी के गढ़ में जीत से उनकी शुरुआत होगी,लेकिन नतीजा आया तो कांग्रेस हार गई। राहुल गांधी को लगा कि सारा प्रयास बेकार गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें पीएम उम्मीदवार प्रोजेक्ट किया,लेकिन वहां भी निराशा हाथ लगी। कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिलीं कि राहुल नेता प्रतिपक्ष बन सकें। तो जिम्मेदारी से भागने का राहुल गांधी का बड़ा पक्का ट्रैक रिकॉर्ड है। अब वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन न तो परिस्थितियां उसके अनुकूल हैं, न उनकी पार्टी का संगठन है, न जनाधार है, न जनता का विश्वास है। तो उनका सारा भरोसा गठबंधन पर है। 2022 में इंडिया अलायंस बना,लेकिन उस गठबंधन का औपचारिक स्वरूप कभी नहीं बना। न तो उसका कोई दफ्तर था, न उसके कोई पदाधिकारी बने,न तो उसकी कोई नीतियां या कार्यक्रम घोषित हुए। किसी ने राहुल गांधी को नेता मान लिया हो, ऐसा भी नहीं हुआ। ममता बनर्जी ने इंडी अलायंस में होते हुए भी कांग्रेस का साथ नहीं दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में जब राहुल गांधी को लग रहा था कि बस इस बार तो प्रधानमंत्री बन ही जाएंगे तब ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को लोकसभा की 42 में से एक सीट ऑफर की थी। इससे आप अंदाजा लगा लीजिए। लेफ्ट पार्टियां जहां मजबूत थीं, वहां कांग्रेस के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ी। राहुल के गठबंधन के साथियों को ही उन पर विश्वास नहीं है। मुझे लगता है कि 2029 आते-आते उनका यह जो कुनबा है छोटा होता जाएगा। पश्चिम बंगाल का चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का ही कोई भविष्य दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि वह इस बुरी हालत में भी राहुल गांधी को नेता मान लेंगी, ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आती। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस का गठबंधन कब तक रहेगा, यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस का सबसे मजबूत अलायंस तमिलनाडु में डीएमके के साथ था, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव का नतीजा आते ही कांग्रेस ने उसे तोड़ दिया। डीएमके अब कांग्रेस को अपना दुश्मन नंबर एक मानती है। लेफ्ट पार्टियों का अपना ही कुछ नहीं बचा है तो राहुल गांधी को क्या देंगे? तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में कोई गठबंधन है नहीं। बिहार में तेजस्वी यादव की अपनी दुकान लगभग लुट चुकी है। वहां विधानसभा चुनाव में गठबंधन में कांग्रेस को केवल छह सीटें मिली थीं,इससे आप उसकी हैसियत का अंदाजा लगा लीजिए। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन बना हुआ है,लेकिन मेरा मानना है कि यह 2027 के विधानसभा चुनाव तक ही है। चूंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को इस गठबंधन से फायदा हुआ इसलिए यह अभी तक बना हुआ है वरना अखिलेश यादव का ट्रैक रिकार्ड तो हर चुनाव के बाद गठबंधन तोड़ देने का है। 2027 के बाद भी यह बना रहेगा इसमें भारी आशंका है। तो 2029 आते-आते कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ उतनी पार्टियां भी नहीं रह जाएंगी,जितनी 2024 में थीं। 2029 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस लगभग अकेले लड़ेगी।
एक कहावत है- नौ दिन चले अढ़ाई कोस। 2024 से 2029 की राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी की जो संभावित यात्रा है,वह एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली है। कु्नबे का विस्तार करने की बजाय उसमें बिखराव हो रहा है। राहुल एक मुद्दा उठाते हैं और बहुत जल्दी निराश हो जाते हैं। फिर दूसरा मुद्दा उठाते हैं,कुछ समय बाद उसे भी छोड़ देते हैं। तो यह छात्रों की गूंज का कार्यक्रम कितने दिन चलेगा, किसी को नहीं मालूम क्योंकि ‘छात्रों की गूंज’ से ज्यादा तेज ‘झूठ की गूंज’ सुनाई दे रही है। राहुल गांधी और कांग्रेस की सारी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि बीजेपी का जो कोर सपोर्टर है, वह उससे नाराज है। तो महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने एक उदाहरण दिया था, मैं उसी को दोहरा रहा हूं। उन्होंने कहा, भाई हीरोइन हीरो से कितना भी नाराज हो जाए, वह विलेन के साथ नहीं चली जाएगी। वही हाल कांग्रेस का होगा। बीजेपी से लोगों की नाराजगी है। अब यह पता नहीं है कि 2029 तक बीजेपी उनको मना लेगी या और नाराज कर लेगी। दोनों की संभावना है। इसलिए वहां तो अनिश्चितता है, लेकिन जो लोग नाराज हैं वे राहुल गांधी के साथ आ जाएंगे, इसकी संभावना बहुत कम है। राहुल गांधी के पास कोई रोडमैप ही नहीं है कि जो लोग बीजेपी से नाराज हैं, उनको कैसे अपने साथ जोड़ा जाए? ऐसे में लोग बीजेपी से नाराज हैं या नहीं, यह एक मुद्दा है। लेकिन वह नाराजगी कांग्रेस को फायदा पहुंचा देगी, यह दूसरा मुद्दा है और जिसकी संभावना बहुत कम नजर आ रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)