अमेरिका नेतन्याहू को गिरफ्तार करे ऐसा क्यों कह रहे।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी।
अमेरिका के सबसे प्रभावशाली महानगरों में शामिल न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी एक बार फिर वैश्विक राजनीतिक में आलोचना के केंद्र में हैं। इस बार वजह है इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट को लागू कराने की उनकी सार्वजनिक मांग।
ममदानी ने कहा है कि यद्यपि न्यूयॉर्क शहर के पास ऐसा करने का कानूनी अधिकार नहीं है, लेकिन अमेरिकी संघीय सरकार को आईसीसी के वारंट का सम्मान करते हुए कार्रवाई करनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि “बेंजामिन नेतन्याहू का न्यूयॉर्क शहर में स्वागत नहीं है।” अब न्‍यूयॉर्क का मेयर इस तरह की भाषा बोले, तब इसके मायने अहम हो जाते हैं। इससे ममदानी की उस वैचारिक राजनीति पर फिर बहस शुरू हो गई है, जिसके कारण वे पहले भी भारत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राम मंदिर और गाजा युद्ध जैसे मुद्दों पर विवादों में रह चुके हैं। आलोचक इसे “उम्माह आधारित पहचान की राजनीति” का विस्तार बताते हैं। जिसमें उन्‍हें हर इजरायली, हिन्‍दू एवं अन्‍य गैर मुसलमान से नफरत है!

बढ़ती यहूदी-विरोधी घटनाओं के बीच आया बयान

ममदानी का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका में यहूदी-विरोधी घटनाओं को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है। एंटी-डिफेमेशन लीग (ADL) के अनुसार वर्ष 2025 में अमेरिका में 6,274 यहूदी-विरोधी घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 2026 की ADL अगले साल सामने आएगी। ऐसे में यदि पूर्व रिपोर्ट के हिसाब से अध्‍ययन करें तो इजरायलियों पर हिंसक हमलों की संख्या पिछले कई दशकों में सबसे अधिक रही। न्यूयॉर्क इन घटनाओं का प्रमुख केंद्र रहा।
इसी कारण ममदानी के बयान को लेकर यहूदी संगठनों ने भी अब कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल के राजदूत डैनी डैनन ने कहा कि न्यूयॉर्क के मेयर का दायित्व शहरवासियों की सेवा करना है, न कि ऐसे राजनीतिक संदेश देना जो समाज में और अधिक ध्रुवीकरण पैदा करें। ममदानी का बयान न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही राजनीतिक निर्णय सुनाने जैसा है। जब तक किसी अदालत में मुकदमा पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी व्यक्ति को “युद्ध अपराधी” घोषित करना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
इज़रायल इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए यह भी कहता है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए आतंकवादी हमले के बाद वह आत्मरक्षा में युद्ध लड़ रहा है और उसकी सैन्य कार्रवाई का लक्ष्य हमास है, न कि आम नागरिक। दूसरी ओर दिलचस्प तथ्य यह है कि ममदानी ने स्वयं स्वीकार किया है कि न्यूयॉर्क नगर प्रशासन के पास आईसीसी का गिरफ्तारी वारंट लागू करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने वीडियो संदेश में कहा कि शहर के कानूनी विभाग ने सभी विकल्पों की समीक्षा की और निष्कर्ष निकाला कि नगर प्रशासन स्वतंत्र रूप से ऐसा नहीं कर सकता। इसके बावजूद उन्होंने संघीय सरकार से हस्तक्षेप की अपील की।
 यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 81वां संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का सत्र न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित होने जा रहा है। यह उच्च स्तरीय महासभा 8 सितंबर से 22 सितंबर 2026 तक चलेगी, जिसमें विश्व भर के नेता भाग लेंगे। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान नेतन्याहू के न्यूयॉर्क आने की संभावना जताई जा रही है। इससे पहले भी चुनाव अभियान के दौरान ममदानी सार्वजनिक रूप से कह चुके थे कि यदि कानूनी रास्ता मिला तो वे न्यूयॉर्क पुलिस के माध्यम से नेतन्याहू की गिरफ्तारी का प्रयास करेंगे।

अमेरिका की संवैधानिक स्थिति अलग

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अमेरिका की संवैधानिक स्थिति है। संयुक्त राज्य अमेरिका अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का सदस्य देश नहीं है। इसलिए आईसीसी के आदेश अमेरिका पर स्वतः बाध्यकारी नहीं होते। इसी कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि नेतन्याहू को अमेरिका में किसी भी स्थिति में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। उन्होंने आईसीसी की कार्रवाई को राजनीतिक और पक्षपातपूर्ण बताया है। यही कारण है कि ममदानी की अपील का तत्काल कोई कानूनी प्रभाव दिखाई नहीं देता, बल्कि इसे एक राजनीतिक संदेश के रूप में अधिक देखा जा रहा है।
आपको बतादें कि ममदानी ने सार्वजनिक रूप से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल‘ (युद्ध अपराधी) कहकर संबोधित किया है और उन्हें 2002 के गुजरात दंगों के लिए दोषी ठहराया गया। यह बयान तब दिया गया, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीएम मोदी को दंगों के संबंध में पहले ही क्लीन चिट दी जा चुकी थी।ममदानी ने दावा किया था कि ‘गुजरात में अब कोई मुसलमान नहीं बचा है’, जो कि पूरी तरह से झूठा और भड़काऊ बयान है।
ममदानी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बताया। यह बयान भारत के लोकतांत्रिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नकारता है और करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाता है। जनवरी 2024 में, ममदानी न्यूयॉर्क में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के खिलाफ आयोजित प्रदर्शनों में शामिल हुए। इन रैलियों के दौरान कथित तौर पर हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक नारे लगाए गए थे। इन सभी बयानों से यह स्पष्ट है कि ममदानी राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं रहे हैं, वे वामपंथी लिबरल का मुखौटा पहनकर चयन विशेष की इस्‍लामिक चरमपंथी राजनीति कर रहे हैं।

कट्टरपंथी समूहों का साथ

जोहरान ममदानी के विवाद सभ्‍य समाज के लिए इसलिए भी चिंता पैदा करते हैं क्‍योंकि उनका जुड़ाव कुछ ऐसे संगठनों और व्यक्तियों से भी रहा है, जिन पर गंभीर आरोप हैं। ममदानी ने हाल ही में इमाम सिराज वहाज से मुलाकात की थी, जिस पर 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके के साजिशकर्ताओं से संबंध रखने के गंभीर आरोप लगे थे।
जोहरान ममदानी इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसे संगठनों से भी जुड़े हैं। इन समूहों पर भारत-विरोधी प्रचार चलाने, हिंदू समूहों पर ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ का आरोप लगाकर डर और अविश्वास का माहौल बनाने का आरोप ही नहीं है, वे लगातार आज भी हिन्‍दू विरोध में जहर उगल रहे हैं, चाहें तो इनकी वेबसाइट पर जाकर देखा जा सकता है।

अब्बू महमूद ममदानी पर भी चरमपंथी होने के लगे हैं आरोप

जोहरान ममदानी के विवादित विचारों की जड़ें उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि तक जाती हैं। ममदानी के अब्बू प्रोफेसर महमूद ममदानी युगांडा मूल के लेखक हैं। इन पर भी गंभीर वैचारिक आरोप लगे हैं। उन्होंने अपनी पुस्तकों और व्याख्यानों के माध्यम से इस्लामी चरमपंथ और हिंसा को वैचारिक रूप से ‘जायज’ (Justify) ठहराने की कोशिश की।अपनी एक पुस्तक में ममदानी ने पाकिस्तान के निर्माण को ‘धार्मिक एकता की जरूरत‘ के रूप में चित्रित किया है। वहीं उन्होंने जिन्ना और इस्लामी उलेमा के विभाजनकारी व चरमपंथी रवैये पर पर्दा डालने की कोशिश की, यहाँ तक कि विभाजन के दौरान हिंदुओं के नरसंहार को भी वैचारिक रूप से हल्का दिखाने का प्रयास किया।
महमूद ममदानी ने यह दावा भी किया कि इस्लाम में ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक ‘उम्माह’ (एक वैश्विक मुस्लिम समुदाय) है, जिसे सीमाओं में नहीं बाँटा जा सकता। कई आलोचकों और भारतीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह विचार परोक्ष रूप से ‘गजवा-ए-हिंद’ (संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप को इस्लाम के अधीन लाने की चरमपंथी भविष्यवाणी) जैसी घातक और अतिवादी सोच को बढ़ावा देता है।
कुल मिलाकर महमूद ममदानी ने अपने लेखन में इस्लामी हिंसा और आतंक को वैचारिक रूप से सही ठहराने का प्रयास किया है। जोकि अब उनके बेटे जोहरान ममदानी की विवादास्पद राजनीति में भी दिखाई देता है। जहाँ ‘प्रगतिशीलता’ के नाम पर इजराइलियों, भारत और हिंदुओं के खिलाफ नफरत को जायज ठहराया जा रहा है।
ऐसे में कहना यही होगा कि यूएस में ममदानी का उदय आज इस्लामो-मार्क्सवाद का साक्षात रूप नजर आता है – एक हिंसक विचारधारा जो वर्तमान में पश्चिम और शेष विश्व में फैल रही है, और न्यूयॉर्क, बर्लिन, पेरिस, लंदन आदि की सड़कों पर ‘आज़ाद फ़िलिस्तीन’ के नारों में साकार हो रही है। यह विचारधारा जागृत वामपंथ के साथ मिलकर बौद्धिक श्रेष्ठता का दावा करने और मुस्लिम उत्पीड़न के रूप में दिखने वाली आत्मघाती सहानुभूति का एक घातक मिश्रण बनाती है, जबकि वास्तव में यह कट्टरपंथी इस्लाम का पश्चिम के शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत गलियारों में चुपके से प्रवेश है।
सरल शब्दों में कहें तो, कट्टरपंथी इस्लाम ने मार्क्सवादी, समाजवादी और प्रगतिशील राजनीति का आवरण ओढ़कर पश्चिम पर कपटपूर्ण तरीके से कब्ज़ा कर लिया है। जबकि वास्तविकता में, कट्टरपंथी इस्लाम सबसे अनुदार और प्रतिगामी विचारधारा है, जो काफिरों के नरसंहार और महिलाओं को शिक्षा और सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं से वंचित करने को सर्वोपरि मानती है।
वैश्विक जिहाद के ज़रिए फले-फूले इस्लामवादियों और व्यावहारिक मार्क्सवाद के बीच रणनीतिक गठबंधन ने एक ऐसा संभावित परिदृश्य तैयार किया है जो पश्चिम के लिए अस्तित्वगत खतरा है। यह तथ्य कि ममदानी के अभियान का अधिकांश हिस्सा CAIR (काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस) द्वारा वित्त पोषित किया गया था, जो मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन करता है, इस तर्क को बल देता है कि इस्लामो-मार्क्सवादी विचारधारा ने वामपंथी एजेंडे को अपने पक्ष में कर लिया है, जिसके अवशेष भारत में भी देखे जा सकते हैं।

उम्माह’ की राजनीति

यहीं से ममदानी की राजनीति पर सबसे बड़ा वैचारिक विवाद शुरू होता है। वे स्थानीय प्रशासनिक मुद्दों से अधिक वैश्विक मुस्लिम समुदाय से जुड़े राजनीतिक प्रश्नों को प्राथमिकता देते हैं। इसी संदर्भ में “उम्माह की राजनीति” शब्द का प्रयोग किया जाता है। इस्लामी परंपरा में “उम्माह” का अर्थ विश्वव्यापी मुस्लिम समुदाय से है। दरअसल, उम्‍माह की सोच व्‍यक्‍ति को इस्‍लाम के समर्थन में खड़ा करती है, फिर दोष कितना ही बड़ा क्‍यों न हो, व्‍यक्‍ति उम्‍माह के हवाले से इस्‍लाम और इस्‍लामिक का ही समर्थन करता है। फिलहाल मदनानी यही करते नजर आ रहे हैं।