शुभेंदु का स्वागत कीजिए 

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PM attends swearing ceremony of the new government in West Bengal on May 09, 2026.

शुरू हो रहा पश्चिम बंगाल के नवनिर्माण का दौर ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
पश्चिम बंगाल में कई दशक चले विध्वंस के बाद अब नवनिर्माण का दौर शुरू होने जा रहा है। दीदी पर बहुत भारी पड़ने वाले दादा की नई पारी शुरू हो गई है। यानी पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं।
सिर्फ दो साल में 2024 से 2026 के बीच पूर्वी भारत के तीन राज्यों उड़ीसा, बिहार और अब पश्चिम बंगाल में भाजपा को पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का मौका मिला है। शुभेंदु अधिकारी की पहचान एक जमीनी नेता की है। वह रामकृष्ण मिशन के परम भक्त हैं। बचपन से हर शनिवार को रामकृष्ण मिशन जाते थे। उनके घर वालों को डर था कि कहीं बेटा संन्यासी न बन जाए। तो उनको एक दिन भारतीय जनता पार्टी में तो आना ही था। यह ठीक है कि कुछ समय वह तृणमूल कांग्रेस के साथ रहे, लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा कि ममता बनर्जी जन्म अभिमुख राजनीति से हटकर परिवार अभिमुख राजनीति की ओर जा रही हैं और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ा रही हैं तो उन्होंने तय किया कि अब मेरा सफर तृणमूल कांग्रेस के साथ पूरा हो गया। 2020 में उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। 2021 में भाजपा ने उनको विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनाया। पांच साल प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर काम करने के दौरान उन्होंने साबित किया कि वह एक टीम लीडर हैं। सबको साथ लेकर चलने वाले हैं। वह पश्चिम बंगाल के अकेले ऐसे नेता हैं जिन्होंने सिटिंग चीफ मिनिस्टर को दो-दो बार चुनाव हराया। 2021 में नंदीग्राम से ममता बनर्जी को हराया और 2026 में उन्हें फिर उनके ही घर भवानीपुर में हराया। मुझे लगता है कि अब एक ही अफसोस शुभेंदु अधिकारी को होगा कि विधानसभा में जब वह नेता सदन के रूप में बैठेंगे तब उनके सामने नेता प्रतिपक्ष के रूप में ममता बनर्जी नहीं होंगी। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की जो बर्बादी की है, उसके नवनिर्माण का जिम्मा अब शुभेंदु अधिकारी पर है। पश्चिम बंगाल और देश की सुरक्षा की दृष्टि से शुभेंदु अधिकारी को कमान सौंपा जाना बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार की शह पर जिस तरह डेमोग्राफी बदली जा रही थी,उसे रोकने का काम शुभेंदु करेंगे। वह कानून व्यवस्था को स्थापित करने का काम करेंगे। पिछले लगभग 80 सालों में पहली बार ऐसा होगा कि पश्चिम बंगाल में हिंदू अपने को सुरक्षित महसूस करेगा। उसे यह डर नहीं होगा कि दूसरा समुदाय उस पर हमला और अत्याचार करेगा।

शुभेंदु अधिकारी को कुछ लोग भाजपा में बाहरी बता रहे हैं। ऐसे तो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी आरजेडी और जेडीयू से होते हुए बीजेपी में आए हैं, लेकिन सवाल यह है कि यह तीनों क्या भाजपा की विचारधारा पर चलने को तैयार हैं? इसका जवाब जब भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को हां में मिला तब उन्होंने इनको बड़ी जिम्मेदारी देने का फैसला किया और बाहरी-भीतरी की चर्चा जो लोग करते हैं, वे शायद भूल जाते हैं कि अक्टूबर 1951 में बनी भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी कौन थे? डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1930 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। उसके बाद 1946 में वह हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी राजनीतिक शाखा भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष पद के लिए किसी स्वयंसेवक को नहीं चुना। डॉ. मुखर्जी जब जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष बने तब वह कोई स्वयंसेवक नहीं थे। वह कोलकाता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और उसके अलावा जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 46 में जो अंतरिम सरकार बनी थी, उसमें मंत्री रह चुके थे। 1950 में नेहरू-लियाकत पैक्ट के विरोध में उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। जवाहरलाल नेहरू के राज में परमिट लेकर जम्मू कश्मीर जाना पड़ता था। इसका विरोध करने के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर गए। हालांकि सुचेता कृपलानी ने डॉ.मुखर्जी को चेताया था कि आप मत जाइए क्योंकि आपकी सुरक्षा को खतरा है। आप नेहरू को नहीं जानते हैं। आपको सही सलामत लौटने नहीं देंगे। लेकिन डॉक्टर मुखर्जी ने कहा कि नेहरू से मेरे मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मेरे संबंध खराब नहीं हैं और मैं जाऊंगा। कश्मीर में वह गिरफ्तार हुए और पुलिस कस्टडी में उनकी मौत हो गई। नेहरू ने उनकी मौत की जांच कराने से मना कर दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि वहां क्या हुआ होगा।

तो यह सवाल उठाना कि कोई व्यक्ति बाहर से आया है या अंदर से आया,इसका कोई मतलब नहीं है। सवाल यह है कि वह पार्टी के लिए हितकर है या अहितकर है। किसी भी संगठन की ग्रोथ दो तरीकों से होती है। एक ऑर्गेनिक और दूसरा इनऑर्गेनिक। ऑर्गेनिक तरीके से मतलब आप जमीनी स्तर से कार्यकर्ता बनाइए और धीरे-धीरे उनको नेतृत्व के रूप में विकसित कीजिए। इनऑर्गेनिक मतलब बाहर से अपने समान विचार वाले लोगों को साथ लाइए और यह सब करते हैं। जो लोग बीजेपी पर आजकल यह आरोप लगाते हैं,वह भूल जाते हैं कि जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तो आचार्य नरेंद्र देव के निधन के बाद पूरी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का विलय नेहरू ने कांग्रेस में करा दिया। चंद्रशेखर,मोहन धारिया, रामधन, कृष्णकांत आदि समाजवादी नेता उसी समय कांग्रेस में आए थे। इंदिरा गांधी ने मोहन कुमार मंगलम के नेतृत्व में सीपीआई के एक धड़े को तोड़कर कांग्रेस में विलय कराया। इसी तरह आज कर्नाटक का मुख्यमंत्री कौन है? सिद्धारमैया कांग्रेसी नहीं हैं। वह जनता दल से आए हुए हैं। गुजरात में कांग्रेस के 18-20 साल सर्वेसर्वा रहे शंकर सिंह वाघेला खांटी आरएसएस स्वयंसेवक थे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके थे। इस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस के जो अध्यक्ष हैं अजय राय,वे भी भाजपा से आए हुए हैं। इस तरह से लंबी सूची है। पार्टियों में लोग आते जाते रहते हैं। सवाल यह है भाजपा एक ही कसौटी पर लेने वालों को कसती है कि वह हमारी विचारधारा से सहमत है या नहीं। तो सवाल यह नहीं है कि शुभेंदु अधिकारी टीएमसी से भाजपा में आए हैं। सवाल यह है कि वह भाजपा और पश्चिम बंगाल के लिए कैसे साबित होंगे?

मुझे लगता है कि वर्तमान परिस्थिति में शुभेंदु अधिकारी से ज्यादा बेहतर मुख्यमंत्री भाजपा को नहीं मिल सकता था। इस सरकार को एक साथ दो काम करने हैं। पहला, पश्चिम बंगाल के आम लोगों को आश्वस्त करना है कि उनको डरने की जरूरत नहीं है। सरकार उनकी सुरक्षा की गारंटी लेने को तैयार है। दूसरा, जो अपराधी और गुंडा तत्व हैं,उनके मन में कानून का भय पैदा करना। यह दोनों काम एक साथ शुभेंदु अधिकारी भली-भांति कर सकते हैं। उनको प्रशासन का भी अनुभव है और वह कितने सख्त एडमिनिस्ट्रेटर हो सकते हैं, इसकी झलक तब मिली जब वह हमलावरों की गोली का शिकार बने अपने पीए चंद्रनाथ रथ के परिवार से मिलने गए। उनके छोटे से बच्चे को गोद में लिया और जो कुछ कहा, उसको सुनने के बाद ममता बनर्जी ने जो गुंडा तंत्र स्थापित किया है, उसकी शिराओं में खून जमने लगा होगा। आपने सुना है कि किसी प्रदेश में कि किसी पॉलिटिकल पार्टी का टोल प्लाजा हो। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के टोल प्लाजा चलते थे कि इतने पहिए वाले ट्रक से इतनी वसूली होगी, यह सामान लेकर जा रहा होगा तो इतना वसूला जाएगा। इन सबका नियंत्रण अभिषेक बनर्जी के हाथ में था। अभिषेक बनर्जी पश्चिम बंगाल के शासन में एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल अथॉरिटी के रूप में स्थापित हो चुके थे। जो व्यक्ति सार्वजनिक रूप से देश के गृहमंत्री को धमकी दे सकता हो, आप समझिए कि उसका मन कितना विषाक्त है। ऐसे लोगों से लड़ने के लिए शुभेंदु अधिकारी जैसा व्यक्ति ही चाहिए था।
तो पश्चिम बंगाल में एक नया सवेरा हुआ है। विकास में पश्चिम बंगाल जिस बुरी तरह से पिछड़ गया है, उसके बाद बहुत काम करने की जरूरत है। शुभेंदु अधिकारी को इस नजर से देखिए कि पश्चिम बंगाल में जो नया सवेरा आया है, उसको वह आगे ले जा सकते हैं या नहीं। इसका जवाब हमेशा हां में मिलेगा। वह बहुत सहज हैं। एक तो उन्होंने शादी नहीं की है तो कोई परिवार नहीं है। वह 24 घंटे पश्चिम बंगाल के हित के बारे में सोचने वाले नेता हैं। जो केमिस्ट्री उनके और केंद्रीय नेतृत्व के बीच है,वह पश्चिम बंगाल के लिए एक तरह से वरदान साबित होगी। इसलिए शुभेंदु अधिकारी का स्वागत कीजिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक  ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)