बंगाल और असम का जनादेश बता रहा हिंदू अब राजनीतिक रूप से सोचने लगा।
प्रदीप सिंह।पश्चिम बंगाल के जनादेश का असर सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहेगा, उसका असर बहुत दूरगामी होगा। 2014 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भारतीय राजनीति में परिवर्तन का जो सिलसिला शुरू किया था,वह जारी है। इस परिवर्तन से मतलब केवल सत्ता परिवर्तन या सरकार बनाना नहीं बल्कि सामाजिक ढांचे व राजनीति करने के तरीके में बदलाव और अपनी पार्टी का सामाजिक आधार बढ़ाना एवं भौगोलिक विस्तार करना है।
पश्चिम बंगाल और असम चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर साबित किया कि मुस्लिम वोट का वीटो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खत्म कर दिया है। असम में लगभग 40% मुसलमान हैं और वहां बीजेपी का स्ट्राइक रेट 80% रहा। इसी तरह पश्चिम बंगाल में 27 से 30% मुस्लिम वोट है। वहां ढिंढोरा पीटा जा रहा था कि इतनी बड़ी आबादी मुसलमानों की है,भाजपा कहां से जीत जाएगी? जो सीटें वह 2021 में जीती थी,वह भी रिटेन करना मुश्किल है। लेकिन भाजपा ने 293 में से 207 सीटें जीत लीं। यह बीजेपी की ऐतिहासिक जीत है क्योंकि वह अपने कोर इश्यू हिंदुत्व के मुद्दे पर अडिग रही। जय श्री राम का नारा लगाने से पीछे नहीं हटी। 4 मई से पश्चिम बंगाल में जो नारा सबसे ज्यादा लग रहा है,वह जय श्री राम का है। इस परिवर्तन की वाहक बनी है महिला मतदाता। आज पश्चिम बंगाल में जो जश्न का माहौल है, मुझे नहीं लगता कि पिछले 40-50 सालों में कभी रहा होगा। वहां 4 मई को फिर से होली मनाई गई। कहते हैं कि खामोशी कभी-कभी बहुत ज्यादा शोर मचाती है। 15 साल से बल्कि कहें 50 साल से पश्चिम बंगाल में हिंदू खामोश था। 2026 में पहली बार उसने तय किया कि अब बहुत हो गया। अब निकल कर जवाब देना है। जनतंत्र में जवाब देने का सबसे अच्छा तरीका है वोट। उसने उसी का इस्तेमाल किया। उससे ममता बनर्जी बिलबिलाई हुई हैं। वह इस हार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन उनका मामला तो निपट गया। जो जनादेश आ गया है उसको अब कोई बदल नहीं सकता। लेकिन सवाल यह है कि पश्चिम बंगाल से बाहर क्या हो रहा है?
पश्चिम बंगाल के बाहर जहां 2027 के फरवरी-मार्च में चुनाव होने वाले हैं,उनमें सबसे बड़ा राज्य है उत्तर प्रदेश। पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों का सबसे ज्यादा असर वहीं पड़ने वाला है। यूपी में मुख्य विपक्षी पार्टी है समाजवादी पार्टी। उसका कोर वोट है यादव और मुसलमान। यादव तो उसमें से टूटने वाला नहीं है,लेकिन मुसलमान अगर साथ रहेगा तो यादव में भी कुछ टूट हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है। देश में 2014 से जो सिलसिला शुरू हुआ था उसमें थोड़ा सा ब्रेक 2024 में लगा। लेकिन पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजों ने बताया कि वह सिलसिला थोड़ी देर के लिए थम जरूर गया था लेकिन रुका नहीं है। अब बहुत तेज गति से चल रहा है। हिंदू अब राजनीतिक हिंदू के रूप में सोचने लगा है। तो आने वाले समय में सबसे बड़ा खतरा अगर किसी को है तो वह है उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी। अखिलेश यादव ने जब से कमान संभाली है पार्टी पांच में से चार चुनाव हार चुकी है। सिर्फ 2024 के लोकसभा चुनाव में उनको सफलता मिली और उसके बहुत से कारण हैं। 2024 के बाद भाजपा को महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा और दिल्ली में प्रचंड जीत मिली और अब असम और पश्चिम बंगाल। असम की कुल 126 सीटों में से 102 भाजपा और उसके साथियों को मिली हैं। पश्चिम बंगाल में 207 सीटें भाजपा जीती है। यह सिर्फ और सिर्फ हिंदू वोटों के साथ आने के कारण संभव हुआ है। हिंदू राजनीतिक रूप से सोचने लगा है,यह इसका प्रमाण है। तो क्या यादव मतदाता अपने को हिंदू नहीं मानता, यह कौन कह सकता है? अखिलेश यादव को यह गलतफहमी हो सकती है कि यादव अपने को मुसलमान की तरह समझता है,लेकिन मेरा मानना है कि यादव समाज ऐसा है जो हिंदू धर्म और हिंदू रीति रिवाजों के सबसे करीब है। सबसे सात्विक और धर्म से जुड़े हुए लोग इसी समाज में मिलेंगे। अखिलेश यादव जितना मुस्लिम परस्त और हिंदू धर्म से दूर होते जा रहे हैं, वह दरअसल उतना ही अपने सबसे कोर वोट यादव समाज को अपने से दूर कर रहे हैं। ऐसा कल नहीं होने वाला है,लेकिन होगा जरूर। अखिलेश यादव अगर इसी रास्ते पर चलते रहे तो उनका राजनीतिक भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा है।
2017 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 2022 में समाजवादी पार्टी की सीटें कुछ बढ़ गई थी। उसके तीन कारण थे। एक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी उनके साथ थे। दूसरा पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर उनके सहयोगी थे और तीसरा कारण था भाजपा में टिकटों का गलत बंटवारा और अंदरूनी खटपट का परसेप्शन। अब अखिलेश के दोनों प्रमुख सहयोगी जयंत चौधरी और ओम प्रकाश राजभर भाजपा के साथ हैं। इससे भाजपा का सामाजिक आधार और बड़ा हुआ है और उसके अलावा सबसे बड़ी बात मुसलमानों में यह संदेश चला गया है कि जितना भाजपा का विरोध करोगे उसके दो नतीजे होंगे। पहला, भाजपा को जीतने से रोक नहीं पाओगे और दूसरा, तुम्हारा विधानसभा/लोकसभा में प्रतिनिधित्व घट जाएगा। आप अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं को देखिए,वहां मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है। जैसे-जैसे मुस्लिम समाज और उसके नेताओं की यह रणनीति बनी है कि किसी भी हालत में बीजेपी को हराना है,उसकी प्रतिक्रिया हिंदू समाज में हो रही है कि बीजेपी को हारने नहीं देना है। समाजवादी पार्टी के साथ कोढ़ में खाज यह है कि कांग्रेस उसके साथ है। अखिलेश यादव ने देखा होगा कि 4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का नतीजा आया और उसके कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस पार्टी पलट गई। कांग्रेस का 22 साल से डीएमके के साथ अलायंस था,लेकिन उसे छोड़ने में कांग्रेस को कुछ ही घंटे लगे। जिन एमके स्टालिन ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राहुल गांधी विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, उनको धोखा देने में राहुल गांधी को कोई संकोच नहीं हुआ। तो फिर अखिलेश यादव क्या चीज हैं? अखिलेश यादव को तो कांग्रेस वैसे भी कुछ नहीं समझती। कमलनाथ का वह डायलॉग याद कीजिए, यह अखिलेश वखिलेश क्या होता है? समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव उनके लिए इस्तेमाल की चीज हैं। अगर कांग्रेस को फायदा होता है तो इस्तेमाल करेंगे। जिस दिन फायदा दिखना बंद हो जाएगा, उस दिन सपा और अखिलेश यादव को छोड़ने में उनको एक सेकंड भी नहीं लगेगा। कांग्रेस पार्टी वैसे भी पैरासाइट है। जिस पार्टी के साथ जाती है उसी को डुबोती है और उस पार्टी से ताकत लेकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करती है।
तो अखिलेश यादव के सामने समस्या है कि जाएं तो जाएं कहां? बहुजन समाज पार्टी के साथ संबंध इतने बिगाड़ चुके हैं और मायावती लगातार पिछले एक साल से बोल रही हैं कि वह किसी भी पार्टी से चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं करेंगी। कांग्रेस का साथ देकर सपा ने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के खिलाफ वोट दिया था। अखिलेश यादव को दिख रहा होगा कि चुनाव नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल में महिलाएं किस तरह से सड़क पर निकलकर नाच-गा रही हैं। किस तरह से होली मना रही हैं। यह हिंदू शक्ति का ही जागरण नहीं है, यह महिला शक्ति का भी जागरण है। जिस महिला शक्ति को आगे बढ़ने से रोकने का काम विपक्षी दलों ने किया, उसका जवाब देना पड़ेगा। 2027 में महिलाएं अखिलेश से पूछेंगी कि हमारे अधिकार से हमको वंचित क्यों किया,इसका उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। मुसलमानों को भी यह समझ में आ गया है कि किसी को एकमुश्त वोट देने से उन्हें कोई फायदा होने वाला नहीं है। लेकिन एकमुश्त वोट न देकर उनका इतना फायदा हो सकता है कि अपना प्रतिनिधित्व बढ़ा सकते हैं। अगर मुस्लिम वोट सपा के साथ-साथ बसपा को भी जाए तो खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। तो अखिलेश यादव को इसका थोड़ा-थोड़ा अंदाजा तो हो रहा है। पिछले 13-14 सालों में मैं पहली बार देख रहा हूं कि वह हनुमान चालीसा का उदाहरण दे रहे हैं। आज तक वह अयोध्या में राम मंदिर में भगवान राम के दर्शन करने नहीं गए। जाएं भी तो कैसे? उनके पिता की सरकार ने निहत्थे कार सेवकों पर गोली चलवाई थी और उसके लिए आज तक समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव ने माफी नहीं मांगी है। ऐसी पार्टी के साथ हिंदू कैसे जुड़ेगा? उत्तर प्रदेश में जब-जब समाजवादी पार्टी का राज रहा है तब-तब कानून व्यवस्था सबसे बुरे हाल में पहुंची है। तो लोग क्यों समाजवादी पार्टी को वापस लाना चाहेंगे? पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव का नतीजा बता रहा है कि भारत की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है और उस परिवर्तन की आंधी ऐसी है, जिसमें बहुत सारे दल उड़ जाएंगे। अगला नंबर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का है। बस आप चुनाव की घोषणा,चुनाव और नतीजे का इंतजार कीजिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











