संसद चलाने के लिए भाजपा को उनकी अराजकता का हल खोजना ही पड़ेगा ।
पेपर लीक की घटनाएं रोकने के लिए लाए गए संशोधित विधेयक पर संसद में बहस के दौरान राहुल गांधी ने फिर हंगामा खड़ा किया। उनकी पूरी कोशिश रही कि आगे भी संसद न चलने पाए।
संसद में राहुल गांधी का बोलना हमेशा समस्या बन जाता है। बुधवार को भी चर्चा के दौरान वह एक शब्द इस विधेयक पर नहीं बोले। वह सिर्फ मनगढ़ंत कहानी सुनाते रहे। उन्होंने एक छात्रा से हुई बातचीत का जिक्र किया और कहा कि तीन तरह के लोग होते हैं- एक छात्र, दूसरे इडियट्स और तीसरे अंधभक्त। अब ये शब्दावली संसद में नहीं बोली जा सकती, यह राहुल गांधी को पता होना चाहिए। लेकिन अगर आप यह समझ रहे हैं कि राहुल गांधी को यह पता नहीं है तो आप गलतफहमी में हैं। यह राहुल गांधी को अच्छी तरह से पता है। आप उनकी मूल समस्या समझिए। पहली बार वह साल 2004 में सांसद बने थे। तब से अब तक 22 साल में बताइए किसी विधेयक पर वह गंभीरता से कब बोले हैं? कब उन्होंने तथ्यों के साथ अपनी बात रखी है? कब उन्होंने सरकार की कमियों को गिनाया है? कब उन्होंने उस विधेयक या प्रस्तावित कानून में कमियां बताई हैं? ऐसा करने या विधेयक पर कोई सुझाव देने के लिए राहुल गांधी को पढ़ना पड़ेगा। तैयारी करनी पड़ेगी। लेकिन वह जो करते हैं उसके लिए किसी तैयारी की जरूरत नहीं होती। सुबह उठे और नहा धोकर संसद पहुंच गए। कुछ ऐसा बोलो जो संसदीय परंपरा और नियमों के अनुसार न हो। तभी हंगामा होगा। तो उन्होंने यह बात बोल दी और यहीं नहीं रुके। उनको लगा कि इस पर ज्यादा हंगामा नहीं हुआ। तो आगे उन्होंने कहा कि छात्रों पर 20 जुलाई को पुलिस ने जो बल प्रयोग किया था उसका सीधा आदेश गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया था। अब आप समझिए कितनी गंभीर बात कितने हल्के तरीके से बोली जा रही है। सड़क पर चलता हुआ कोई आदमी भी बता देगा कि ऐसी सिचुएशन में आंदोलनकारियों की हिंसा को रोकने के लिए फायरिंग,टियर गैस या लाठी चार्ज का आदेश वहां मौजूद ड्यूटी मजिस्ट्रेट देता है। कोई गृह मंत्री या प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नहीं देता है। लेकिन राहुल गांधी को लगा कि अगर गृह मंत्री और प्रधानमंत्री की बात नहीं करेंगे तो फिर हंगामा ही नहीं होगा। फिर हमारा नैरेटिव ही नहीं बनेगा तो इसलिए उन्होंने सीधे आरोप गृह मंत्री और प्रधानमंत्री पर लगा दिया जबकि इसका उनके पास न कोई प्रमाण है और न कोई तथ्य। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू ने उनसे पूछा कि जो आरोप आप लगा रहे हैं उसका कोई दस्तावेज आपके पास है। संसद का नियम है कि अगर आप किसी व्यक्ति चाहे वह सांसद हो या मंत्री, पर कोई व्यक्तिगत आरोप लगा रहे हैं तो उससे पहले स्पीकर को नोटिस देना पड़ेगा कि हम इस व्यक्ति के खिलाफ ये बोलना चाहते हैं उसके बाद ही आप बोल सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी ये सब कहां करते हैं? उनको मालूम था कि इस विधेयक पर बोलने के लिए उनके पास कुछ है नहीं। तो वह सिर्फ ऐसे आरोप लगाकर निकल गए।
दरअसल राहुल गांधी ने अपनी एक स्टाइल डेवलप कर ली है कि मैं सदन में अपने नियमों के अनुसार बोलूंगा। संसद की परंपरा और नियम मुझ पर लागू नहीं होते। अगर उन्हें नियमों का हवाला दिया जाता है तो वह कहते हैं कि यह मेरे खिलाफ षड्यंत्र है। मुझे बोलने नहीं दिया जाता। वह संसद में बोलने के लिए जब भी खड़े होते हैं तो बिना किसी प्रमाण के व्यक्तिगत हमला करते हैं। यह उनकी पार्लियामेंट्री पॉलिटिक्स की रणनीति बन गई है। उनका उद्देश्य सिर्फ हंगामा करना है। सूरत बदले,यह उनका उद्देश्य नहीं है। उन्हें लगता है कि उनकी बात पर हंगामा नहीं हुआ तो उन्हें कोई श्रेय नहीं मिलेगा। अब आप देखिए कि संसद में राहुल गांधी के इस बयान के बाद सरकार के बचाव में कौन आया? अखिलेश यादव। उन्होंने कहा कि सरकार जांच करके बताए कि बल प्रयोग का आदेश किसने दिया था। अब यह बड़ी तार्किक बात है और सरकार को इसका जवाब भी देना चाहिए। बिना तथ्यों के गृहमंत्री पर आरोप लगाने वाले राहुल गांधी से पूछा जाना चाहिए कि 1984 में सिखों का जो नरसंहार हुआ, उसका आदेश किसने दिया था? आपके पिता राजीव गांधी ने दिया था क्या? 3500 से ज्यादा सिखों की हत्या कर दी गई, राहुल गांधी ने कभी यह जानने की कोशिश की कि यह सब किसके आदेश से हुआ था। 10 साल उनकी भी सरकार रही। 2004 से 2014 बीच में पता कर लेते कि आदेश किसने दिया था। इसीलिए मैं फिर कह रहा हूं कि उनकी कोशिश सिर्फ और सिर्फ हंगामा करने की है। छात्रों के मुद्दे पर वह सीजेपी से पिट चुके हैं। सीजेपी के लोगों और सोनम वांगचुक ने आंदोलन खड़ा किया। राहुल गांधी को लगा कि मैं तो फिसड्डी रह गया तो फिसड्डी ने कोशिश की कि वह अव्वल आ जाए। इसी कोशिश में वह प्रधानमंत्री निवास के बाहर धरने पर बैठ गए। तीन घंटे बैठे रहे। सोशल मीडिया पर लोगों से अपील करते रहे कि देश भर के देशभक्त लोग यहां आएं,लेकिन कोई नहीं आया। आखिर में पुलिस उनको उठाकर ले गई। आंदोलन का कोई श्रेय न मिलने से वह चिढ़े हुए हैं।
आप याद कीजिए कि 2014 से अब तक संसद के किसी सत्र में किसी मुद्दे पर उन्होंने गंभीरता से कोई बात कही हो। उनका कोई भाषण ऐसा नहीं जिसको बाद में याद किया जाएगा, जिस पर रिसर्च होगी, लोग जिसको कोट करेंगे। जब उनकी सरकार थी तो कुछ लिख के पर्चा मिल जाता था। उससे कुछ बोल देते थे। राहुल गांधी संसदीय बहस से हमेशा भागते हैं। इस बार भी वह अपना विक्टिम कार्ड तैयार करके आए थे कि सीधे गृह मंत्री और प्रधानमंत्री पर आरोप लगाऊंगा। हंगामा होगा तो उसके बाद बोल नहीं पाऊंगा। फिर बाहर निकलकर कहूंगा कि मुझे तो सदन में बोलने नहीं दिया जाता। इस पूरे आंदोलन के दौरान किसी ने राहुल गांधी को यह कहते सुना कि सरकार को ये कदम उठाना चाहिए। मैं कहता हूं कि वह पेपर लीक रोकने के लिए उठाए जाने वाले पांच कदम बता दें। लेकिन सवाल है कि बताएंगे कैसे? कांग्रेस शासित राज्यों में पेपर लीक हो रहे हैं। वह वहां सवाल नहीं उठाते। वहां के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं मांगते। तो राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष बनना भारत की संसदीय राजनीति की सबसे बड़ी दुर्घटना है। मैं कहता हूं कि इस बात का विश्लेषण दशकों तक होता रहेगा कि इतना घटिया, इतना कमजोर और इतना दृष्टिहीन नेता प्रतिपक्ष कब आया था? नेहरू या इंदिरा के शासन में जो भी नेता प्रतिपक्ष रहे,भले वे मान्यता प्राप्त न रहे हों,उनके भाषणों को आज भी कोट किया जाता है। आप किसी का नाम ले लीजिए। चाहे डॉक्टर राम मनोहर लोहिया रहे हों, चाहे अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों, चाहे लालकृष्ण आडवाणी रहे हों, ऐसे नामों की लंबी सूची है। इनकी पार्टी के सांसदों की संख्या भले कम थी, लेकिन इनकी बात का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता था। राहुल गांधी का संसद में दिया एक भी भाषण ऐसा नहीं है। पूरा देश तो छोड़िए उनकी अपनी पार्टी पर उनके भाषण का प्रभाव नहीं पड़ता। सदन में राहुल गांधी जैसी भाषा और जो बातें बोलते हैं, उनके खिलाफ प्रिविलेज मोशन आ सकता है। याद रखिए प्रिविलेज मोशन के आधार पर ही इंदिरा गांधी की 1978 में लोकसभा की सदस्यता रद्द हो गई थी। भाजपा राहुल गांधी की इस अराजकता का जब तक हल नहीं खोजेगी तब तक संसद सुचारु रूप से नहीं चलेगी। राहुल गांधी नहीं चाहते कि संसद चले। वह चाहते हैं कि कैसे संसद में व्यवधान पैदा किया जाए। किसी विषय पर गंभीरता से चर्चा ही न होने पाए क्योंकि जिस विषय पर भी गंभीरता से चर्चा होगी तो उनकी पार्टी एक्सपोज होगी। उनकी पार्टी का अतीत गलतियों और अपराधों से भरा रहा है। चर्चा होगी तो वह सारी बातें सामने आएंगी। तो उससे बचने का एक ही तरीका है कि चर्चा ही मत होने दो। वही काम उन्होंने फिर किया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








