कांग्रेस के गले की फांस बनने वाला है वंदे मातरम् का विरोध, सहयोगी भी साथ नहीं।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
देश में संसद बड़ी है या पार्टी? किसकी बात मानी जाएगी? सुप्रीम कोर्ट जो बात रोज कहता है, उस पर क्या अमल करता है? पार्टियां जो कहती हैं, क्या उस पर अमल करती हैं? कांग्रेस पार्टी जिस रास्ते पर जा रही है,क्या उसको अंदाजा है कि वह कहां पहुंचता है? ये ऐसे सवाल हैं, जो इस समय देश के लोगों के मन में हैं। इनका उत्तर किसी के पास नहीं है।
संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने एक प्रस्ताव के जरिए राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सभी छह छंद गाना अनिवार्य कर दिया और उसको वही दर्जा दे दिया जो राष्ट्रगान को है। यानी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् सारे छह छंद गाए जाएंगे और उस दौरान लोगों को खड़े होना पड़ेगा। लेकिन 15 अगस्त को कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय में जो दृश्य दिखाई दिया, वैसा ही शायद जिन्ना की पार्टी मुस्लिम लीग में दिखाई देता। वंदे मातरम् पूरा क्या बजा कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे अपनी ही पार्टी के लोगों से नाराज होकर उनसे सवाल करने लगे। जो गीत देश की आजादी के आंदोलन की आत्मा बना, उसके विरोध में कांग्रेस वहां तक जा पहुंची है, जहां तक मुस्लिम लीग पहुंची थी। जिन्ना की मुस्लिम लीग को ऐसा कुछ भी मंजूर नहीं था, जो हिंदू संस्कृति से जुड़ा हुआ हो। इसीलिए उसने वंदे मातरम् का विरोध किया। उसका मानना था कि हिंदू और मुसलमान कभी साथ नहीं रह सकते इसीलिए उसे अलग देश चाहिए था। मुस्लिम लीग के विरोध को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने 1937 में तय किया कि वंदे मातरम् के दो ही छंद गाये जाएंगे, लेकिन मुस्लिम लीग ने कहा कि हमें ये दो छंद गाना भी मंजूर नहीं है। अब कांग्रेस फंस गई थी। लेकिन उस समय देश में जो वातावरण था, उसमें कांग्रेस ये फैसला नहीं ले सकती थी कि दो छंद भी नहीं गाए जाएंगे। इसलिए दो छंद गाए जाते रहे।
अब संसद से कानून बन चुका है। कोई राजनीतिक दल इस कानून का उल्लंघन कैसे कर सकता है, लेकिन कांग्रेस पार्टी कर रही है। कांग्रेस पार्टी ने अपनी वर्किंग कमेटी में संसद से पास प्रस्ताव का विरोध किया है। जिन्ना के सामने तो लक्ष्य स्पष्ट था। उनको देश का विभाजन कराना था। इसीलिए वह वंदे मातरम् के विरोध में थे। क्या कांग्रेस पार्टी भी देश का विभाजन कराना चाहती है। हाल ही में जम्मू कश्मीर में फिल्म फेस्टिवल हुआ। उस कार्यक्रम में वंदे मातरम् के पूरे छह छंद गाए गए। उस दौरान जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और उनके विधायक-मंत्री सब खड़े रहे। इस पर कांग्रेस पार्टी ने एतराज जताया है। कांग्रेस ने कहा कि हमारे गठबंधन सहयोगी को हमारी संवेदनशीलता को समझना चाहिए। हमारी वर्किंग कमेटी ने प्रस्ताव पास किया है कि वंदे मातरम् के केवल दो छंद गाए जाएंगे फिर इस कार्यक्रम में सभी छह छंद क्यों गाए गए। सवाल है कि किसी पार्टी की वर्किंग कमेटी देश की संसद से पास कानून के खिलाफ कैसे कोई प्रस्ताव पास कर सकती है और उसके बाद लोगों से उसको मानने के लिए कैसे कह सकती है? क्या कांग्रेस पार्टी ने यह प्रस्ताव पास करने से पहले अपने सहयोगी दलों से राय ली थी। नेशनल कांफ्रेंस के एक मुस्लिम विधायक ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष को इस मामले में जवाब भी बड़ा अच्छा दिया है। उन्होंने कहा कि पार्टी और सरकार में फर्क होता है और वही फर्क मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दिखाया है। सरकार संविधान के किसी प्रावधान का विरोध नहीं कर सकती। पार्टियां कर सकती हैं। संसद से पास कानून का पालन करने के लिए कोई भी राज्य सरकार या सरकारी कर्मचारी बाध्य हैं। उनके सामने कोई विकल्प नहीं है। लेकिन कांग्रेस पार्टी को लग रहा है कि वह देश के कानून से ऊपर है। उसको लगता है कि उनकी पार्टी की वर्किंग कमेटी जो तय करेगी, वह देश का कानून बनेगा। यानी वंदे मातरम् के बारे में अगर संसद ने कानून बना दिया तो कांग्रेस पार्टी उसको नहीं मानेगी क्योंकि उसे लगता है कि वंदे मातरम् का विरोध करने से मुसलमानों का वोट मिलता है। अब इस गलतफहमी का कोई इलाज नहीं है। कांग्रेस पार्टी पहली बार ऐसा काम नहीं कर रही है। शाहबानो का मामला याद कीजिए। इन्हीं राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि शाहबानो को गुजारा भत्ता दिया जाना चाहिए। राजीव गांधी को तमाम मुल्लाओं ने समझाया कि अगर ऐसा होने दिया तो मुसलमान कांग्रेस के खिलाफ हो जाएगा। राजीव गांधी तुरंत संसद में प्रस्ताव लाए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया, लेकिन उसके बाद भी मुसलमान का वोट नहीं मिला। वंदे मातरम् में सनातन धर्म को मानने वालों की निष्ठा है, लेकिन जिनकी निष्ठा नहीं है उनके लिए भी अब इसका विरोध करना मुश्किल है। कांग्रेस मुसलमान वोट के लिए इसका विरोध कर रही है, लेकिन मुसलमान विरोध करने को तैयार नहीं है। मुस्लिम विधायक कह रहे हैं कि ये देश का कानून बन गया है। अब ये हमारी स्वेच्छा पर नहीं रह गया है।
कांग्रेस पार्टी दरअसल भाजपा और उसकी सरकार से लड़ते-लड़ते भारत की संसद और संविधान से लड़ने लगी है। अगर आप संसद से पास प्रस्ताव को नहीं मानते तो इसका मतलब है आप संविधान को नहीं मानते। इस प्रस्ताव के विरोध में कांग्रेस अगर कोर्ट जाती तब भी बात समझ में आती। लेकिन कांग्रेस ने अपनी वर्किंग कमेटी में प्रस्ताव पास किया है और वह चाहती है कि यह देश का कानून बन जाए। ऐसा किसी डेमोक्रेसी में न हुआ है और न होगा। जिन्ना की तरह वंदे मातरम् का विरोध करके क्या राहुल गांधी भी देश का बंटवारा कराना चाहते हैं? क्या उनको लग रहा है कि मुसलमानों का एक और अलग देश बन जाए तो उसके वह प्रधानमंत्री बन जाएंगे? अगर उनकी ऐसी सोच है तो स्पष्ट रूप से बोलना चाहिए। क्या राहुल गांधी ने मान लिया है कि वह भारत में चुनाव में भाजपा को हरा नहीं सकते? जब तक वंदे मातरम् पर कानून नहीं बना था तब तक आपका विरोध समझ में आता था, लेकिन संसद से कानून बन गया और अगर सुप्रीम कोर्ट उस कानून को रद्द नहीं करता है तो आप उसे मानने के लिए बाध्य हैं। तो यह मुद्दा अब बड़ा होने वाला है। अब मुसलमानों के लिए भी वंदे मातरम् का विरोध करना कठिन होता जाएगा। देश के कानून के विरोध का सीधा मतलब है कि आप देश और संविधान का विरोध कर रहे हैं। राहुल तो 2024 से संविधान की प्रति लेकर घूम रहे थे कि संविधान को बचाना है। अब उसी संविधान के खिलाफ खड़े हो गए हैं। यह मुद्दा कांग्रेस पार्टी की गले की फांस बनने वाला है। आज अगर आप राष्ट्रगीत वंदे मातरम् का विरोध कर रहे हैं तो कल आप राष्ट्रगान जन-गण-मन का भी विरोध कर सकते हैं। तभी आता है दिमागी नक्सल का मुद्दा। दिमागी नक्सल वही करता है, जो संविधान और देश के विरुद्ध हो। यह किसी और ग्रह से आने वाली प्रजाति नहीं है। ये हमारे आपके बीच में ही हैं। जो इस देश की संस्कृति, संविधान और कानून को नहीं मानते। इस मामले में सहयोगी दल भी कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ नहीं हैं। उनको मालूम है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस और राहुल गांधी का समर्थन करने का परिणाम क्या होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)