पंजाब में भी ऐसा ही ऑपरेशन चलाने की तैयारी।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एक सज्जन हैं दीपेश दिवाकरण। वह साइंटिस्ट और बहुत सी चीजों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने अपनी एक पोस्ट में कुछ तथ्य उजागर किए हैं। उन पर नजर डालिए तो पता चलेगा कि इनका देश, देश की राजनीति और देश की सुरक्षा पर क्या प्रभाव होने जा रहा है।
अक्टूबर 2014,पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खगरागढ़ में एक किराए के मकान पर बोर्ड लगा था कि यहां पर बुर्के बनाए जाते हैं। अचानक एक दिन उस मकान में विस्फोट हो गया। जब वहां जांच एजेंसियां पहुंची तो उन्हें 55 आईडी, हथगोले और आरडीएक्स मिला। बांग्लादेश बॉर्डर के करीब स्थित यह मकान भारत के अंदर जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश का अड्डा था। यहां से भारत विरोधी गतिविधियां चलाई जा रही थीं। इस रास्ते के जरिए बांग्लादेशी घुसपैठिए लाए जाते थे और फिर उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आई कार्ड आदि बनवाए जाते थे। उसके बाद इनको देश के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिया जाता था। इससे आप समझिए कि घुसपैठ किस हद तक थी। बांग्लादेश और भारत की 569 कि.मी. सीमा पर फेंसिंग नहीं थी। बीएसएफ के बार-बार कहने के बावजूद फेंसिंग के लिए राज्य सरकार जमीन देने को तैयार नहीं थी। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद ममता बनर्जी की सरकार जमीन देने के लिए राजी नहीं हुईं। अब शुभेंदु अधिकारी की सरकार आने पर तुरंत जमीन दे दी गई और बाड़बंदी का काम शुरू हो गया। इसके अलावा केंद्र सरकार ने तय किया है कि सीमावर्ती प्रदेशों में बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र 15 कि.मी. से बढ़ाकर 50 कि.मी. कर दिया जाए। ममता बनर्जी ने इसका भी विरोध किया था। यह फेंसिंग इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि माना जा रहा था कि अब चुनाव नैरेटिव या आईडियोलॉजी के आधार पर नहीं लड़े जाते बल्कि डेमोग्राफी नतीजा तय करती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर आदि इलाकों में आईएसआई और बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी पूरी तरह से सक्रिय थीं। राज्य सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था। बल्कि कहें समर्थन था तो गलत नहीं होगा।
दीपेश दिवाकरण फिर एक घटना का जिक्र करते हैं। वह एक दृश्य पेश करते हैं- एक कमरा और उसमें सात कुर्सियां। उन पर सात लोग बैठे हैं- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,गृह मंत्री अमित शाह,रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह,एनएसए अजीत डोवाल,आईबी चीफ,बीएसएफ चीफ और रॉ के एक वरिष्ठ अधिकारी। एनएसए अजीत डोवाल ने मेज पर एक नक्शा रखा और कहा कि यह 22 कि.मी. का इलाका भारत के मेन लैंड को नॉर्थ ईस्ट से जोड़ता है। इसको काटा गया तो भारत का नॉर्थ ईस्ट से कनेक्शन खत्म हो जाएगा। यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर था। बांग्लादेश में स्थित अंग्रेजों का बनवाया हुआ लालमोनिरहाट एयरबेस यहां से सिर्फ 135 किलोमीटर दूर है। इसका रनोवेशन चीन करा रहा है। तो इस इलाके के नीचे बांग्लादेश है और ऊपर चीन। हम बीच में सैंडविच बने हुए हैं। तो बैठक में आवाज उठी कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर यह इंश्योर किया जा सकता  है कि इस सीमावर्ती इलाके में राज्य सरकार का नियंत्रण न रह जाए। तब वहां बाड़बंदी हो सकेगी। इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह संभव ही नहीं है। अगर राष्ट्रपति शासन लगाया तो कोर्ट इंटरवीन करेगा और उसके बाद ममता बनर्जी विक्टिम कार्ड खेल सकती हैं। इसके साथ ही एक और बात प्रधानमंत्री ने कही कि राष्ट्रपति शासन लगाकर आप सालों से चल रहे डेमोग्राफी चेंज करने के प्रोजेक्ट को नष्ट नहीं कर सकते। फिर प्रधानमंत्री ने कहा कि केवल एक स्थाई समाधान है। अब इसके बारे में कोई नहीं जानता कि उन्होंने क्या कहा। लेकिन कोई आदेश जारी नहीं हुआ और काम शुरू हो गया। अप्रैल-मई 2026 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव था। अपने लक्ष्य के तहत भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव की तैयारी 2023 से ही युद्धस्तर पर शुरू कर दी थी। भाजपा ने क्यों ऐसा किया ? एक राज्य में सरकार नहीं बनती तो क्या हो जाता? उसकी वजह है। आप बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बोलते हुए सुनते हैं कि नेशन फर्स्ट, राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेंगे। तो 2026 का पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए एक राज्य की विधानसभा का चुनाव नहीं था। यह डेमोक्रेसी की वेशभूषा में नेशनल सिक्योरिटी का ऑपरेशन था और इसको इसी तरह से चलाया गया। यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं थी। यह देश की सुरक्षा की लड़ाई थी। फेंसिंग के लिए जमीन का मामला हाईकोर्ट ले जाना और वहां से आदेश कराने से एक वातावरण बनना शुरू होता है। उसके बाद बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक था एसआईआर। उसकी शुरुआत बिहार से की गई। पश्चिम बंगाल से शुरुआत करते तो शायद उसका नतीजा कुछ और हो सकता था। हालांकि फिर भी विपक्ष इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गया, लेकिन वहां से फैसला आया कि जो संविधान सम्मत अधिकार चुनाव आयोग को मिला है उसने उसी के अनुसार काम किया। प्रक्रिया में भी कोई खामी नहीं है। उसके बाद एंटीएसआईआर नैरेटिव ध्वस्त हो गया।
तो पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव फिर कह रहा हूं केवल एक चुनाव नहीं था। यह नेशनल सिक्योरिटी का इतना प्रिसाइज और इतना इफेक्टिव ऑपरेशन था,जो शायद ही पहले कभी हुआ हो। जहां सेना का इस्तेमाल नहीं करना पड़ा हो। चुनाव में केवल पैरामिलिट्री फोर्सेस की तैनाती हुई। उन्होंने कोई ऑपरेशन नहीं किया। उन्होंने सिर्फ इंश्योर किया कि लोग बिना डरे अपने मताधिकार का उपयोग कर सकें। इसीबीच गृह मंत्री ने घोषणा कर दी कि चुनाव के बाद भी छह महीने तक पैरामिलिट्री फोर्स राज्य में रहेगी। यह घोषणा लोगों के मन से डर को पूरी तरह निकालने के लिए काफी थी। उसके अलावा ममता बनर्जी और उनके भतीजे ने जिस तरह अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी थी, उसके कारण भी लोगों ने तय कर लिया था कि कुछ भी हो जाए इनको तो हटाना ही है।
अब मैं इसके साथ-साथ दूसरी बात भी कह रहा हूं। अभी आपने नेशनल सिक्योरिटी का पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन देखा। अगला लक्ष्य है पंजाब। जिस तरह की समस्याएं और चुनौतियां पश्चिम बंगाल में थीं,राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उससे भी बड़ी चुनौती पंजाब में है। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से चुनौती थी। वहां आईएसआई और अन्य विदेशी एजेंसियां थीं। पंजाब में भी आईएसआई है और साथ ही पाकिस्तान भी है। तो बांग्लादेश को हिला दिया गया है। पश्चिम बंगाल के नतीजे के बाद जितनी खलबली तृणमूल कांग्रेस में है,उससे कई गुना ज्यादा जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश की सरकार में है। साथ ही वह डीप स्टेट भी बौखलाया हुआ है, जिसने बांग्लादेश में शेख हसीना को हटाकर सत्ता परिवर्तन करवाया था। हिंदुओं का नरसंहार कराया था। उन सबको समझ में नहीं आ रहा है कि अब इससे कैसे निपटें। मुझे लगता है कि पंजाब के ऑपरेशन की तैयारी भी भाजपा और नरेंद्र मोदी की सरकार ने बहुत पहले से शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के बयानों पर ध्यान दीजिए,उससे आपको सब समझ में आएगा। आप याद कीजिए कि आज से दो-तीन साल पहले प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पश्चिम बंगाल के बारे में कहते थे कि हमारी सरकार बनेगी तो बीएसएफ को जमीन मिलेगी और चुन चुनकर एक-एक घुसपैठिये को निकालेंगे। तब लगता था कि यह केवल चुनावी भाषण बाजी है। लेकिन वे एक प्लान बनाकर उस पर काम कर रहे थे। मुझे लग रहा है कि पंजाब में वही होने वाला है। पश्चिम बंगाल के नतीजे देखकर जिस तरह से देश का एक बड़ा राजनीतिक, बुद्धिजीवी और तथाकथित पत्रकारों का वर्ग बिल्कुल अवाक है। मार्च 2027 में अगर ऐसा ही पंजाब में हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पंजाब राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से पश्चिम बंगाल से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। अब पंजाब को सुरक्षित निकालने की जरूरत है और उसका रास्ता यह सरकार किसी मिलिट्री ऑपरेशन के जरिए नहीं चुन रही है। यह डेमोक्रेटिक ऑपरेशन के जरिए किया जा रहा है और उसी की तैयारी हो रही है। आप आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन होते हुए देखेंगे। नतीजा कुछ भी आ सकता है, लेकिन मैं बात प्रयास की कर रहा हूं। लक्ष्य निर्धारित हो चुका है। उसके अनुसार काम शुरू हो चुका है। अब प्रतीक्षा सिर्फ परिणाम की है। वह परिणाम मार्च 2027 में आएगा। तो एक बार फिर मार्च 2027 में चौंकने के लिए तैयार रहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)