चार दिन के धरने ने बता दिया, सरकार के भी बचे हैं बस चार ही दिन।
प्रदीप सिंह।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का चार दिन का धरना मंगलवार को समाप्त हो गया। आप कहेंगे मुख्यमंत्री हैं, जो कुछ चाहे राज्य में कर सकती हैं। धरना किस बात का? धरना स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ऑफ इलेक्ट्रोरल रोल्स (एसआईआर) के खिलाफ। यह ऐसा मुद्दा है जिसके लिए ममता बनर्जी जान देने को भी तैयार हैं। वह किसी भी हालत में मतदाता सूची का शुद्धिकरण नहीं होने देना चाहती हैं। इसे रुकवाने के लिए वह हाईकोर्ट गईं फिर सुप्रीम कोर्ट गईं। सुप्रीम कोर्ट ने तो यहां तक कह दिया कि अगर एसआईआर के रास्ते में अवरोध पैदा करने की कोशिश की गई तो इसको हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। लेकिन ममता बनर्जी का रवैया जारी है।
ममता बनर्जी का धरना कोलकाता के सबसे व्यस्त चौराहे, एसप्लेनेट का जो मेट्रो गलियारा है,पर चला। ऑफिस, कॉलेज, यूनिवर्सिटी आने-जाने वालों सबकी नजर इस रास्ते पर पड़ती है। ऐसी जगह पर भी ममता बनर्जी के धरने में लोगों की भीड़ न जुटने से एक बात स्पष्ट हो गई कि उनकी लोकप्रियता पश्चिम बंगाल में बहुत तेजी से घट रही है। धरने को कोलकाता और पश्चिम बंगाल के लोगों ने नाटक माना। ऐसा पहली बार हुआ जब ममता बनर्जी के किसी विरोध-प्रदर्शन को राज्य की जनता गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। ममता सरकार के भ्रष्टाचार का मुद्दा भाजपा 2016 से लगातार उठा रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उसका असर दिखा भी लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में वह फिर कम हो गया। लेकिन इस समय उनकी सरकार के भ्रष्टाचार का मुद्दा नीचे तक पहुंच गया है। अब पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी से छुटकारा चाहती है और विकल्प के रूप में उसके सामने भाजपा के अलावा कोई नहीं है। तो ममता बनर्जी डरी हुई हैं और आरोप लगा रही हैं कि सीपीएम और बीजेपी मिल गए हैं। अब यह तो हो नहीं सकता कि सीपीएम और बीजेपी मिल जाएं,लेकिन ममता बनर्जी का डर उनसे यह सब बुलवा रहा है। जब सत्तारूढ़ दल का सर्वोच्च नेता डरा हुआ हो तो समझ लीजिए कि उसको अपने और अपने समर्थकों पर विश्वास नहीं रह गया है।

ममता बनर्जी को एक और डर लग रहा है। एक अंग्रेजी दैनिक में छपी खबर के अनुसार ममता को लग रहा है कि केंद्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहती है। राज्य में इस विधानसभा का कार्यकाल 7 मई तक है। उससे पहले चुनाव और विधानसभा का गठन हो जाना चाहिए। लेकिन मतदाता सूची के शुद्धिकरण का काम पूरा न होने के चलते यह कठिन लग रहा है। राज्य में 63.66 लाख मतदाताओं के नाम कट जाना ममता बनर्जी के लिए बुरी खबर है। लेकिन उससे भी बुरी खबर है कि 60 लाख से ज्यादा ऐसे नाम हैं, जो रीज़नेबल डाउट की कैटेगरी में आते हैं, जिनके बारे में फैसला जुडिशियल ऑफिसर्स कर रहे हैं। अभी तक सिर्फ 10 लाख मामलों का निपटारा हुआ है। इस स्पीड से काम चलता रहा तो 15-16 मार्च तक चुनाव की अधिसूचना जारी होना मुश्किल लगता है। अगर चुनाव टल गया तो जाहिर है कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगेगा। चूंकि यह काम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और हाईकोर्ट की निगरानी में हो रहा है तो ममता सरकार किसी तरह का दबाव भी नहीं डाल सकती हैं। अब ममता चाहे जो नाटक कर लें,धरना-प्रदर्शन कर लें लेकिन मतदाता सूची के शुद्धिकरण के काम पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। इससे उनके वोट बैंक पर सबसे ज्यादा असर पड़ने वाला है। बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए भाग चुके हैं। उसके अलावा जो लोग इस दुनिया में नहीं हैं या अब पश्चिम बंगाल में नहीं रहते, उनके नाम मतदाता सूची से कट गए हैं,इन्हीं के आधार पर ममता बनर्जी बोगस वोटिंग कराती थीं। तो उनके दो कोर वोटर हाथ से निकल चुके हैं। इसके अलावा जब से ममता बनर्जी सत्ता में आई हैं तब से पहली बार मुस्लिम वोटों में बंटवारे का खतरा है। मुस्लिम वोटर ममता से बहुत खुश नहीं है। ममता जिस तरह से बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने का काम कर रही हैं, उससे पश्चिम बंगाल के मुसलमान अपने को असहज महसूस कर रहे हैं। उनको लग रहा है कि उनका हिस्सा काटकर घुसपैठियों को दिया जा रहा है। इसके अलावा हुमायूं कबीर ने नई पार्टी बना ली है। असदुद्दीन ओवैसी भी इस चुनाव में कूदने वाले हैं। ये सब बातें भी ममता बनर्जी को डरा रही हैं।
ममता की एक और मुश्किल भाजपा ने बढ़ा दी है। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार भाजपा बहुत समझदारी,धैर्य और संगठित तरीके से काम कर रही है। उसने अपने संगठन को बढ़ाया है और बूथ लेवल पर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कुल मिलाकर ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने के लिए इससे अनुकूल माहौल भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में कभी नहीं था। उनके धरने से साफ दिख गया है कि इस बार उन्हें न तो जनसमर्थन है और न ही उनके प्रति कोई सहानुभूति। अब सारा दारोमदार भाजपा पर है। उसे सिर्फ एक काम करना है, जो लोग वोट देना चाहते हैं,वे अपने घर से निकलकर वोट दे पाएं। हालांकि इस बार चुनाव आयोग भी वोटिंग के दौरान कई बदलाव करने जा रहा है। आयोग ने तय किया है कि मतदान केंद्र के अंदर भी कैमरा लगेगा और उसकी लाइव स्ट्रीमिंग होगी। इससे अगर कोई बोगस वोटिंग करा रहा है तो सब दिख जाएगा। दूसरा,अगर मतदाता सूची के शुद्धिकरण काम समय से पूरा न होने के चलते चुनाव टलते हैं और राष्ट्रपति शासन लग जाता है तो ममता की दिक्कत और बढ़ेगी। उनके हाथ से वह बंगाल पुलिस निकल जाएगी, जो मतदान के दौरान उनके कार्यकर्ता के रूप में काम करती है। तब बीजेपी या दूसरी पार्टियों की दृष्टि से देखें तो लेवल प्लेइंग फील्ड हो जाएगा, जो ममता बनर्जी बिल्कुल नहीं चाहती हैं। उनको मालूम है कि लेवल प्लेइंग फील्ड होते ही उनकी हार तय है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



