तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल लाना चाहती है भाजपा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

पांच विधानसभाओं के चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं। इनमें से एक है तमिलनाडु, जहां राजनीतिक संभावना का एक नया अंकुर फूटने वाला है। अब वह फूटेगा या मुरझा जाएगा, यह अगले चंद दिनों में तय हो जाएगा।

तमिलनाडु की राजनीति दो ध्रुवों में बंटी हुई है। 1967 से वहां द्रमुक या अन्ना द्रमुक अदल-बदल कर सत्ता में आती रही हैं। इसी द्रविणयन राजनीति से तमिलनाडु को बाहर निकालने की कोशिश दो राजनीतिक शक्तियां कर रही हैं। इनमें से एक है भाजपा,जिसको लोकसभा चुनाव में राज्य में 11% से ज्यादा वोट मिले थे। दूसरी है सुपरस्टार विजय की पार्टी टीवीके,जो पहली बार विधानसभा चुनाव में कूद रही है। विजय की पार्टी की उनकी फिल्मों के कारण फैन फॉलोइंग बहुत है,लेकिन वह वोट में बदलेगी या नहीं यह किसी को नहीं मालूम। चूंकि उनकी पार्टी नई है तो उनके पास उस तरह का संगठन नहीं है, जो जमीन पर काम कर सके। एक बात निश्चित है कि विजय और उनकी पार्टी एमके स्टालिन सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का वोट काटने में काफी आगे रहेगी। यह खतरा द्रमुक से ज्यादा एनडीए के लिए है, जिसका नेतृत्व राज्य में अन्ना द्रमुक कर रही है और भाजपा उसका मुख्य घटक है। इस चुनाव में सबके अपने लक्ष्य हैं। विजय का लक्ष्य है कि पहली बार राजनीति में आए हैं और सीधे सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जाएं यानी मुख्यमंत्री बनें। लेकिन उनके पास मुख्यमंत्री बनने के लिए जो चुनावी तैयारी चाहिए थी, वह नहीं है। दूसरा अन्ना द्रमुक एंटी इनकंबेंसी के भरोसे है। केंद्रीय सत्ता के नजदीक होने और बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता से उसको फायदा है। अभी तक विजय ने अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर रखी है। इस स्थिति में एंटी इनकंबेंसी वोट में बंटवारे के खतरे को देखते हुए भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह का मानना है कि विजय का एनडीए में आना जरूरी है। भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य तमिलनाडु की सत्ता से द्रमुक को बाहर करना है। वह डीएमके के फिर सत्ता में लौटने को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा मानती है। एम के स्टालिन ने हर मामले में केंद्र के खिलाफ स्टैंड ले रखा है।

तमिलनाडु में द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बीच कांटे की लड़ाई होती रही है। कई असेंबली सीटें ऐसी हैं जहां फैसला बहुत कम मतों के अंतर से होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2% वोट भी इधर से उधर हो जाए तो पूरा खेल बदल सकता है। इसलिए भाजपा खेल ही नहीं बदलना चाहती बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल लाना चाहती है और उसको मालूम है कि उसके भूचाल का केंद्र विजय ही बन सकते हैं। ऐसे में भाजपा विजय से कई तरीके से संपर्क करने की कोशिश कर रही है। उनसे बात करने के काम में भाजपा ने तेलुगु फिल्मों के सुपरस्टार और आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम पवन कल्याण को लगाया है। अभी तक विजय की भाजपा के किसी बड़े नेता से सीधी बातचीत नहीं हुई है। पवन कल्याण उनको समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने भी राजनीति में आने के बाद अपनी फिल्मी लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश की। अकेले चुनाव लड़ा लेकिन सफल नहीं हो पाए। अकेले लड़ने से विजय का हाल भी वही होने वाला है। चुनावी सफलता के लिए भारतीय राजनीति में रणनीतिक गठबंधन बहुत जरूरी है। उन्होंने जब टीडीपी और बीजेपी के साथ गठबंधन किया तो आज उनकी पार्टी सत्ता में हैं और वह खुद डिप्टी सीएम हैं। भाजपा विजय को डिप्टी सीएम का पद ऑफर कर रही है। गठबंधन के जीतने पर अन्ना द्रमुक सुप्रीमो पलनिस्वामी मुख्यमंत्री और विजय उप मुख्यमंत्री होंगे। अब बीजेपी ने यह दांव तो चल दिया है लेकिन उसके रास्ते की कई मुश्किलें हैं। विजय ने जब अपनी पार्टी का पहला सम्मेलन किया था तो भाजपा को उनकी पार्टी का वैचारिक शत्रु और द्रमुक को राजनीतिक शत्रु बताया था। दोनों से कोई समझौता न करने की बात कही थी। अब द्रमुक सत्ता में है और उसी को सत्ता से हटाने के लिए विजय लड़ रहे हैं, ऐसे में उसके साथ गठबंधन का सवाल नहीं उठता। भाजपा या एनडीए के साथ जाने पर उनके कई रणनीतिकारों का मानना है कि भविष्य की राजनीति के लिए यह अच्छा नहीं होगा। लेकिन कई लोगों का यह भी कहना है कि वर्तमान पहले ठीक होगा तब तो भविष्य की बात करेंगे। अभी लक्ष्य यह होना चाहिए कि द्रमुक को सत्ता से हटाना है। उसके लिए दुश्मन के दुश्मन को दोस्त मान लिया जाए तो उसमें कोई हर्ज नहीं है।

इसलिए विजय के कुछ सलाहकार उनको यह समझाने की भी कोशिश कर रहे हैं कि एनडीए के जरिए हम सत्ता तक पहुंच सकते हैं। अकेले लड़कर  हो सकता है कि द्रमुक को हरा दें लेकिन नतीजा यह होगा कि एनडीए सत्ता में आ जाएगा और उसका कोई श्रेय विजय को नहीं मिलेगा। पवन कल्याण टीडीपी और भाजपा के साथ गठबंधन में हैं।

एक मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके बारे में कहा था कि ये पवन नहीं तूफान है। देखना होगा कि मोदी का यह तूफान क्या तमिलनाडु में राजनीतिक तूफान लाने में सफल होगा। बीजेपी की सारी उम्मीद पवन कल्याण की विजय से समझौता कराने की शक्ति पर टिकी है। विजय से पवन कल्याण के अच्छे संबंध हैं। दोनों फिल्मी बैकग्राउंड से हैं। इसलिए बात करने में भी दोनों को आसानी है। पवन कल्याण बता सकते हैं कि फिल्म जगत से राजनीति की दुनिया में आने में क्या कठिनाइयां होती हैं। तो भाजपा इस समय चारों तरफ से विजय को घेरने की कोशिश कर रही है कि वह एनडीए के साथ आ जाएं। विजय अगर एनडीए के साथ आते हैं तो तमिलनाडु की सत्ता से एमके स्टालिन का जाना तय हो जाएगा।

यह भी खबरें आ रही हैं कि विजय की पार्टी को संसाधनों की कमी महसूस हो रही है। ऐन चुनाव के मौके पर इस तरह का संकट किसी भी नई पार्टी के लिए ठीक नहीं है। अब विजय के सामने दो ही विकल्प हैं। पहला अकेले लड़ें,शहीद हो जाएं और फिर आगे लड़ने के लिए तैयारी करें। दूसरा एनडीए के साथ जाएं। एनडीए के साथ का मतलब है सत्ता में आना पक्का है। अलग लड़ने पर भविष्य अनिश्चितता से भरा हुआ है। उनको वोट शेयर मिल सकता है लेकिन बहुत ज्यादा सीटें मिलेंगी, इसकी संभावना उनकी पार्टी के लोगों को भी नहीं है। अकेले लड़ने से सीधा फायदा द्रमुक को होगा क्योंकि एंटी डीएमके या एंटी इनकंबेंसी वोट उनकी पार्टी और एनडीए में बंट जाएगा।

ऐसे में कम मार्जिन वाली सीटें द्रमुक जीत सकती है।

तो सवाल यह है कि उनका असली लक्ष्य क्या है? द्रमुक को सत्ता से हटाना या द्रमुक विरोधी वोटों का बंटवारा करके उसे फिर से सत्ता में आने का मौका देना। अभी कोई यह नहीं कह सकता कि विजय की पार्टी की विचारधारा क्या है? वह फिल्मों से सीधे राजनीति की दुनिया में कूदे हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य है सत्ता हासिल करना। अलग लड़ने पर सत्ता से दूरी है। दूसरी तरफ एनडीए के साथ सत्ता में तो आते हैं लेकिन उनका जो लक्ष्य मुख्यमंत्री बनने का है,वह पूरा नहीं होता, लेकिन उसके लिए भविष्य के रास्ते खुल जाएंगे क्योंकि द्रमुक की हार तमिलनाडु की राजनीति को हमेशा के लिए पूरी तरह से बदल देगी। तो सवाल यह है कि विजय क्या तय करेंगे? विजय के निर्णय पर ही तमिलनाडु के चुनाव का नतीजा निर्भर है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)