सिपहसालारों की शिकस्त राहुल कांग्रेस को कर देगी पस्त।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
चुनाव किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं और इसमें परीक्षक मतदाता होता है। वह तय करता है कि किस पार्टी को कितने नंबर यानी कितने प्रतिशत वोट,कितनी सीटें दी जाएं। हमारे देश में सरकार वोट प्रतिशत नहीं,सीटों के आधार पर बनती है। इसीलिए सभी पार्टियों की कोशिश होती है कि ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतें या कम से कम बहुमत का आंकड़ा पार करें।
अप्रैल में चार राज्यों तमिलनाडु,पश्चिम बंगाल, केरलम और असम में विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का मुकाबला भाजपा से है। वैसे कहने को तो वहां सीपीएम और कांग्रेस भी हैं,लेकिन चुनावी रेस में वे कहीं नहीं हैं। तमिलनाडु गठबंधन की राजनीति वाला प्रदेश है। 1967 से आज तक यहां किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है। गठबंधन को बहुमत मिलता है और वह बदलता रहता है। तो क्या इस बार बदलेगा,यह एक सवाल है। कांग्रेस और भाजपा राज्य में बड़े खिलाड़ी नहीं हैं। द्रमुक के साथ गठबंधन में कांग्रेस पार्टी चुनाव लड़ती है। उसे इस बार 28 सीटें लड़ने के लिए दी गई हैं। वहां भाजपा एनडीए का घटक दल है,बड़ा प्लेयर अन्ना द्रमुक है। तो यहां भी भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला नहीं है।

केरलम में भी कभी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट, जिसका नेतृत्व सीपीएम करती है और कभी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, जिसका नेतृत्व कांग्रेस पार्टी करती है,बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में पहली बार हुआ जब सीपीएम लगातार दूसरी बार सत्ता में आ गई। केरलम में दोनों गठबंधनों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर 1 से 2% तक ही रहता है। इस बार बहुत से लोगों को उम्मीद थी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आ सकती है क्योंकि एलडीएफ सरकार के खिलाफ लगातार दो बार की एंटी इनकंबेंसी है, लेकिन कांग्रेस के अंदर जो झगड़ा है उससे यह उम्मीद लगातार धूमिल होती जा रही है। असम में भाजपा लगातार दो बार से सत्ता में है और तीसरी बार भी आती हुई दिखाई दे रही है। पिछले दस साल से कांग्रेस पार्टी वहां उठ नहीं पाई है।

असम और केरलम दो ऐसे राज्य हैं जहां राहुल गांधी कांग्रेस, क्योंकि यह पुरानी कांग्रेस नहीं रही, की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। इन दोनों राज्यों में राहुल गांधी के सिपहसालार या कहें उनके बेहद करीबी खम ठोक रहे हैं और उन्हीं के हाथों में चुनाव की पूरी कमान है। केरलम में राहुल के अत्यंत भरोसेमंद केसी वेणुगोपाल मानकर चल रहे हैं कि कांग्रेस सत्ता आई तो वह मुख्यमंत्री होंगे। हालांकि उनका नाम सीएम कैंडिडेट के तौर पर घोषित नहीं हुआ है क्योंकि कांग्रेस को डर है कि ऐसा किया तो शशि थरूर अलग हो सकते हैं। थरूर भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वी सतीश और कुछ अन्य नेता भी रेस में बताए जा रहे हैं। तो कांग्रेस का घर केरलम में बंटा हुआ है। इसलिए इस बात की संभावना ज्यादा है कि सीपीएम तीसरी बार सत्ता में आ सकती है। भाजपा वहां तीसरी पार्टी के रूप में मौजूद है लेकिन अभी वह कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकती।
असम में कांग्रेस की कमान जिन गौरव गोगोई के हाथ में है उनकी सारी उपलब्धि यह है कि वह असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे हैं। दूसरी ख्याति उन्होंने अर्जित की है कि उनकी पत्नी पाकिस्तानी हैं। इसको लेकर काफी विवाद भी हुआ है। गौरव गोगोई भी राहुल के अत्यंत करीबी माने जाते हैं। असम में सीधी लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच में है।
अब सवाल यह है कि असम और केरलम में राहुल गांधी के ये सिपहसालार अगर चुनाव हार जाते हैं तो नतीजे का असर किस पर ज़्यादा होगा? वेणुगोपाल और गौरव गोगोई पर या राहुल गांधी पर? राहुल गांधी केरलम की वायनाड सीट से सांसद रह चुके हैं और इस समय उनकी बहन प्रियंका वाड्रा वायनाड से लोकसभा की सदस्य हैं। इसके अलावा प्रियंका वाड्रा असम की प्रभारी भी हैं। तो इन दोनों राज्यों का जो मैंडेट होगा, वह एक तरह का रिफरेंडम जैसा होगा कि राहुल गांधी की एक्सेप्टेंस कुछ बची है या खत्म हो गई। अगर केरलम और असम दोनों कांग्रेस हार जाती है तो आप मानिए कि 4 मई और राहुल कांग्रेस गई। इसके बाद कांग्रेस के अंदर से राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर खूब सवाल उठेंगे। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कोई बगावत हो जाएगी या कांग्रेस में टूट हो जाएगी। ऐसा कुछ नहीं होने वाला क्योंकि असंतोष जो है, बहुत धीरे-धीरे पकता है। उसकी गर्मी धीरे-धीरे बढ़ती है। असम और केरलम का विधानसभा चुनाव का नतीजा तय करेगा कि राहुल गांधी और साथ-साथ उनकी बहन प्रियंका वाड्रा गांधी का राजनीतिक भविष्य क्या होगा?
राहुल कांग्रेस के लिए केरलम जीतना बहुत जरूरी है क्योंकि सीपीएम की वहां तीसरी बार सरकार बनने का मतलब होगा कि कांग्रेस पार्टी के पतन की तेज शुरुआत हो जाएगी। फिर राज्य में उसकी जगह लेने के लिए भाजपा ताक लगाए बैठी है और अगले 5 साल उसको तैयारी के लिए मिलेंगे। इस बार कांग्रेस का हारना मतलब वह केरलम की राजनीति की मुख्यधारा से बाहर हो जाएगी। तो इंतजार कीजिए 4 मई का। 4 मई को भारत के दो राज्यों के मतदाता बताएंगे कि वे राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य किस रूप में देखते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)