सनातन को डेंगू बताने वाले उदयनिधि स्टालिन को इस्लाम में दिखता है प्रेम और उदारता।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा  के बाद आयोजित एक इफ्तार पार्टी में डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने जो बोला, उसको हर हिंदू को कान-आंख खोलकर सुनना चाहिए और विचार करना चाहिए कि हम किन परिस्थितियों में जी रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो द्रविड़ राजनीति के सिद्धांत हैं और जो इस्लाम के सिद्धांत हैं, उनमें समानता है। इस्लाम हमें इक्वलिटी, प्यार और उदारता सिखाता है। याद कीजिए ये वही उदयनिधि स्टालिन हैं, जो सनातन को डेंगू-मलेरिया बताते हैं और कहते हैं कि इसका समूल नाश करना जरूरी है। सबसे बड़ी बात ये बातें वह कश्मीर घाटी, ईरान-इराक या सीरिया में नहीं बोल रहे थे। वे तमिलनाडु में बोल रहे थे, जहां 89% हिंदू रहते हैं और सिर्फ 5.8% मुसलमान हैं।

उदयनिधि के पिता मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी एक अन्य इफ्तार पार्टी में कहा था कि द्रमुक हमेशा मुसलमानों के साथ खड़ी रहेगी चाहे वह सत्ता में रहे या न रहे। इससे पहले 2021 में जब द्रमुक चुनाव जीती थी तब एक कार्यक्रम में क्रिश्चियन पादरियों की उपस्थिति में उन्होंने कहा था कि हम आपकी वजह से सत्ता में हैं। इससे निष्कर्ष क्या निकलता है? द्रमुक सत्ता में है उन मुस्लिम और क्रिश्चियन वोटों के कारण है,जो राज्य की जनसंख्या का केवल 10 प्रतिशत हैं। उन्होंने एक बार भी आभार नहीं व्यक्त किया कि हम हिंदू वोटों के कारण सत्ता में हैं। हिंदुओं के मुंह पर इससे बड़ा तमाचा क्या हो सकता है? तो मुझे स्वामी श्रद्धानंद की एक बात याद आई,कालांतर नाम की एक पुस्तक में यह उद्धरण संकलित है, उसमें स्वामी श्रद्धानंद ने कहा कि हिंदू और मुसलमान कभी दोस्त नहीं हो सकते। तात्कालिक रूप से दिखावे के लिए तो ऐसा हो सकता हैं लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चल सकता। उन्होंने कहा कि कोई भी मजहब जो जेनोसाइड पर आधारित हो, उसको कैसे स्वीकार किया जा सकता है। और पूरी दुनिया को मालूम है कि इस्लाम नरसंहार से ही आया। इतिहास की बात छोड़ भी दें तो एमके स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन को आज से सिर्फ 36 साल पहले ले जाने की जरूरत है जब कश्मीर घाटी से हिंदुओं का सफाया कर दिया गया। मस्जिदों से ऐलान करके हिंदुओं से कहा गया कि या तो धर्म परिवर्तन करो या अपनी औरतों को छोड़कर यहां से चले जाओ या मरने के लिए तैयार रहो। यह सब आजाद भारत में हुआ। घाटी के हिंदू अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। जिन लोगों को गाजा और फिलिस्तीन की बड़ी चिंता होती है,उनको कश्मीर घाटी के हिंदुओं की चिंता कभी नहीं हुई। उदयनिधि और एम के स्टालिन को बताना चाहिए कि जो मजहब प्यार, इक्वलिटी और उदारता की बात करता है, क्या उसी का प्रदर्शन कश्मीर घाटी में हुआ?

आज पूरी दुनिया में इस्लामिक देश एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। बड़े पैमाने पर इस्लाम को मानने वाले इस्लाम मजहब को छोड़ रहे हैं। लेकिन देखिए कि एम के स्टालिन और उदयनिधि किस दुनिया में रहते हैं। तमिलनाडु में सिर्फ 5.85% मुस्लिम आबादी है फिर भी उसका प्रभाव देखिए। और अपनी संख्या देखिए 89% फिर भी कौन पूछता है आपको? तो फिर आपको स्वामी श्रद्धानंद की एक और बात याद दिलाऊं। उन्होंने कहा था कि अपने पड़ोसी से यह अनुरोध करना कि हमारे ऊपर इतनी क्रूरता मत करो, यह कमजोरी का लक्षण है। जब कमजोरी आएगी तो अत्याचार अपने आप आएगा। हजार साल तक भारत ने यही झेला है। रविंद्र नाथ ठाकुर ने कहा था कि अगर कोई मुसलमान अपने मजहब के नाम पर अपील करे तो बहुत बड़ी संख्या में लोग अल्लाहो अकबर का नारा लगाते हुए इकट्ठा हो जाएंगे। लेकिन अगर हिंदू इकट्ठा होने का नारा देंगे तो कोई इकट्ठा नहीं होगा। हम क्षेत्र और जाति में बंटे हुए हैं। हिंदू के नाम पर हम कभी एक नहीं होते। इस बात को हिंदुओं को हमेशा याद रखना चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को बताना चाहिए कि हम 1000 साल तक गुलाम क्यों रहे। यही सब कारण हैं कि चुनाव के समय में उदयनिधि स्टालिन और एमके स्टालिन तमिलनाडु जैसे हिंदू बहुल राज्य में 89% हिंदुओं के खिलाफ तो सीना तान कर बोलते हैं लेकिन 5.8% मुसलमानों के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत नहीं करते। हिंदुओं की कमजोरी का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? ऐसे नेता जो इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के प्रति अगाध प्रेम जताते हैं और हिंदुओं के प्रति नफरत लेकिन फिर भी वे हिंदू बहुल राज्य में चुनाव जीतते हैं। सत्ता का सुख भोगते हैं। तमिलनाडु में अगर 25% भी हिंदु मतदाता यह तय कर लें कि हमको ऐसी पार्टी को वोट नहीं देना है जो सनातन को बीमारी मानती हो, आप देखिए ऐसे लोग कभी सत्ता में नहीं आ सकते। लेकिन हिंदू कभी हिंदू की तरह सोचता नहीं है।

गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर ने कहा था, हिंदू का हिंदू के रूप में कोई राजनीतिक निर्णय नहीं होता है। भावनात्मक मुद्दों पर कभी-कभी वह एक हो जाता है, लेकिन वह एकता क्षणिक होती है। हाल ही में बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की इफ्तार पार्टी की एक फोटो बड़ी वायरल हो रही है। इसमें वह अरबी गमछा पहने हुए हैं। ऐसे व्यक्ति के बारे में कहा जा रहा है कि वे भाजपा की ओर से बिहार के मुख्यमंत्री बनने वाले हैं। इनकी मानसिकता को समझिए। जिस पार्टी में हैं उसके सर्वोच्च नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कभी उन्होंने देखा इफ्तार पार्टी में जाते हुए, लेकिन उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि नरेंद्र मोदी क्या सोचते हैं,किस तरह का आचरण करते हैं। सम्राट जैसों को लगता है कि इफ्तार पार्टी में नहीं जाएंगे तो हमको सांप्रदायिक मान लिया जाएगा। यही तो गुलामी की मानसिकता है। जिनसे उम्मीद थी, वही अरबी गमछा पहनने लगे। इससे बुरी स्थिति क्या हो सकती है?

आप आज अगर हिंदू हैं तो धन्यवाद दें अपने पूर्वजों का, जिन्होंने सारी कठिनाई सहीं, सारे प्रलोभनों को दरकिनार किया लेकिन अपने धर्म का त्याग नहीं किया। कल के जो डरपोक और लालची हिंदू थे वही आज के मुसलमान हैं। तो तय कर लीजिए कि आपको किसके साथ खड़े होना है।अपने धर्म के साथ, जिससे ज्यादा समावेशी दुनिया में कोई धर्म है ही नहीं या नरसंहार के आधार पर खड़े हुए मजहब के साथ। समस्या ये है कि ऐसी सच्चाई सुनने-देखने को कोई तैयार नहीं है। तो जरा अपने आसपास के लोगों का आचरण देखिए। और मैं कहता हूं कि किसी मुसलमान या किसी ईसाई की तरफ मत देखिए, अपने हिंदू भाइयों की तरफ देखिए और उनकी समझ पर तरस खाइए या क्षोभ कीजिए या क्रोध कीजिए, यह आपके ऊपर है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)