बिहार में भाजपा के लिए सिर्फ नीतीश ही समस्या नही हैं।
प्रदीप सिंह।बिहार में राज्यसभा के चुनाव हो गए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए चुन लिए गए,लेकिन मुझे आश्चर्य हो रहा है कि उन्होंने अभी तक मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया। कुछ लोग होते हैं जो अपने सार्वजनिक जीवन में बड़ी राजनीतिक पूंजी कमाते हैं और उनमें से बिरले होते हैं, जो उस पूंजी को आखिरी दम तक बचाए रख पाते हैं। नीतीश कुमार की दो खासियत हैं। उन्होंने जब जनता दल और लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ा था तो दो मुद्दे भ्रष्टाचार और वंशवाद का जिक्र करते हुए कहा था कि इन पर कभी कोई समझौता नहीं करेंगे। भ्रष्टाचार से उन्होंने आज तक कोई समझौता नहीं किया, लेकिन अपने राजनीतिक जीवन के आखिरी दौर में वंशवाद से समझौता कर लिया। तो उन्होंने अपनी राजनीतिक पूंजी का 50% गंवा दिया। वह अपने बेटे को राजनीति में ले आए और उस समय ले आए जब वे खुद राजनीति में बने हुए हैं।

भाजपा ने जिन सम्राट चौधरी को राज्य का उप मुख्यमंत्री बनाया है और जिनके बारे में कहा जाता है कि मुख्यमंत्री की रेस में फ्रंट रनर हैं, उनका भाजपा और हिंदुत्व की विचारधारा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। सम्राट समय लंबे समय तक आरजेडी में थे और लालू प्रसाद यादव एवं राबड़ी देवी के विश्वस्त माने जाते थे। फिर वह जनता दल यूनाइटेड में गए। वहां से भाजपा में आए। कांग्रेस राज्य में किसी हालत में थी नहीं वरना शायद कांग्रेस में भी रह लिए होते। उनका लक्ष्य केवल सत्ता है। न तो सम्राट चौधरी के बयान और न उनकी राजनीति इस बात की ओर इशारा करती है कि उन्होंने भाजपा की विचारधारा को अपना लिया है, जैसे असम में हिमंत बिस्वासरमा ने किया। असम में हिमंत ने जैसा काम किया है, वैसा भाजपा के बहुत से नेता नहीं कर सकते। हिमंत कभी गंगा-जमुनी तहजीब की बात नहीं करते। वह जिसको सही मानते हैं, उसको बोलने में हिचकिचाते नहीं हैं। शतरंज के खेल में अक्सर ऐसा होता है कि जिस प्यादे को आगे किया जाता है, उसको पिटवाने के लिए आगे करते हैं ताकि दूसरे मोहरों के निकलने की जगह बन सके। तो क्या सम्राट चौधरी भाजपा का वही प्यादा हैं? अब यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन अगर भाजपा सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद पर बिठाने का फैसला करती है तो आप मानकर चलिए कि वह अपनी विचारधारा से अलग रास्ते पर जा रही है। बिहार में भाजपा के जो नेता हैं, उनमें से ज्यादातर ऐसे लोग हैं जिनके लिए छद्म धर्मनिरपेक्षता की राजनीति न्यू नॉर्मल है। उनके लिए इसमें कोई अनहोनी बात नहीं है। इसलिए रोजा इफ्तार में जाने में और अरबी गमछा पहनने में उनको कोई हिचक नहीं होती है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



