मोदी और शाह की राजनीतिक रणनीति से बड़े-बड़े सूरमा पैदल ।
प्रदीप सिंह।वैसे तो किसी भी देश की राजनीति में 12 साल का समय कोई बहुत ज्यादा नहीं होता, लेकिन 2014 में जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब से लगभग 12 साल की राजनीति को आप देखें तो ऐसा लगेगा कि स्थिर पानी में बहुत बड़ी-बड़ी लहरें उठीं और बड़े-बड़े परिवर्तन हुए। मोदी और अमित शाह की राजनीतिक रणनीति ने बड़े-बड़े नेताओं और भाजपा को कहां से कहां पहुंचा दिया।
अगर राज्यवार देखना शुरू करें तो याद कीजिए सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में क्या स्थिति थी? कभी मुलायम सिंह यादव सुपर चीफ मिनिस्टर हुआ करते थे। राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी अहम भूमिका थी। वह देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकार में डिफेंस मिनिस्टर रह चुके थे और उससे पहले तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके थे। 2012 में पहली बार उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला लेकिन बेटे को गद्दी सौंप दी। ऐसा लग रहा था कि समाजवादी पार्टी लंबे समय के लिए उत्तर प्रदेश की सत्ता में आ गई है। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आ गए। उसके बाद के 12 सालों में देखिए क्या-क्या हो गया। मुलायम सिंह यादव के जीते जी उनका ताज उनके बेटे ने ही छीन लिया। जिसको उन्होंने अपना वारिस बनाया था वह पार्टी को 224 विधानसभा सीटों से 47 पर ले आया। मायावती की बसपा उस समय नंबर दो की पार्टी और वह खुद देश में सबसे बड़ी दलित नेता थीं। लेकिन आज उनकी राजनीतिक स्थिति क्या है? उनकी पार्टी हाशिए पर जा चुकी है। अब जरा लोकसभा सीटों की दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र को देखते हैं। वहां 2014 में भाजपा चौथे नंबर की पार्टी थी। गठबंधन में शिवसेना बड़ा और भाजपा छोटा भाई थी। उद्धव ठाकरे बहुत बड़े नेता थे। आज उद्धव ठाकरे को देखिए, क्या से क्या हालत हो गई है। दूसरी ओर भाजपा राज्य में चौथे नंबर से पहले नंबर की पार्टी बन गई है।
12 साल पहले चार राज्यों के मुख्यमंत्री अंगद के पांव की तरह सत्ता में जमे बैठे थे। असम में तरुण गोगोई अपने तीसरे कार्यकाल में थे। उड़ीसा में नवीन पटनायक 99 से लगातार मुख्यमंत्री थे और ऐसा लग रहा था कि जब तक वह चाहेंगे तब तक मुख्यमंत्री रहेंगे। बिहार में नीतीश कुमार के बारे में सब लोगों ने मान लिया था कि सरकार किसी की आए, चुनाव कोई जीते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे। वह किसी भी पाले में जा सकते हैं। आज नीतीश कुमार की स्थिति क्या है? महाराष्ट्र के शरद पवार राजनीति के चाणक्य माने जाते थे। आज राष्ट्रीय राजनीति छोड़िए, महाराष्ट्र की राजनीति में भी वह कहीं नहीं हैं। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री और सिखों के सबसे बड़े नेता थे। मध्य प्रदेश में कमलनाथ,दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तिकड़ी बहुत मजबूत स्थिति में थी। आज कमलनाथ का नाम कोई नहीं लेता है। दिग्विजय सिंह की राज्यसभा की सदस्यता खत्म होने वाली है। फिर राज्यसभा भेजे जाएंगे,इसकी भी संभावना कम है। दक्षिण भारत के राज्य केरल में ओमान चांडी और एके एंटनी कांग्रेस पार्टी के कर्णधार थे। तमिलनाडु में करुणानिधि और जयलिता के अलावा लगता था कि कोई है ही नहीं और कोई होगा भी नहीं। बिहार की राजनीति लालू प्रसाद यादव के इर्दगिर्द घूमती थी। आज लालू प्रसाद यादव पार्टी तो छोड़िए अपने परिवार को एक नहीं रख पाए।
12 साल पहले राष्ट्रीय राजनीति में देखें तो सोनिया गांधी एक तरह से महारानी के पद पर विराजमान थीं। भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रहे हों लेकिन सत्ता का सूत्र सोनिया गांधी के हाथ में था। वह राष्ट्रीय राजनीति की धुरी थीं। राहुल गांधी का उभार हो रहा था। सोनिया की इच्छा थी कि राहुल प्रधानमंत्री बनें और 2014 के चुनाव में उन्हें इसी तरह प्रोजेक्ट किया गया था। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थीं। लगता था कि उन्हें कोई हिला नहीं सकता। लेकिन सिर्फ 12 साल लगे नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सबको हिला दिया। अंगद के पांव की तरह जमे तरुण गोगोई और नवीन पटनायक सत्ता से चले गए, नीतीश कुमार जाने की तैयारी में हैं। ममता बनर्जी के लिए सिर्फ 4 मई तक इंतजार कीजिए। भाजपा की आलोचना करने वाले कहते थे कि वह क्षेत्रीय दलों से नहीं लड़ सकती और लड़ भी ले तो जीत नहीं सकती। आज आप देखिए कौन सा क्षेत्रीय दल बचा है। यूपी, बिहार, उड़ीसा कहीं देख लीजिए। भाजपा जिन राज्यों में मजबूत थी, उसमें और मजबूत हो गई। जहां कमजोर थी, वहां बहुत मजबूत हो गई। जहां नहीं थी वहां आ गई और लगातार आ रही है। त्रिपुरा, असम, उड़ीसा और अब बिहार में भी भाजपा का पहली बार मुख्यमंत्री बनने वाला है। आज राष्ट्रीय राजनीति में सोनिया गांधी का नाम लेने वाला कौन है? राहुल गांधी जो उभरते हुए नेता थे, उनका सितारा डूब गया। आंध्र प्रदेश की राजनीति में जगन मोहन रेड्डी धूमकेतु की तरह उभरे थे। आज आंध्र प्रदेश की राजनीति में उनकी कोई बात नहीं करता। तेलंगाना में चंद्रशेखर राव को लग रहा था कि वह अगले प्रधानमंत्री हैं। वह चौथा मोर्चा बनाने के लिए निकले थे। पार्टी क्या, वह अपने परिवार को एक नहीं रख पाए।
चुनावी राजनीति में पार्टियां और नेता सत्ता में आते-जाते रहते हैं। यह सामान्य बात है। लेकिन जनतंत्र में जब आप लोगों की नजर से गिर जाते हैं, तब उठना मुश्किल हो जाता है। तो सोनिया गांधी,राहुल गांधी हो,चंद्रशेखर राव,जगन मोहन रेड्डी,लालू प्रसाद यादव,अखिलेश यादव, आप एक-एक कर नाम गिनते जाइए आपको पता चलेगा कि ये सब लोग आज जिस स्थिति में हैं, वह इसलिए कि जनता की नजर से गिर गए। इस बीच में उभरा कौन है? चंद्रबाबू नायडू सर्वाइव कर रहे हैं क्योंकि बीजेपी के साथ आ गए। नीतीश कुमार भी इसीलिए सर्वाइव कर रहे हैं कि वह बीजेपी के साथ आ गए। नवीन पटनायक जब तक बीजेपी से ताल मिलाकर चलते रहे, सत्ता में रहे। अलग हुए और विधानसभा चुनाव में खुली लड़ाई हुई तो सत्ता से बाहर हो गए। मुझे इस दौर में सिर्फ एक नेता दिखाई देता है जो अपने दम पर उभरा और टिका है, उसका नाम है हेमंत सोरेन। उनके अलावा पिनराई विजयन का नाम भी इसमें लिख सकते हैं। ममता बनर्जी और एम के स्टालिन मेरा मानना है कि अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं। 4 मई के बाद ये दोनों भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो जाएं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। कांग्रेस पार्टी इस समय तीन राज्यों में सत्ता में है। कर्नाटक,तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश। तेलंगाना के बारे में अभी कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में होने वाले अगले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सत्ता जाना तय है। सिर्फ 12 साल हुए और देश की राजनीति में भाजपा को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। राज्य दर राज्य भाजपा जीत रही है। राज्य दर राज्य कांग्रेस और क्षेत्रीय दल हार रहे हैं। 2029 आते-आते केवल झारखंड और केरल में मुझे गैर भाजपा सरकार दिखाई दे रही है। इसके अलावा कौन बचेगा, यह कहना मुश्किल है।
यूपी में अखिलेश यादव के पास एक साल का समय है। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि उत्तर प्रदेश का मतदाता उन्हें फिर से सत्ता में लाने के बारे में सोचे। जो थोड़ी बहुत कसर बची थी वह धुरंधर टू ने पूरी कर दी। अतीक अहमद के लिए जिस तरह से सपा दुखी हुई उसे पार्टी के ताबूत की आखिरी कील समझिए। राजस्थान में कांग्रेस के लिए सचिन पायलट एक उम्मीद थे लेकिन उसे कांग्रेस ने खुद खत्म कर दिया। यही हाल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का है। गुजरात की तो बात ही करने का कोई मतलब नहीं है। वहां अब कांग्रेस कभी खड़ी भी हो पाएगी, इसकी संभावना मुझे नहीं दिखती। देश की राजनीति में 12 साल में इतना परिवर्तन आया है जैसे लगता है एक युग बीत गया हो। इन 12 सालों में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई और आप इंतजार करते रहिए। आगामी विधानसभा चुनावों में तमिलनाडु और केरल में भी भाजपा का जनाधार बढ़ेगा। भाजपा यहां तक अपने श्रम,अपनी विचारधारा और वैचारिक निष्ठा से पहुंची है। नरेंद्र मोदी ने बहुत बड़ी लकीर खींची है और जब तक कोई इससे बड़ी लकीर नहीं खींचता, तब तक भाजपा को हरा नहीं सकता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



