प्रदीप सिंह।पश्चिम बंगाल में पांच दशक बाद पहली बार ऐसा विधानसभा चुनाव होने जा रहा है,जिसमें सत्तारूढ़ दल तय नहीं करेगा कि चुनाव किस दिशा में चलेगा और कैसे लड़ा जाएगा? चुनाव में व्यवस्था क्या होगी? चुनाव आयोग को काम करने दिया जाएगा या नहीं दिया जाएगा? मैं केवल पांच दशक इसलिए कह रहा हूं कि 1977 से पहले कांग्रेस ने जो किया, वह लोगों की याद से धूमिल हो चुका है। कांग्रेस ने नक्सलवाद से लड़ने के नाम पर आम लोगों का दमन किया। बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं। उसका नेतृत्व सिद्धार्थ शंकर रे ने किया था, जो उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और गांधी परिवार के बहुत करीबी थे।
1977 में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक वातावरण बदला तो कांग्रेस सत्ता से बाहर चली गई। चुनाव से पहले सीपीएम और जनता पार्टी के बीच चुनावी गठबंधन नहीं हो पाया। इन चुनावों में सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट को बहुमत मिला और इसके बाद 2011 तक 34 साल वह सत्ता में रहा। लेफ्ट फ्रंट ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक नया ढांचा तैयार किया। जितनी हिंसा 34 सालों में पश्चिम बंगाल में हुई मुझे नहीं लगता भारत के किसी राज्य में हुई होगी, लेकिन सरकार के खिलाफ कोई नैरेटिव नहीं बना। ज्योति बसु, जो उनके सबसे बड़े नेता थे और सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे, निहायत संकीर्ण सोच के व्यक्ति थे। वह दिल्ली आकर जब भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे तो हिंदी में पूछे गए सवाल का जवाब नहीं देते थे। जब 1998 में भाजपा की सरकार बनी तो उनका बयान था कि मैं अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री नहीं मानता। एक बार तो उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी से भी मिलने से मना कर दिया था। लेफ्ट फ्रंट के शासन में चुनाव आयोग का कोई मतलब नहीं रह गया था। सत्ता तय करती थी कि चुनाव कैसे कराए जाएंगे। अधिकारियों की नियुक्ति कैसे होगी? पुलिस कैसे काम करेगी? लेफ्ट फ्रंट की सत्ता के खिलाफ ममता बनर्जी जान पर खेलकर लड़ीं। लेकिन जब 2011 में ममता को सत्ता मिली तो उन्होंने लेफ्ट फ्रंट के ही मॉडल को अपनाया। हिंसा,सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करने और चुनाव आयोग को हाशिए पर धकेलने के मामले में वह सीपीएम से भी आगे निकल गईं। इसीलिए 2011, 2016, 2021 तीनों चुनाव ममता बनर्जी धूमधाम से जीतीं।
2021 के चुनाव में टीएमसी की प्रचंड जीत के बाद तो पूरे प्रदेश में हिंसा का तांडव हुआ। लोगों की हत्या हुई,घर जलाए गए,महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। राजनीतिक हिंसा का मामला हाईकोर्ट में गया। फिर सुप्रीम कोर्ट गया। सीबीआई की जांच बिठाई गई। लेकिन ममता पर कोई असर नहीं पड़ा। उनको लगता है कि यही उनकी लड़ाई का तरीका है। पहला आक्रामक रहो। हर समय हिंसा के लिए तैयार रहो फिर विक्टिम कार्ड खेलो कि हम तो बेचारे हैं। इस बार यह पहला चुनाव है जब ममता बनर्जी डिफेंसिव हैं। उनकी आक्रामकता चल नहीं पा रही है। सवाल यह है कि वह किससे-किससे लड़ें? भाजपा उनकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन हाशिए पर जा चुकी सीपीएम और कांग्रेस से भी उनको डर लगता है कि अगर ये पार्टियां जरा भी खड़ी हो गईं तो हमारा मुस्लिम वोट ले जाएंगी। अब उनका एक नया डर हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन से पैदा हो गया है। एसआईआर का काम रुकवाने में भी उनको सफलता नहीं मिली। तो अब वह विक्टिम कार्ड खेल रही हैं कि सब मेरे खिलाफ हो गए क्योंकि मैं बांग्ला संस्कृति को बचाना चाहती हूं। बांग्ला भाषा को बचाना चाहती हूं। उनकी नजर में देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बाहरी हैं। सिर्फ इसलिए कि ये दोनों गुजरात के रहने वाले हैं। लेकिन उनको यह याद नहीं आया कि जब 2024 के लोकसभा चुनाव में वह गुजरात से एक उम्मीदवार युसुफ पठान को लेकर आईं और कांग्रेस पार्टी के लोकसभा सदस्य अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ उतार दिया और उसे जिताया। उसके अलावा शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद दोनों टीएमसी से लोकसभा सदस्य हैं और दोनों में से कोई बंगाली नहीं है।
बीते 15 सालों से ममता बनर्जी की जीत का आधार अपने विरोधी मतदाताओं के मन में डर बिठाना था। उसे इतना धमकाओ कि चुनाव के समय वोट देने निकले ही नहीं। दूसरा अगर निकले तो मारपीट करो,हिंसा करो ताकि वोट ही न डाल पाए। उनके अब उनके यह दोनों हथियार भोथरे हो गए हैं। चुनाव आयोग ने पहली बार पश्चिम बंगाल में तय किया है कि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और भयमुक्त वातावरण में होगा। चुनाव आयोग ने जिस तरह के प्रशासनिक फेरबदल किए हैं उससे ममता बनर्जी के कसबल ढीले हो गए हैं। अब वह बेचारगी दिखा रही हैं कि पुलिस तो हमारे हाथ में है नहीं। जब पुलिस उनके हाथ में थी तो मतदाता को पिटवाती थीं। उनका कैडर आग लगाता था, हत्या करता था और पुलिस प्रोटेक्शन देती थी। लेकिन इस बार चुनाव आयोग के फैसलों ने पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के मन में यह हिम्मत पैदा कर दी है कि वे निडर होकर निष्पक्षता से काम करें। सिर्फ इतने से ममता बनर्जी डर गई हैं। इस बार मतदाताओं के मन से टीएमसी के गुंडों का डर निकल गया है। अब जिसको जिस पार्टी का समर्थन करना है, जिसको वोट देना है, उसको वोट दे सकेगा। यह स्थिति पश्चिम बंगाल में 50 साल बाद आई है। इसीलिए मैं पिछले कई महीने से बार-बार कह रहा हूं कि ममता बनर्जी सत्ता से बाहर जा रही हैं।
पश्चिम बंगाल में माहौल किस कदर बदल चुका है उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मतदाता को वोट डालने में डर तो छोड़ दीजिए, बोलने में भी कोई डर नहीं लग रहा है। ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो कह रहे हैं कि मामला इस बार पलटेगा। इस बार दीदी नहीं लौटेंगी। मैं मानता हूं कि इस चुनाव में मतदाता के मन से डर निकालने का सबसे बड़ा काम चुनाव आयोग ने किया है। 15 साल की एंटी इनकंबेंसी, कानून व्यवस्था की खराब स्थिति, महिलाओं की असुरक्षा, राज्य का विकास के पैमाने पर लगातार पिछड़ते जाना,कोई नया उद्योग न लगना जैसे मुद्दों ने पहले ही ममता की नींद उड़ा रखी है। इसके अलावा जिस तरह से उन्होंने घुसपैठियों का निर्बाध आना इंश्योर किया, उनकी सुरक्षा और उनका बचाव किया,उसके कारण उनकी सरकार एक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन गई थी। इस चुनाव में यह बहुत बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। ममता बनर्जी ने 15 साल पश्चिम बंगाल पर राज कर लिया। बहुत हो गया। यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह पश्चिम बंगाल का मतदाता बोल रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
बीते 15 सालों से ममता बनर्जी की जीत का आधार अपने विरोधी मतदाताओं के मन में डर बिठाना था। उसे इतना धमकाओ कि चुनाव के समय वोट देने निकले ही नहीं। दूसरा अगर निकले तो मारपीट करो,हिंसा करो ताकि वोट ही न डाल पाए। उनके अब उनके यह दोनों हथियार भोथरे हो गए हैं। चुनाव आयोग ने पहली बार पश्चिम बंगाल में तय किया है कि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और भयमुक्त वातावरण में होगा। चुनाव आयोग ने जिस तरह के प्रशासनिक फेरबदल किए हैं उससे ममता बनर्जी के कसबल ढीले हो गए हैं। अब वह बेचारगी दिखा रही हैं कि पुलिस तो हमारे हाथ में है नहीं। जब पुलिस उनके हाथ में थी तो मतदाता को पिटवाती थीं। उनका कैडर आग लगाता था, हत्या करता था और पुलिस प्रोटेक्शन देती थी। लेकिन इस बार चुनाव आयोग के फैसलों ने पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के मन में यह हिम्मत पैदा कर दी है कि वे निडर होकर निष्पक्षता से काम करें। सिर्फ इतने से ममता बनर्जी डर गई हैं। इस बार मतदाताओं के मन से टीएमसी के गुंडों का डर निकल गया है। अब जिसको जिस पार्टी का समर्थन करना है, जिसको वोट देना है, उसको वोट दे सकेगा। यह स्थिति पश्चिम बंगाल में 50 साल बाद आई है। इसीलिए मैं पिछले कई महीने से बार-बार कह रहा हूं कि ममता बनर्जी सत्ता से बाहर जा रही हैं।
पश्चिम बंगाल में माहौल किस कदर बदल चुका है उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मतदाता को वोट डालने में डर तो छोड़ दीजिए, बोलने में भी कोई डर नहीं लग रहा है। ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो कह रहे हैं कि मामला इस बार पलटेगा। इस बार दीदी नहीं लौटेंगी। मैं मानता हूं कि इस चुनाव में मतदाता के मन से डर निकालने का सबसे बड़ा काम चुनाव आयोग ने किया है। 15 साल की एंटी इनकंबेंसी, कानून व्यवस्था की खराब स्थिति, महिलाओं की असुरक्षा, राज्य का विकास के पैमाने पर लगातार पिछड़ते जाना,कोई नया उद्योग न लगना जैसे मुद्दों ने पहले ही ममता की नींद उड़ा रखी है। इसके अलावा जिस तरह से उन्होंने घुसपैठियों का निर्बाध आना इंश्योर किया, उनकी सुरक्षा और उनका बचाव किया,उसके कारण उनकी सरकार एक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन गई थी। इस चुनाव में यह बहुत बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। ममता बनर्जी ने 15 साल पश्चिम बंगाल पर राज कर लिया। बहुत हो गया। यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह पश्चिम बंगाल का मतदाता बोल रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



