प्रदीप सिंह।
इस समय चार राज्यों तमिलनाडु,पश्चिम बंगाल,असम,केरल और एक केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा का चुनाव चल रहा है। इन चुनावों में देश की सबसे पुरानी और देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस जितनी दयनीय हालत में दिख रही है, मुझे नहीं लगता कि पिछले 78 सालों में कभी रही हो।
तमिलनाडु में 1967 से पहले तक कांग्रेस सत्ता में थी। 60 साल होने वाले हैं लेकिन कांग्रेस वहां सत्ता में आना तो दूर सत्ता के आसपास भी नहीं आ पाई। राज्य में डीएमके से उसका अलायंस होता है तो भी डीएमके उसको सरकार में शामिल नहीं करती। इन चुनावों में कांग्रेस डीएमके से 45 सीटें मांग रही थी लेकिन उसे सिर्फ 28 सीटें दी गई हैं। इस बात को छोड़ भी दें तब भी कई बातें ऐसी हैं,जो कांग्रेस की दयनीय हालत को बयां करती हैं। डीएमके नेता और डिप्टी चीफ मिनिस्टर उदयनिधि स्टालिन ने एक नहीं कई-कई बार कहा कि सनातन धर्म एक बीमारी है और इसका समूल नाश जरूरी है। उनकी पूरी पार्टी की विचारधारा ही सनातन के खिलाफ है। लेकिन आजकल वह मंदिर-मंदिर जाकर दंडवत करते नजर आ रहे हैं। यह होती है वोट की ताकत। उदयनिधि को मालूम है कि अगर तमिलनाडु में हिंदू वोट नहीं मिला तो सत्ता में आना तो दूर मुख्य विपक्षी दल भी शायद नहीं रह पाएंगे। तो जब उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को बीमारी बताया तब कांग्रेस पार्टी चुप रही। अब उदयनिधि स्टालिन मंदिर-मंदिर दंडवत लेटे हुए नजर आ रहे हैं तब भी कांग्रेस पार्टी चुप है। पता ही नहीं कि कांग्रेस पार्टी का इस पूरे मामले में स्टैंड क्या है? और ऐसा इसलिए है क्योंकि उसकी उम्मीद उधार की खूंटी पर टिकी हुई है। तमिलनाडु में उसकी खूंटी डीएमके है। डीएमके के लोग वोट कर देंगे तो हो सकता है कि वह 15-16 सीटें जीत जाए। सत्ता फिर भी नहीं मिलेगी। इस हालत में भी कांग्रेस को यह गठबंधन मंजूर है। उसकी हिम्मत नहीं है कि वह अकेले अपनी पार्टी को खड़ा करने की कोशिश भी करे। राहुल गांधी को राजनीति में आए 22 साल हो गए। उन्होंने तमिलनाडु में क्या किया ?
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पश्चिम बंगाल में 1947 से 1977 तक लगातार कांग्रेस पार्टी की सरकार रही। 1977 में कांग्रेस जो गई तो आज तक लौट नहीं पाई। जरा आप सोचिए कि यह कैसी राष्ट्रीय पार्टी है,जो इतने बड़े राज्य में जहां उसने 30 साल तक लगातार राज किया हो आज एक विधायक के लिए तरस रही है। और वहां की सत्ता में कौन है? कांग्रेस पार्टी छोड़कर गईं ममता बनर्जी। वह पिछले 15 साल से लगातार सत्ता में हैं। चुनाव वाले तीसरे राज्य असम में कांग्रेस 2001 से 2016 तक लगातार 15 साल सत्ता में रही। उससे पहले भी रही है। लेकिन 2016 में जो गई तो लौट नहीं पाई। उसके असम की सत्ता में लौटने की कोई उम्मीद इस बार भी नहीं दिख रही है,जबकि वहां सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकंबेंसी है और 33% मुस्लिम वोटर हैं, जो भाजपा को किसी भी हालत में वोट नहीं देने वाले। किसी विपक्षी पार्टी के लिए इससे अच्छा वातावरण और क्या हो सकता है? वहां भाजपा की हैट्रिक बनना तय लग रहा है।
चुनाव वाला अगला राज्य है केरल। वहां लंबे समय तक हर पांच साल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही। दोनों गठबंधनों के वोट परसेंटेज में एक-डेढ प्रतिशत का अंतर होता है। लेकिन पिछली दो बार से लगातार सीपीएम के नेतृत्व वाला एलडीएफ सत्ता में है। और यह सब बातें मैं इसलिए कह रहा हूं कि ऐसा राहुल गांधी के पार्टी की कमान संभालने के बाद हुआ है। बीते 10 सालों में राहुल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे,उपाध्यक्ष रहे,महामंत्री रहे और अभी तो सर्वेसर्वा हैं। आप उनकी बातें सुनिए तो लगेगा कि कोई ऐसा दार्शनिक बोल रहा है जिसको मतिभ्रम हो गया है। उनका जमीनी बातों से कोई संबंध नहीं है। केरल में एलडीएफ सरकार के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकंबेंसी और हर 5 साल पर सत्ता बदलने की परंपरा के बावजूद कांग्रेस पार्टी इसबार भी सत्ता की स्वाभाविक दावेदार नहीं लग रही है। केरल में इसबार तो तीसरी शक्ति के रूप में भाजपा भी नजर आ रही है। तिरुवनंतपुरम की म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का चुनाव जीतकर उसने हाल ही में अपनी ताकत का अहसास कराया भी है। हालांकि वह कोई सरकार बनाने नहीं जा रही है लेकिन इस चुनाव में उसकी सीटें अगर डबल डिजिट में भी आती हैं तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इन चुनावों में सवाल ये भी है कि भाजपा खेल किसका बिगाड़ेगी? वह सीपीएम को हरा भी सकती है और जिता भी सकती है। यह भाजपा को तय करना है कि केरल में कौन जीतेगा। मतलब वह किसके वोट ज्यादा काटेगी। तो केरल में भी कांग्रेस को अपने दम पर कोई उम्मीद नहीं है। देश भर से कम्युनिस्ट खत्म हो चुके हैं। केवल केरल में हैं तब भी कांग्रेस पार्टी उनसे लड़ नहीं पा रही है। हालांकि उसकी बहुत सारी वजहे हैं। कांग्रेस और लेफ्ट दिल्ली में तो गले मिलते हैं और राज्य में एक-दूसरे को तलवार दिखाते हैं। तो लोग इतने नासमझ नहीं हैं जो इस खेल को समझ न पाएं।
तो अगर आप देश के बाकी राज्यों की बात अभी छोड़ भी दीजिए और विधानसभा चुनाव वाले चार राज्यों में कांग्रेस की स्थिति देखिए और जरा याद करें 1952 से जिस तरह से कांग्रेस देश की सत्ता में रही है तो आपको उसकी हालत पर सिर्फ तरस आ सकता है। उससे सहानुभूति नहीं हो सकती है क्योंकि इस स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस और खासतौर से गांधी परिवार जिम्मेदार है। गांधी परिवार से प्रेम कांग्रेस के लिए लगातार भारी पड़ता जा रहा है। यह तय है कि परिवार और पार्टी दोनों डूबेंगे और साथ-साथ डूबेंगे। दोनों के फिर से उठ खड़े होने का कोई संकेत नहीं दिखाई देता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
चुनाव वाला अगला राज्य है केरल। वहां लंबे समय तक हर पांच साल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही। दोनों गठबंधनों के वोट परसेंटेज में एक-डेढ प्रतिशत का अंतर होता है। लेकिन पिछली दो बार से लगातार सीपीएम के नेतृत्व वाला एलडीएफ सत्ता में है। और यह सब बातें मैं इसलिए कह रहा हूं कि ऐसा राहुल गांधी के पार्टी की कमान संभालने के बाद हुआ है। बीते 10 सालों में राहुल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे,उपाध्यक्ष रहे,महामंत्री रहे और अभी तो सर्वेसर्वा हैं। आप उनकी बातें सुनिए तो लगेगा कि कोई ऐसा दार्शनिक बोल रहा है जिसको मतिभ्रम हो गया है। उनका जमीनी बातों से कोई संबंध नहीं है। केरल में एलडीएफ सरकार के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकंबेंसी और हर 5 साल पर सत्ता बदलने की परंपरा के बावजूद कांग्रेस पार्टी इसबार भी सत्ता की स्वाभाविक दावेदार नहीं लग रही है। केरल में इसबार तो तीसरी शक्ति के रूप में भाजपा भी नजर आ रही है। तिरुवनंतपुरम की म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का चुनाव जीतकर उसने हाल ही में अपनी ताकत का अहसास कराया भी है। हालांकि वह कोई सरकार बनाने नहीं जा रही है लेकिन इस चुनाव में उसकी सीटें अगर डबल डिजिट में भी आती हैं तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इन चुनावों में सवाल ये भी है कि भाजपा खेल किसका बिगाड़ेगी? वह सीपीएम को हरा भी सकती है और जिता भी सकती है। यह भाजपा को तय करना है कि केरल में कौन जीतेगा। मतलब वह किसके वोट ज्यादा काटेगी। तो केरल में भी कांग्रेस को अपने दम पर कोई उम्मीद नहीं है। देश भर से कम्युनिस्ट खत्म हो चुके हैं। केवल केरल में हैं तब भी कांग्रेस पार्टी उनसे लड़ नहीं पा रही है। हालांकि उसकी बहुत सारी वजहे हैं। कांग्रेस और लेफ्ट दिल्ली में तो गले मिलते हैं और राज्य में एक-दूसरे को तलवार दिखाते हैं। तो लोग इतने नासमझ नहीं हैं जो इस खेल को समझ न पाएं।
तो अगर आप देश के बाकी राज्यों की बात अभी छोड़ भी दीजिए और विधानसभा चुनाव वाले चार राज्यों में कांग्रेस की स्थिति देखिए और जरा याद करें 1952 से जिस तरह से कांग्रेस देश की सत्ता में रही है तो आपको उसकी हालत पर सिर्फ तरस आ सकता है। उससे सहानुभूति नहीं हो सकती है क्योंकि इस स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस और खासतौर से गांधी परिवार जिम्मेदार है। गांधी परिवार से प्रेम कांग्रेस के लिए लगातार भारी पड़ता जा रहा है। यह तय है कि परिवार और पार्टी दोनों डूबेंगे और साथ-साथ डूबेंगे। दोनों के फिर से उठ खड़े होने का कोई संकेत नहीं दिखाई देता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



