#pradepsinghप्रदीप सिंह।
दुनिया में आजकल सिर्फ अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की चर्चा है। बाकी सब मुद्दे पीछे चले गए हैं। सबके मन में दो सवाल हैं। पहला, यह युद्ध कब रुकेगा और दूसरा, इस युद्ध में विजेता कौन होगा? पहले प्रश्न का उत्तर अमेरिका के पास हो सकता है कि जिस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह घोषणा कर देंगे कि हम युद्ध जीत गए और युद्ध से निकल रहे हैं, युद्ध रुक जाएगा। हालांकि यह पूरी तरह से नहीं थमेगा क्योंकि फिलहाल इजराइल नहीं रुकेगा।
डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को जीतना भी चाहते हैं और इस युद्ध से जल्दी से जल्दी निकलना भी चाहते हैं। हालांकि उनका जो पहला लक्ष्य रिजीम चेंज का था,वह पूरा नहीं होने वाला। ट्रंप को लगा था कि अगर ईरान की टॉप मिलिट्री और पॉलिटिकल लीडरशिप खत्म हो गई तो आसानी से रिजीम चेंज हो जाएगा लेकिन वह यह भूल गए कि ईरान की विचारधारा क्या है? ईरान की राजनीतिक विचारधारा शहादत को महिमामंडित करती है। वह मरने वालों पर अफसोस नहीं करती। वह कमजोर भले ही हो लेकिन हार नहीं मानेगा। यह युद्ध बाकी युद्धों की तरह नहीं है, जिसमें अमेरिका अपनी सेना को जमीन पर उतार सके। यह लड़ाई हवा में ही होनी है और एयर स्ट्राइक से दुनिया में किसी देश की रिजीम नहीं बदलती। इस पर लेखक पत्रकार उत्पल कुमार ने विस्तार से लेख लिखा है और उन्होंने कहा है कि अमेरिका जब इस युद्ध में उतरा तो उसने इन बातों का ध्यान नहीं दिया। वह कहते हैं कि तीनों देशों में सिर्फ इजराइल है, जो एक स्पष्ट लक्ष्य के साथ इस युद्ध में उतरा। ईरान इस युद्ध में क्यों उतरा और अमेरिका इस युद्ध में क्यों उतरा? इसको लेकर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है।
उत्पल कुमार लिखते हैं कि इजराइल के लिए ईरान सिर्फ एक दुश्मन देश नहीं है। ईरान उसके अस्तित्व के लिए खतरा है और इसलिए उसके पास विकल्प नहीं है। जब अस्तित्व बचाने का सवाल हो तो कोई भी कीमत बड़ी कीमत नहीं होती। इजराइल के लिए यह युद्ध अपने देश के अस्तित्व को बचाने का है। उसका लक्ष्य ईरान में रिजीम चेंज नहीं है, जो अमेरिका का है। यहां दोनों में अंतर है। इजराइल का लक्ष्य ईरान को इतना कमजोर कर देना है कि उसकी लड़ने की क्षमता खत्म हो जाए और कई दशक तक वह यह क्षमता हासिल न कर पाए। न्यूक्लियर पावर वाला ईरान इजराइल के लिए सबसे बड़ा खतरा है और इजराइल इसको स्वीकार ही नहीं कर सकता। इजराइल इसीलिए ईरान के विनाश के जरिए अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर रहा है। वह ईरान को दशकों पीछे धकेल देना चाहता है। इजराइल ने इस युद्ध के पहले ही दिन ईरान की टॉप मिलिट्री और पॉलिटिकल लीडरशिप को खत्म कर दिया तो उसके लिए रिजीम चेंज का लक्ष्य उसी समय पूरा हो गया। इजराइल को मालूम है कि अगर ईरान में रिजीम चेंज कर भी देंगे तो जो नई सत्ता आएगी वह और ज्यादा कट्टर होगी। उसका भी लक्ष्य इजराइल को खत्म करना होगा।
सवाल यह है कि इस युद्ध का अमेरिका पर क्या असर पड़ेगा? उसका जवाब है कि तात्कालिक रूप से बहुत शॉर्ट टर्म के लिए वहां महंगाई जरूर बढ़ सकती है, लेकिन उसके अलावा अमेरिका का फायदा ही फायदा है। उसका रक्षा उद्योग और तेजी से बढ़ेगा क्योंकि इस युद्ध के बाद खाड़ी के देशों को अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए हथियार चाहिए। नाटो देश भी अपना रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा जहां-जहां विनाश हो रहा है, वहां रिकंस्ट्रक्शन के लिए सबसे ज्यादा अमेरिकी कंपनियां ही आएंगी। वेनेजुएला पर कब्जे के बाद अमेरिका के पास तेल की वैसे भी कोई कमी नहीं है इसीलिए अब वह दुनिया से कह रहा है कि हमसे तेल खरीदो। हालांकि इस युद्ध से अमेरिका की सबसे ताकतवर देश की छवि को जरूर नुकसान पहुंचा है। ईरान ने जिस तरह से खाड़ी के देशों को अमेरिका का मददगार बताते हुए उन पर हमले किए और ट्रंप चाहकर भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवा नहीं पाए, यह इस युद्ध में उनकी सबसे बड़ी नाकामी है। अब मैं एक बात और कह रहा हूं कि अमेरिका इस युद्ध में क्यों आया? कुछ लोगों का मानना है कि इजराइल ने उसे फंसा दिया। मैं इस बात को नहीं मानता। अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप इतने नासमझ नहीं हैं कि नेतन्याहू कहेंगे और वे युद्ध में उतर जाएंगे। दूसरी बात कही जा रही है कि वेनेजुएला के बाद ट्रंप को गलतफहमी हो गई थी कि ईरान में भी वह आसानी से सत्ता परिवर्तन कर लेंगे, ऐसा भी नहीं लगता। उनको अंदाजा था कि ईरान क्या है। एक वर्ग है, जिसका मानना है कि ट्रंप चीन को रोकने के लिए ईरान युद्ध में कूदे। ट्रंप को लग रहा था अगर ईरान में ऐसी सत्ता आ जाए जो अमेरिका के करीब हो तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी अमेरिका नियंत्रित कर सकेगा। चीन का 80% से ज्यादा तेल इसी रास्ते से जाता है। तो चीन के तेल का रास्ता अमेरिका रोक सकता है। अमेरिका को लड़ाई अल्टीमेटली ईरान से नहीं चीन से लड़नी है। अब किसका लक्ष्य क्या था, ये इजराइल के अलावा और किसी के बारे में स्पष्ट नहीं है। ईरान के लिए तो यह युद्ध एग्जिस्टेंस का सवाल है। उसको मालूम है कि अमेरिका जो शर्तें लगा रहा है, उसके बाद ईरान बचेगा नहीं, खत्म हो जाएगा। उसने देखा कि हाल के दशकों में दुनिया में पांच डिक्टेटरशिप्स थीं। नॉर्थ कोरिया, लीबिया, इराक, वेनेजुला और पांचवी खुद ईरान में। इनमें केवल नॉर्थ कोरिया बचा हुआ है क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार है। तो ईरान को यह मालूम है कि उसका अस्तित्व तभी रहेगा जब वह परमाणु हथियार संपन्न होगा। इसलिए उसने यूरेनियम का एनरिचमेंट जारी रखा था। ऐसे में युद्ध रोकने के लिए कोई समझौता होता भी है तो ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम रोकने के मुद्दे पर समझौता नहीं करेगा। इसीलिए इजराइल चाहता है कि इस युद्ध में ईरान को जितना कमजोर किया जा सके कर दो।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस युद्ध में अब तक ईरान का 70 से 80% सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर समाप्त हो चुका है। उसका मिसाइल्स और ड्रोन का भंडार लगातार कम हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह हार नहीं मानेगा क्योंकि उसके हार मानने का मतलब है कि ईरान का खात्मा और यही अमेरिका और इजराइल चाहते हैं। इसलिए यह युद्ध अगर रुक भी गया तो पूरी तरह से नहीं रुकेगा। इजराइल ईरान पर अपने हमले जारी रखेगा। ईरान का हार नहीं मानना ही उसकी जीत होगी और अमेरिका को जीतने के लिए जीतना पड़ेगा।
इन दोनों के बीच में इजराइल अपना दूरगामी लक्ष्य साध रहा है। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि हम 45 साल से इस समय का इंतजार कर रहे थे। अगर ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ता नहीं भी है तो भी उसको फिर से युद्ध से पहले वाले स्तर पर लाने के लिए विशेषज्ञों का मानना है कि 15 से 20 साल लग सकते हैं। तो इस युद्ध का अंततः विजेता इजराइल ही होगा। अभी तक तो ऐसा ही दिखाई दे रहा है। इजराइल कुछ बोल नहीं रहा है। उसको जो करना है, चुपचाप कर रहा है। वह ईरान को नक्शे से मिटाना नहीं चाहता, वह ईरान में रिजीम चेंज भी नहीं चाहता। वह सिर्फ बेहद कमजोर ईरान चाहता है और अपने इस लक्ष्य में वह काफी हद तक सफल हो रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)