#pradepsinghप्रदीप सिंह ।
पश्चिम बंगाल का जनादेश बहुत बड़ा है। इसको हमारे दिल दिमाग में उतरने में समय लगेगा। अगर मैं यह कहूं कि पश्चिम बंगाल 15 अगस्त 1947 को नहीं, 4 मई 2026 को आजाद हुआ तो गलत नहीं होगा।
कोई भी बड़ा परिवर्तन होता है तो उसका एक प्रस्थान बिंदु होता है। जहां से यह दिखना शुरू होता है कि परिवर्तन होने वाला है। जैसे आंधी आने से पहले यह अंदाजा हो जाता है कि आंधी आने वाली है। पश्चिम बंगाल के चुनाव का प्रस्थान बिंदु क्या था? कब यह दिखने लगा कि ममता बनर्जी की सत्ता जा रही है। कब यह दिखने लगा कि भाजपा की सरकार बनने जा रही है। यह दिखाई देना शुरू हुआ था 9 अगस्त 2024 को हुई आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना से। एक ट्रेनी महिला डॉक्टर की डेड बॉडी बरामद हुई थी। उसके साथ जो नृशंसता हुई थी, उसका वर्णन करना भी बड़ा मुश्किल है। एक महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिनको महिलाओं की सुरक्षा व आत्मसम्मान की चिंता होनी चाहिए थी, उन्होंने साथ किसका दिया? जिन लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया था। और पीड़िता के परिवार को राज्य सरकार ने हर तरह से परेशान करने का काम किया। इसे पूरे पश्चिम बंगाल और देश ने देखा। लेकिन यह प्रस्थान बिंदु नहीं था। यह घटना तो प्रस्थान बिंदु की ओर ले जाने वाली थी। मेरी नजर में प्रस्थान बिंदु 14 अगस्त 2024 को शुरू हुआ, जब कोलकाता की सड़कों पर महिलाएं उतरीं और नारा लगा रिक्लेम द नाइट। उस दिन कोलकाता का पूरा भद्रलोक सड़क पर था। पूरे पश्चिम बंगाल और देश भर में प्रदर्शन हुए। लेकिन ममता बनर्जी की नींद नहीं खुली। इस प्रदर्शन में कोई राजनीतिक दल शामिल नहीं था। सिर्फ जनता सड़कों पर थी। यह किसी भी राजनेता खासतौर से मुख्यमंत्री के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए था कि जब आपके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के बजाय आम लोग विरोध पर आ जाएं। इसका मतलब स्थिति बदलने का संकेत दे रही है। लेकिन ममता बनर्जी नहीं संभलीं।
Mamata Banerjee Padyatra: Didi takes out march on Women's Day to protest  against PM Modi, BJP | Highlights - India Today
अब देखिए एक प्रस्थान बिंदु से सब कुछ नहीं बदल जाता। उसकी निरंतरता जरूरी है। इसस घटना के बाद कई कॉलेजों, यूनिवर्सिटी,लॉ कॉलेज और अलग-अलग जगहों पर युवतियों के साथ बलात्कार और उनके उत्पीड़न की घटनाएं हुईं। इस पर जब शोर मचा तो ममता बनर्जी का जवाब था कि लड़कियां रात 8:00 बजे के बाद घर से बाहर न निकलें। यह ममता बनर्जी का उन असामाजिक तत्वों के सामने सरेंडर था, जिनका उनकी सरकार संरक्षण करती थी। ममता बनर्जी ने बता दिया कि हम अपने गुंडों को नहीं रोक सकते। आप अपने को बचा सकती हो तो बचा लीजिए। डेमोक्रेसी में यह किसी मुख्यमंत्री का जवाब हो ही नहीं सकता। इसी के साथ राज्य सरकार संदेश खाली की घटना के मास्टर माइंड शाहजहां शेख को डेढ़-दो महीने तक सीबीआई से बचाती रही। वहां बड़े पैमाने पर महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। घर जलाए और तोड़े गए। उसके बाद ताबूत में आखिरी कील थी जब मालदा में जुडिशियल ऑफिसर्स का घेराव हुआ। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संपर्क करने की कोशिश करते रहे लेकिन डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी से बात नहीं हुई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने खुली कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि मैं आधी रात के बाद तक घटनाक्रम पर नजर रखे हुए था। बड़ी मुश्किल से राज्य प्रशासन से संपर्क हुआ। जब पुलिस वहां गई और जुडिशियल ऑफिसर्स को निकाला जा रहा था तो उनकी गाड़ियों पर पथराव हुआ। लेकिन ममता बनर्जी ने इसका बचाव किया।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर न होने देने के लिए ममता खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। एसआईआर बिहार, यूपी समेत कई राज्यों में हुआ,कहीं कोई विरोध नहीं हुआ। ममता ने एसआईआर का विरोध इसलिए किया क्योंकि उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाना था। उन्होंने साफ-साफ पूरे देश को बता दिया कि अगर ये बांग्लादेशी घुसपैठिए बचेंगे, यहां रहेंगे तभी उनकी सत्ता बचेगी। इससे जनता को समझ में आ गया कि रानी की जान किस तोते में बसती है। तो पहले एसआईआर ने काम किया और उसके बाद कमान मतदाताओं के हाथ में आ गई। उन्होंने तय किया कि इसके लिए सबक सिखाना जरूरी है। दर्द एक हद से गुजर जाए तो दवा बन जाता है। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के लोगों को इतना दर्द दिया कि उन्हें उस दर्द का अहसास होना बंद हो गया। उनके गुंडों ने जो डर पैदा किया था वह डर लोगों के मन से निकल गया। लोगों को लगा कि अगर इस तरह से डर-डर कर जीने की कोशिश करेंगे तो जी भी नहीं पाएंगे। अगर सम्मान से जीना है,सुख चैन से जीना है तो इस सरकार को हटाना पड़ेगा। और आप देखिए क्या जनादेश आया है। भाजपा को 207 सीटें मिली हैं। ममता बनर्जी खुद अपना चुनाव भवानीपुर से हार गईं। ममता का कालीघाट का घर इसी विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। वहां ममता बनर्जी घर की बेटी बहन की तरह हैं। इसके बावजूद लोगों ने कहा कि वह रास्ता भटक गईं। उनको रास्ते पर लाने के लिए हराना जरूरी है। जनता ने उन्हें विधानसभा में नहीं जाने दिया। ममता बनर्जी ने एक वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। आज तक कोई मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए दो बार चुनाव नहीं हारा है। ममता बनर्जी ने यह रिकॉर्ड कायम किया है। ममता बनर्जी की 15 साल की राजनीतिक कमाई यह है कि वह पश्चिम बंगाल के लोगों के मन से उतर गई हैं। उनको केवल सत्ता से नहीं हटाया, लोगों ने अपने दिल से भी उतार दिया। इसलिए जो लोग कह रहे हैं कि ममता बनर्जी वापसी कर सकती हैं, मैं कह रहा हूं कि ममता बनर्जी की राजनीति अब खत्म है।
कांग्रेस पश्चिम बंगाल में 30 साल सत्ता में रही। लेकिन 1977 में बाहर गई तो वापस नहीं लौट पाई। सीपीएम जिसका पूरा कैडर आईडियोलॉजी बेस्ड था। वह 34 साल सत्ता में रही, लेकिन जब गई तो नहीं लौट पाई। ममता भी इसीलिए नहीं लौट सकतीं क्योंकि उनका जो कैडर है, उसके साथ ममता बनर्जी का रिश्ता ट्रांजैक्शनल है। ममता बनर्जी कहती हैं कि हमको वोट दिलाओ। हमारे राजनीतिक विरोधियों को मारो। उनके मन में डर पैदा करो। इसके बदले में हम तुम्हें संरक्षण और लूटने की छूट देंगे। यह सब वह तभी तक कर सकती थीं, जब तक सत्ता में थीं। उनका गुंडा तंत्र, कट मनी, सिंडिकेट यह सब अब दिखाई नहीं देगा। पश्चिम बंगाल से खबरें आ रही हैं कि बहुत सारे टीएमसी के गुंडे भाग गए हैं, छिप गए हैं। कुछ की पिटाई भी हुई है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह बदलाव का चुनाव है। बदले का नहीं। लेकिन 15 साल के अत्याचार का कुछ तो अंश निकलेगा ही। अब बारी है टीएमसी के उन गुंडों में कानून का डर पैदा करने की। ताकि वे किसी आम आदमी, किसी महिला की तरफ देखने की हिम्मत न करें।
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब भी भद्रलोक बदला है, सत्ता बदली है। भद्रलोक ने चुपचाप सड़क पर उतर कर जो प्रदर्शन किया, उसे मैंने टेलीविजन पर देखा था। उसमें पढ़े लिखे संभ्रांत परिवारों के लोग थे। किसी ने कोई राजनीतिक नारा नहीं लगाया। सिर्फ सड़क पर वे अपनी मौजूदगी से बता रहे थे कि जो हो रहा है हम उसके विरुद्ध हैं। लेकिन जब किसी पर सत्ता का अहंकार चढ़ा होता है तब उसे सच्चाई दिखाई नहीं देती है। वही ममता बनर्जी के साथ हुआ।
तो पश्चिम बंगाल के इस परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु वही है जो 14 अगस्त को कोलकाता की सड़कों पर दिखाई दिया। आरजी कर की घटना में जो बेटी मारी गई, उसने अपना बलिदान देकर पूरे प्रदेश के लिए और मैं कहता हूं देश के लिए एक नई राह खोल दी। पश्चिम बंगाल को आतंक, अत्याचार और घुसपैठियों के कुशासन से मुक्ति दिला दी। इसका असर केवल पश्चिम बंगाल तक नहीं रहेगा। इसका असर पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा। पश्चिम बंगाल में भाजपा देर से पहुंची है। लेकिन अब पहुंच गई है तो जल्दी जाने वाली नहीं है। मेरा मानना है कि गुजरात में जिस तरह से भाजपा ने अंगद का पांव जमा दिया है,उसी तरह से पश्चिम बंगाल में भी अब भाजपा का अंगद का पांव जम गया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)