पहले मैं लिबरल-सेक्युलर बुद्धिजीवियों को चालाक और धूर्त समझता था, लेकिन अब वे मुझे मूर्ख लगने लगे हैं।
दरअसल, वे ज़मीनी हक़ीक़त को समझने और स्वीकार करने की बजाय अपनी सोच के आधार पर तैयार किए गए निष्कर्षों को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं। वे ऐतिहासिक सच्चाइयों और तथ्यों को दरकिनार कर अपने यूटोपिया में विचरण करते रहते हैं। उन्हें लगता है कि जो वे सोचते हैं, बाकी सारे लोग भी वैसा ही सोचें। वे जैसा बोलते हैं, लोग भी वैसा बोलें। उनका जो जीवन-दर्शन है, बाकी सब भी वैसा ही जीवन-दर्शन अपना लें। अच्छा होता कि वे अपनी असफलता पर मंथन करते, लेकिन वे इसका ठीकरा अपनी कमियों को छोड़कर, बाकी दूसरी चीजों पर फोड़ रहे हैं। ख़ासकर भारतीय राजनीति में तो इसके असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे। अब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद उनकी प्रतिक्रिया को ही देख लीजिए। पश्चिम बंगाल में लोग गुंडागर्दी से त्रस्त थे। सत्ताधारी दल के आतंक के साये ने उन्हें चुप्पी साध लेने पर मज़बूर कर दिया। राज्य से उद्योग पलायन कर गए थे। भ्रष्टाचार से आम आदमी त्रस्त था। बांग्लादेशी घुसपैठ ने राज्य की डेमोग्राफी बदल दी। हिंदुओं को अपने त्योहार मनाने के लिए बार-बार कोर्ट की शरण लेनी पड़ती थी। यह सबको लग रहा था, लेकिन सेक्युलर-लिबरल बुद्धिजीवी इस सच से आंखें मूंदे बैठे थे।
कभी ऐसा लगता था कि यह वर्ग अत्यंत चतुर है। वह शब्दों की बाज़ीगरी जानता है, विमर्शों की दिशा मोड़ना जानता है, और अपनी वैचारिक सुविधानुसार घटनाओं की व्याख्या करना भी। लेकिन समय के साथ यह भ्रम टूटता गया। अब उनकी समस्या चतुराई नहीं, बल्कि वास्तविकता से कट जाना प्रतीत होती है। वे अपने बनाए हुए वैचारिक कक्ष में इतने सीमित हो चुके हैं कि बाहर की दुनिया की आहट तक उन्हें सुनाई नहीं देती।
ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं भांप पाने, नहीं समझ पाने की, या जान-बूझकर अनदेखा करने का ठीकरा वे चुनाव आयोग पर फोड़ रहे हैं, वोट चोरी पर फोड़ रहे हैं, एसआईआर पर फोड़ रहे हैं। इसी एसआईआर के आधार पर केरल और तमिलनाडु में भी चुनाव हुए थे, लेकिन उस पर उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि वहां वो पार्टी नहीं जीती, जिसका वे विरोध करते हैं। ये उनके दोचित्तापन को दर्शाता है। उनको ये नहीं दिखाई देता एक पार्टी, जिसकी लोकसभा चुनाव में सीटें कम हो गईं, उसने कोई बहाने नहीं बनाए, बल्कि और ज़्यादा मज़बूती से जुट गई, ज़्यादा परिश्रम किया, अपनी कमियों को दूर किया। अपने मुद्दों को धार दी। नई रणनीति बनाई, जिसका फल उसे लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में मिला।
2014 के लोकसभा चुनावों के बाद यह प्रवृत्ति पहली बार इतने व्यापक रूप में दिखाई दी। दशकों से सत्ता और विमर्श पर प्रभाव रखने वाला एक वर्ग अचानक यह स्वीकार ही नहीं कर पाया कि भारत के मतदाता ने उसके खोखले विमर्श को नकार दिया है। जनता विकास, नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रही थी, लेकिन इस वर्ग ने जनादेश को समझने के बजाय उसे ‘भीड़तंत्र’, ‘बहुसंख्यक उभार’ और ‘लोकलुभावन राष्ट्रवाद’ जैसे शब्दों में बांधने का प्रयास किया।
2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तो यह प्रतिक्रिया और असंतुलित हो गई। उन्हें लगा था कि जनता ने एक बार भाजपा को जिता दिया, लेकिन दूसरी बार परिणाम उनके मनमुताबिक आएगा। ऐसा नहीं हुआ। पुलवामा और बालाकोट की पृष्ठभूमि में जनता ने राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत नेतृत्व को महत्व दिया, लेकिन अनेक बुद्धिजीवियों ने मतदाताओं को ‘भावनात्मक रूप से भटका हुआ’ बताना शुरू कर दिया। कुछ ने यहां तक कहा कि भारतीय लोकतंत्र अब खतरे में है, मानो जनता का निर्णय लोकतांत्रिक तभी माना जाएगा, जब वह उनकी पसंद के अनुरूप हो।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद भी यही मानसिकता सामने आई। राज्य में कानून-व्यवस्था, आधारभूत ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर जनता के अनुभव अलग थे, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद अनेक टिप्पणीकारों ने इसे ‘ध्रुवीकरण की जीत’ कहकर ख़ारिज करने की कोशिश की। वे यह स्वीकार ही नहीं कर पाए कि आम मतदाता अपने दैनिक अनुभवों के आधार पर भी निर्णय ले सकता है। धर्म, संस्कृति और सुरक्षा भी बड़े मुद्दे हो सकते हैं।
दरअसल, समस्या किसी एक चुनाव या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता की समस्या है, जो ज़मीन की वास्तविकताओं को स्वीकार करने के बजाय अपने कल्पनालोक में विचरण करती रहती है। यह वर्ग इतिहास को भी अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ना चाहता है। यदि कोई तथ्य उनकी वैचारिक संरचना से मेल न खाए, तो वे उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन इतिहास और समाज, दोनों किसी विचारधारा की सुविधा से नहीं चलते। वे अपने अनुभवों, संघर्षों और आकांक्षाओं से दिशा ग्रहण करते हैं।
भारतीय समाज आज अपनी सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था, सुरक्षा, विकास और सम्मान — इन सभी प्रश्नों को लेकर अधिक सजग हुआ है। जनता की आकांक्षाएं बदल रही हैं। वह केवल नारों से संतुष्ट नहीं होती; वह परिणाम चाहती है। लेकिन जब कोई वर्ग इन आकांक्षाओं को समझने के बजाय उन्हें कट्टरता या सांप्रदायिकता कहकर ख़ारिज करने लगे, तब वह स्वयं को समाज से काट लेता है।
अगर कोई वर्ग लगातार हार के बाद भी आत्ममंथन न करे, अपनी भाषा और व्यवहार पर विचार न करे, और केवल दूसरों को दोष देता रहे, तो वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है। यही आज तथाकथित सेक्युलर-लिबरल बुद्धिजीवियों के साथ होता दिखाई दे रहा है। आप जनता की आकांक्षाओं को समझ नहीं पाते और उसे सांप्रदायिक क़रार देते हैं। उसे अंधभक्त, अनपढ़ और न जाने क्या-क्या कहते हैं। ये तो बौद्धिक अहंकार है या फिर बार-बार हार की हताशा। दोनों स्थितियां ठीक नहीं हैं। न अहंकार, न हताशा। दोनों पतन की ओर ले जाते हैं, जो साफ़तौर पर दिख भी रहा है।
आज आवश्यकता आरोपों की नहीं, आत्मावलोकन की है। समाज को कोसने से बेहतर है, समाज को समझा जाए। जनता को मूर्ख समझने वाला बुद्धिजीवी अंततः स्वयं हास्यास्पद बन जाता है। लोकतंत्र में अंतिम शब्द किसी विचारधारा का नहीं, जनता का होता है। और, शायद यही सच इस वर्ग को सबसे अधिक असहज करता है।
अगर सेक्युलर-लिबरल बुद्धिजीवी अपने पसंदीदा दलों को सही तस्वीर दिखाते, उन्हें सही सलाह देते, तो उनके लिए परिणाम शायद बेहतर होते। इसीलिए मैंने कहा – पहले मैं सेक्युलर-लिबरल बुद्धिजीवियों को चालाक समझता था, लेकिन अब मुझे वे मूर्ख लगने लगे हैं।





